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अभूतपूर्व बेरोज़गारी-4: लॉकडाउऩ में 12 करोड़ रोज़गार छिन गए, इतने और छिनेंगे

यूपी में चपरासी के 368 पदों पर 23 लाख आवेदन आए, रोज़गार विहीन विकास का दिवालिया

By एस. वी. सिंह

देश में ऐसे अनेक व्यवसाय हैं जो सिर्फ़ किसी विशेष सीज़न में ही चलते हैं। उदहारण के लिए; चीनी उद्योग, जो नवम्बर से अप्रैल के बीच ही चलता है। एक अनुमान के अनुसार, चीनी उद्योग में क़रीब 2.86 लाख मज़दूर काम करते हैं।

ये सब कर्मचारी जिन्हें बा-रोज़गार लोगों में गिना जाता है असलियत में मई से अक्तूबर के बीच के 6 महीने बे-रोज़गार रहते हैं। इन 2.86 लाख मज़दूरों को सिर्फ़ 50% बा-रोज़गार ही बोला जाना चाहिए क्योंकि उन 6 महीनों के खाली सीज़न में इन्हें कोई पगार नहीं मिलती जब चीनी मिल बंद पड़े होते हैं।

NSSO के सर्वे के आधार पर, IMA द्वारा ज़ारी भारतीय रोज़गार रिपोर्ट के अनुसार देशभर में फैले सीजनल उद्योगों में काम करने वाले मज़दूरों की कुल तादाद 11 करोड़ से भी अधिक है। ये सभी मज़दूर बे-रोज़गारों की गिनती में नहीं आते जबकि ये लोग आंशिक रूप से ही रोज़गार में हैं।

उसी रिपोर्ट के अनुसार लगभग 1.8 करोड़ मज़दूर ऐसे हैं जो होटलों, ढाबों, ईंट भट्टों और घरेलू कामों में लगे हुए हैं जिन्हें काम तो 12 घंटों से भी अधिक करना पड़ता है लेकिन वेतन के तौर पर कभी कुछ मिल गया तो मिल गया।

कुछ भी वेतन निश्चित नहीं बाकि श्रम सुविधाओं का तो इन्हें पता भी नहीं कि वो होती क्या हैं!! कुछ खाने को मिल जाता है इसलिए जिन्दा हैं, मर भी जाएँ तो भी कहीं गिनती नहीं होती!! इन्हें बे-रोज़गार कहा जाए या बा-रोज़गार ये भी एक शोध का विषय है।

ये रिपोर्ट एक और महत्वपूर्ण तथ्य उजागर कराती है; “2010 के दशक से रोज़गार ही रुक गया है; 2011-12 रोज़गार आंकड़ा 46.7 करोड़ था जो 2015-16 में घटकर 46.2 करोड़ रह गया.” जबकि रोज़गार घटने की गति तो 2015-16 के बाद ही भयावह हुई है।

बेरोज़गारी की असली हालत का पता सरकारी आंकड़ों से ज्यादा सटीक तब चलता है जब कहीं किसी भरती की घोषणा होती है। यूपी में अभी पिछले साल अस्थायी चपरासियों के 368 पदों के लिए कुल 23 लाख आवेदन प्राप्त हुए थे।

आवेदकों में अधिकतर पोस्ट ग्रेजुएट, इंजिनियर और पी एचडी धारक थे। कितना शर्मनाक मंज़र है ये!! आज असलियत ये है कि सरकारी मनरेगा (महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार कानून) में 200 रु रोज़ की मज़दूरी के लिए इंजिनियर और पी एचडी धारक लाइन लगाते हैं।

 ताला बन्दी ने रोज़गारों को तबाह कर दिया

सतत संकट ग्रस्त, अधमरी अर्थव्यवस्था जिसमें लगभग सभी उद्योग जो अपनी क्षमता के छोटे से प्रतिशत पर चालू थे मानो जैसे तैसे किढर रहे थे, उनको बगैर किसी योजना बनाए एक सरकारी फरमान द्वारा तुरंत एक झटके में बंद कर दिया गया।

मानो करोड़ों मज़दूरों की साँस की नली ही बन्द कर दी गई!! देशभर में पसीना बहा रहे करोड़ों विस्थापित मज़दूरों पर जुल्मों-मुसीबतों-मौतों का ऐसा पहाड़ टूटा जिसे बयान करना ही संभव नहीं।

CMIE द्वारा ज़ारीआंकड़ों के मुताबिक एक के बाद एक ज़ारी होने वाली इस जानलेवा लॉकडाउन ने कुल 12.2 करोड़ रोज़गार छीन लिए। आज हालत ये है कि बे-रोज़गारों की बजाए बा-रोज़गारों की गिनती करना आसान है।

 रोज़गार विहीन ‘विकास’

असली कठोर और कड़वी सच्चाई आज की ये है कि सन 2007 में जब पहले से संकट ग्रस्त अर्थव्यवस्था भयानक मन्दी में डूब गई थी, तब से आज तक सही माने में कोई विकास नहीं हुआ है।

ये वो संकट नहीं है जो चक्रीय होता है और जो पूंजीवादी व्यवस्था में नैसर्गिक रूप से गुंथा होता है, बल्कि ये अंतिम जान लेवा संकट है जिसे खुद पूंजीवाद के ताबेदार-खिदमतगार व्यवस्थागत (SYSTEMIC) या टर्मिनल बोल रहे हैं जो मरीज के साथ ही जाता है।

कोई नया बाज़ार खोजने, विस्तार करने के लिए पृथ्वी पर कहीं कुछ नहीं बचा है, जिसे निचोड़ा जा सके।

जैसे जैसे विपन्नता-कंगाली पसरती जा रही है मौजूदा बाज़ार भी सिकुड़ता जा रहा है जिसका विस्तार तब ही हो सकता है जब उत्पादन व्यक्तिगत मुनाफ़े के लिए ना होकर सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार हो, वो पूंजीवाद होने नहीं देगा!!

परिणामत: लोगों को बहलाने के लिए जो भी 4 या 5 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर प्रचारित की जाती है वो या तो आंकड़ों की बाजीगरी से संपन्न होती है जिस विधा में मौजूदा सरकार को विशेष योग्यता हांसिल है या शेयर मार्किट में खेले जाने वाले जुए की बदौलत होती है।

वह कोई स्वस्थ उत्पादक विकास नहीं है जिससे रोजगार सृजित हों। संकट ग्रस्त पूंजीवाद ने रोज़गार विहीन ‘विकास’ को जन्म दिया है।

31 जनवरी 2019 के इकनोमिक टाइम्स में छपी रिपोर्ट एक दिलचस्प तथ्य उजागर करने वाली है; “दूसरे, नरेंद्र मोदी की ये सरकार बे-रोज़गारी के आंकड़ों को लेकर असाधारण रूप से कपटपूर्ण है। रोज़गार या उनका बिलकुल ही ना होना एक राजनीतिक मुसीबत की परिस्थिति बन चुकी है। इन आंकड़ों को मतदाताओं से छिपाने के लिए सरकार किसी भी हद तक जा रही है। सोमवार को तो अति ही हो गई, जब दिल्ली स्कुल ऑफ इकोनॉमिक्स के कार्यकारी चेयरमैन पी सी मोहनन और जेवी मीनाक्षी को सरकार द्वारा अनावश्यक दखल व हस्तक्षेप करने की वज़ह से भारत के प्रमुख आंकड़ा संकलक और विश्लेषण विभाग के लिए बने राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग से त्यागपत्र देना पड़ा.”

मौजूदा हुकूमत के काम करने की संस्कृति और आंकड़ों को दबाने और उनमें घपला करने की असलियत ये है।

इसी तरह, पिछले ही साल जब राष्ट्रीय सांख्यिकी एवं सर्वे विभाग (NSSO) ने देश में उपभोक्ता सम्बन्धी आंकड़े ज़ाहिर किए, जो ये कन्फर्म कर रहे थे की देश में ना सिर्फ़ कारें और फ़्लैट नहीं बिक रहे हैं बल्कि उपभोग की मूलभूत खाद्य वस्तुओं जैसे आनाज, चावल, दाल, तेल आदि की खपत में भी कमी आई है, जिससे ये सिद्ध होता है कि देश में भुखमरी पसर रही है, तो सरकार ने NSSO को ही बंद करने का फरमान सुना दिया था। (क्रमशः)

(मज़दूर मुद्दों पर केंद्रित ‘यथार्थ’ पत्रिका के अंक तीन, 2020 से साभार)

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