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आख़िरकार नरेंद्र मोदी ने मानी अर्थशास्त्री ज्यांद्रेज़ की 5 बातें, चाहिए पांच लाख करोड़ रुपये

जनता को भूख से बचाने और इलाज के लिए संसाधनों की कमी न हो

By डॉ. सिद्धार्थ

कोरोना से निपटने में बदइंतज़ामी को लेकर चौतरफा आलोचना की शिकार हो रही मोदी सरकार ने देश की 80 करोड़ ग़रीब, किसान, मज़दूर आबादी के लिए आख़िरकार पौने दो लाख करोड़ रुपये (1.7 लाख करोड़)  का पैकेज घोषित किया।

दो दिन पहले एनडीटीवी के प्राइम टाइम में दुनिया के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री-आम आदमी के आर्थशास्त्री- ज्यां द्रेज ने कोरोना वायरस के खिलाफ संघर्ष के लिए चार-पांच सुझाव दिए थे।

आखिरकार प्रधानमंत्री जी आपको ये सुझाव मानने पड़े भले ही इसमें इतनी देरी की हो, जिसकी भरपाई करोड़ों मेहनतकश जनता को आऩे वाले कई सालों में भी नहीं हो पाएगी।

प्रधामंत्री जी आप तो जाते हैं कि कोरोना वायरस के खिलाफ संघर्ष के दो मोर्चे हैं। पहला स्वास्थ्य सेवाओं से जुडा है। जिसमें कोरोना की टेस्टिंग सुविधा से लेकर, स्वास्थ्य उपकरणों-विशेषकर वेंटिलेटर- का इंतजाम, स्वास्थ्य कर्मियों के लिए सुरक्षा किट्स की व्यवस्था आदि शामिल हैं।

लेकिन जैसा कि आपने इसे रोकने का एकमात्र उपाय सोशल डिस्टेंसिंग (यानि सामाजिक अलगाव) बताया है, जिसके लिए आपने पूरे देश में लॉक डाउन की घोषणा की है।

लेकिन लॉक डाउन के बाद असंगठित क्षेत्र के अधिकांश मज़दूरों और उनके परिवारों के रोजी-रोटी के साधन छिन गए हैं। इसमें करीब तीन तरह लोग हैं।

एक वे जो हर-दिन कमाते हैं और खातें हैं और जिनके पास अगले दिन के लिए कोई बचत नहीं होती, दूसरे वे ज्यादा से ज्यादा एक सप्ताह या पंद्रह दिन बिना काम के भी भोजन का इंतजाम कर सकते हैं।

तीसरे वे जिनके पास महीने भर या इसके कुछ अधिक का इंतजाम हैं। यानि इस देश की करीब 60 प्रतिशत यानि 78-80 करोड़ के आस-पास की आबादी ऐसी है, जो औसत तौर पर एक महीने से अधिक बिना काम या सरकारी मदद के रोजी-रोटी का इंतजाम नहीं कर सकती है।

सुझाव

इन सभी लोगों के हितों के लिए ज्यां द्रेज ने कुछ जरूरी सुझाव दिए थे। जो निम्न हैं-

राशन कार्ड से मिलने वाले राशन को दो गुना कर दीजिए और तीन महीने महीने तक मुफ्त में राशन उपलब्ध कराइए। इसमें बीपीएल और एपीेएल का बंटबारा भी भी मत कीजिए। बीपीएल और एपीएल सभी कार्ड धारकों को राशन दीजिए। इसमें मेरा सुझाव यह भी है कि इन राशन की दुकानों से राशन कार्ड पर तेल-चीनी एवं साबुन भी उपलब्ध कराइए।

प्रधानमंत्री जी आपको मालूम होगा कि भारतीय खाद्यान्न निगम के पास जरूरत से ज़्यादा स्टॉक है। इस समय निगम के 742 लाख टन का भंडार है, जबकि आवश्यक भंडार की अधिकतम सीमा सिर्फ 411.2 लाख टन है। यानि निगम के पास 330.8 लाख टन अधिक का भंडार है।

यह कई महीनों तक राशन मुहैया कराने के लिए पर्याप्त है। और जो ज़रूरी भंडार है, वह भी संकट के समय के लिए ही किया जाता है। इससे बड़ा संकट समय कौन सा आयेगा प्रधानमंत्री जी।

प्रधानमंत्री जी! निगम के पास जो भंडार है, वह कहीं विदेश से नहीं आया है, न आसमान से टपका है। यह पूरा भंडार देश के किसानों-मजदूरों की गाढ़ी मेहनत से उपजा है और देश की जनता के टैक्स की कमाई से उसे खरीद कर ऱखा गया है और उसका रख-ऱखाव किया जा रहा है। आखिर किस दिन काम आयेगा?

पेंशन दोगुनी की जाए

ज्यांद द्रेजे ने दूसरा सुझाव दिया था कि बूढ़े़. विधवा और विकलांग लोगों की पेंशन को दो गुना कर दिया जाए। सारी पेंशन जल्द से जल्द जारी कर दिया जाए। केरल की तरह कुछ महीनों की पेंशन एडवांस में दे दिया जाए।

बहरहाल इनमें काफ़ी कुछ सुझावों को पैकेज की घोषणा में शामिल किया गया है।

लेकिन इतने से ही काम नहीं चलने वाला है।

मजदूरों-गरीबों किसानों और ठेला-रेहड़ी लगाने वालों के खातों में सीधे पैसा ट्रांसफर कीजिए। ज्यां द्रेज इसका तात्कालिक तौर पर तरीका भी बताया। सबसे पहले मनरेगा की मजदूरों के खातों में पैसा डालिए। इसके साथ मेरा सुझाव यह है कि जितने लोगों का जन-धन खाता आपने खुलवाया था, उसमें भी सीधा पैसा ट्रांसफर कीजिए।

तत्काल खोलें रिलीफ़ कैंप

ज्यां द्रेज ने शहरों में फंसे प्रवासी मजदूरों के लिए रिलिफ कैंप खोलने का सुझाव दिया है। पूरे देश में ऐसे मजदूरों की संख्या करोड़ों में है। इन रिलिफ कैंपों में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ रहने- खाने का इंतजाम कीजिए।

ज्यां द्रेज ने यह भी बताया कि इसके लिए करीब 3 से 4 लाख करोड़ खर्च होगा। प्रधामंत्री जी यह देश के 78 करोड़ लोगों को बचाने के लिए कुछ ज्याद पैसा नहीं है।

आपने ने अपने कार्पोरेट मित्रों को पलक झपते ही 1 लाख 50 हजार करोड़ की छूट बजट के पहले ही दे दिया था।

इसके साथ ही आरबीआई से सरप्लस और लाभांश के रूप में आपने 1 लाख 76 हजार करोड़ रूपया ले लिया और अपने कार्पोरेट मित्रों को विभिन्न रूपों में सौंप दिया। कार्पोरेट टैक्स में छूट और उनके द्वारा लिए कर्जों को एनपीए ( माफ ) करके।

आप अपने चंद कार्पोरेट मित्रों को पलक झपते 1 लाख 50 हजार करोड़ की सौगात दे सकते हैं। तो क्या देश की 78 करोड़ जनता के लिए यह देश 3 से 4 लाख नहीं खर्च कर सकता है।

माना ये लोग ( आम जनता) आपके अडानी-अंबानी जैसे मित्र नहीं हैं, लेकिन हैं तो इस देश के ही लोग। इनका भी खयाल करिए।

इसके अतिरिक्त करीब 2 लाख करोड रूपए स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जरूरत पड़ेगी।

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पांच लाख करोड़ की ज़रूरत

यानि कुल करीब 5 लाख करोड़ की जरूरत है। इस धन इंतजाम अधिकांश राज्य सरकारें नहीं कर सकती हैं। केंद्र सरकार ही कर सकती है। ज्यां द्रेजे ने यह भी कहा है कि ज़रूरत हो तो वित्तीय घाटा बढ़ने दीजिए।

प्रधानमंत्री इसे महाभारत युद्ध मत बनाइए। जिसमें दोनों पक्षों के अधिकांश लोग मारे दिए गए था। एक उल्लेख के मुताबिक इस युद्ध में दोनों पक्षों से करीब 4 5 लाख लोग शामिल हुए थे, जिसमें सिर्फ 18 योद्धा बचे थे।

बहुंख्यक लोगों को बचाने के बारे में सोचिए। मरने के लिए मत छोड़िए। ज्यां द्रेज का पूरा सुझाव मान लिजिए। ऐसा नहीं कि आपने नहीं माना, लेकिन आधा अधूरा काम पूर्ण फल नहीं देता है।

प्रधानमंत्री जी अपना दिल और खजाना जनता के लिए पूरा खोलिए।

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