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कोरोना के बहाने ‘तीसरा महायुद्ध’- भाग तीन

अब तक कई महामारी आईं, लेकिन न मानवता का विकास रुका और न इतिहास निर्माण की प्रक्रिया

By आशीष सक्सेना

मानवता के खतरे की बात की जाए तो विश्व महामारी कई बार आई और बड़ा नुकसान किया। इसके बावजूद जिंदगी की रफ्तार और इतिहास निर्माण जारी रहा।

यही वजह है कि आज दुनिया की आबादी पहले किसी भी समय से ज्यादा और विकसित है। विज्ञान के विकास ने बहुत सी बाधाओं को पार लगाने में मदद की और संभावित खतरों से निपटने का भी बंदोबस्त भी किया।

पिछली दस विश्व महामारी के बारे में हमें जानना चाहिए, जिससे मौजूदा या भविष्य के संकटों में डरकर मरने की जगह जीने की राह निकाली जा सके।

‘पैंडेमिक्स: हिस्ट्री एंड प्रिवेंशन’ विषय पर ‘द ह्यूमन सोसायटी ऑफ द यूएस’ के डायरेक्टर मिकाइल ग्रेगर ने गहराई से व्याख्यान दिया है। ये लेक्चर ‘न्यूट्रीफैक्ट डॉट ओआरजी’ पर उपलब्ध है। इसमें ये भी बताया गया है कि भैंस, गाय, सुअर, घोड़ा, बतख के जरिए कौन से वायरस ने इंसान की जिंदगी को खतरे में डाल दिया।

लाइव साइंस डॉट कॉम ने ईसा पूर्व हजारों वर्ष पहले और ईसवीं कैलेंडर के बाद की बीस महामारियों और विश्व महामारियों का ब्योरा प्रकाशित किया है। इसमें हुई मौत और कारणों की पड़ताल भी करने की कोशिश की गई है।

इसी तरह ‘एमफोनलाइन डॉट कॉम’ पर पिछली दस महामारी व विश्व महामारी का ब्योरा है। इसको हम संक्षेप में बताने की कोशिश कर रहे हैं।

165वीं ईसवीं में ‘एंटनी प्लेग’ से 50 लाख लोगों की मौत हो गई, जिसका कारण अज्ञात है। केवल इतनी ही जानकारी है कि मेसोपोटामिया से लौटे रोमन सैनिकों के साथ ही ये बीमारी फैली।

इसके बाद 541-542 ईसवीं में ब्यूबोनिक प्लेग फैला, जिसे ‘प्लेग ऑफ जस्टीनियन’ भी कहा जाता है। इस पैंडेमिक में लगभग ढाई करोड़ लोगों की मौत हुई। यूरोप की आधी आबादी खत्म हो गई।

एक समय ऐसा भी आया जब रोजाना पांच हजार लोग मर रहे थे। विख्यात बैजंतिया साम्राज्य से में सिर्फ आंसू ही बचे, क्योंकि इसकी राजधानी कुस्तुंतनिया की 40 प्रतिशत आबादी को प्लेग ने लील लिया।

फिर 1346-1353 ईसवीं में आया ‘द ब्लैक डेथ’ का कहर। ये भी ब्यूबोनिक प्लेग ही था, जिसने साढ़े सात करोड़ से बीस करोड़ लोगों की जान ली।

फिर, 1852-1860 ईसवीं में भारत से कालरा फैला, जो गंगा की धारा से होकर दुनिया में फैलने लगा। इसमें दस लाख लोग मरे, जिसमें 23 हजार ग्रेट ब्रिटेन के भी लोग थे। भारत में इसी अंतराल में अंग्रेज उपनिवेशवादियों के खिलाफ पहला स्वतंत्रता संग्राम भी हुआ।

इसके बाद 1889-1890 ईसवीं में इफ्लूएंजा वायरस से फ्लू पैंडेमिक हुआ, जिसमें दस लाख लोग मरे। इसकी शुरुआत तुर्कमेनिस्तान के बुखारा शहर से हुई। इसको एशियाई और रशियन फ्लू भी कहा गया।

फिर 1910-1911 ईसवीं में भारत से फिर कालरा महामारी फैली, जिसमें आठ लाख से ज्यादा लोग मरे। ये पहले विश्वयुद्ध के बादल छाने से पहले हुआ।

पहले विश्वयुद्ध में दुनिया ने करोड़ों लोगों की जान ली, जो मानव निर्मित था, आर्थिक मंदी से उपजा था और उपनिवेशों पर कब्जे की होड़ का नतीजा था।

पहले विश्वयुद्ध के जख्म अभी हरे ही थे कि 1918 ईसवीं में इंफ्लूएंजा वायरस ने फ्लू पैंडेमिक की दस्तक दे दी। शुरुआत जहां से भी हुई हो, लेकिन पहला केस स्पेन से दर्ज होने के चलते इसका नाम ‘स्पेनिश फ्लू’ पड़ गया।

इस विश्व महामारी में दुनिया के 50 करोड़ तक लोग संक्रमित हुए, जिसमें दस करोड़ तक लोगों की मौत हो गई। बताया जाता है कि ढाई करोड़ लोग तो पहले दो सप्ताह में ही मर गए।

इस फ्लू से भारत में लगभग दो करोड़ लोगों की मौत होने का अनुमान बताया जाता है। ये किसी विश्वयुद्ध से भी बड़ी मानव क्षति थी, लेकिन दुनिया आजादी के आंदोलन की ताकत से मानवता को आगे ले गई।

फिर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद चीन से 1956 में एशियन फ्लू की विश्व महामारी फैली, जिसमें 20 लाख लोगों की मौत हुई। इस पैंडेमिक से सिर्फ अमेरिका के ही लगभग 70 हजार नागरिक मरे।

इसके बाद 1968 में इंफ्लूएंजा फ्लू फैला और 10 लाख लोगों की मौत हुई। इस फ्लू की शुरूआत हांगकांग से हुई।

फिर 1976 में अफ्रीका महाद्वीप के देश कांगो में एचआईवी एड्स का पहला केस दर्ज हुआ, जिसने देखते ही देखते पूरी दुनिया को विश्व महामारी की चपेट में ले लिया।

इस पैंडेमिक का भयानक चेहरा 2005-2012 तक दिखाई दिया। साढ़े तीन करोड़ लोगों की जान गई और आज भी इस बीमारी के साथ तकरीबन साढ़े तीन करोड़ लोग जी रहे हैं।

विश्व महामारियों के अलावा भारत में प्लेग और अकाल से लाखों लोग तक मरे, जब यहां की आबादी 30 करोड़ के आसपास थी।
आज भी मलेरिया, टीबी, डेंगू, स्वाइन फ्लू, जापानी इंसेफ्लाइटिस आदि से होने वाली मौतों के आंकड़ों से बड़ी मानव क्षति हो रही है। इन संक्रामक रोगों के आंकड़े डरावने हैं।

अगले भाग में क्या?
कोविड-19 के संक्रमण, मौत और रिकवरी का आकलन हम अगले भाग में समझेंगे। उस सूत्र को भी समझेंगे, जिससे विभीषिका का आकलन किया जाता है। साथ ही ये भी जानेंगे कि सालभर पहले तक दवा कंपनियों का बाजार क्या विश£ेषण और भविष्य में तरक्की का क्या अनुमान लगा रहा था।

क्रमश: जारी….

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