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ये कैसा लॉकडाउन? उत्तराखंड की फ़ैक्ट्रियों में ज़बरदस्ती प्रोडक्शन जारी, मज़दूरों में आक्रोश

पारले बिस्किट में उत्पादन, एसडीएम ने कहा नही दी अनुमति, फिर कैसे चला प्लांट?

एक तरफ विश्वव्यापी कोरोना वायरस की आपदा से भारत सहित पूरी दुनिया के कई देश में लॉक डाउन और आपातकालीन स्थितियां बनी हुई है, दूसरी ओर मुनाफे की अंधी हवास में कंपनियां उत्पादन के लिए मज़दूरों को विवश कर रही हैं।

उत्तराखंड में पारले बिस्किट कंपनी के सितारगंज प्लांट में बगैर अनुमति बीते 24 मार्च को मज़दूरों को मज़बूर कर उत्पादन कराया गया।

मज़दूरों ने इसकी शिकायत सीएम से लेकर डीएम एप पर और सितारगंज के एसडीएम और कोतवाल से की। तब जाकर प्रशासन थोड़ी हरकत में आया। उप जिलाधिकारी गौरव कुमार ने बताया कि पारले प्लांट को चलाने की अनुमति नहीं दी गई है।

दबाव में फिलहाल एक शिफ्ट चलने के बाद प्लांट बंद हो गया। ज्ञात हो कि उत्तराखंड में 31 मार्च तक लॉक डाउन घोषित हुआ।

मुख्यमंत्री ने कारखानों में भी अवकाश की घोषणा की, लेकिन अधिकार जिलाधिकारी को दे दिया।

तब से तमाम कंपनियों ने तो प्लांट बंद करने की घोषणा कर दी, लेकिन कई कंपनियां सरकार और प्रशासन के सहयोग (अनुमति) से चल रही हैं। जिसका लाभ उठाकर कुछ कंपनियाँ चोरी से भी चल रही हैं। ऐसी ही फ़ैक्ट्री है पारले बिस्किट प्राइवेट लिमिटेड।

बीते 24 मार्च को पारले के सितारगंज स्थित प्लांट में प्रबंधन ने 12-12 घंटे के दो शिफ्ट में प्लांट चलाने की सूचना मजदूरों को दी। इससे मज़दूरों में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। मेहनतकश प्रतिनिधि को मज़दूरों ने बताया कि प्रबंधन ने साफ कहा कि जो मज़दूर काम पर नहीं आएंगे उसका खामियाजा वे भुगतेंगे। प्रबंधन ने बस भी भेज दी। मज़बूरन सुबह करीब 80 मज़दूर कंपनी गए और पूरा उत्पादन भी किया।

इस बीच डर और भय की स्थिति में मज़दूर उत्पादन कार्य करते रहे। प्रबंधन का कहना था कि कच्चा माल ख़राब होने से बचने के लिए प्लांट संचालित हुआ है। यानी मज़दूर की ज़िंदगी से ज्यादा कीमती कच्चा माल है! मज़दूरों का कहना है कि यदि मैदा आदि खपाना है तो संकट में पड़े ग़रीब मज़दूरों को बांट देते!

यह भी गौरतलब बात है कि मज़दूरों को फैक्ट्री लाने के लिए प्रबंधन के अनुसार उसने एक बस के संचालन की अनुमति ली थी। मजेदार बात यह है कि एआरटीओ के उक्त कथित अनुमति पत्र में किसी कंपनी का नाम अंकित नहीं है।

कम्पनी ने पूरे शिफ्ट में 80 मजदूरों से काम भी कराया। हालांकि प्रशासन ने गलत मानते हुए भी उस पर अबतक कोई कार्रवाई नहीं की।

पूरे मामले में पारले प्रबंधन जब फंस गया तो उसने यह सफाई दी कि कंपनी के कार्य के लिए श्रमिकों को स्वेच्छा से बुलाया गया था। हालांकि यह दावा भी निराधार है। डर और भय के इस माहौल में कोई मज़दूर कंपनी में ड्यूटी करने जाएगा, यह तो कल्पना से बाहर की चीज है।

पता चला कि प्रबंधन ने जिले में मौजूद सितारगंज और पंतनगर, दोनों प्लांटों को संचालित करने की फिराक में था। उसने सबसे पहले ट्रायल के तौर पर सितारगंज प्लांट को चलाया। मज़दूरों ने यह भी बताया कि प्रबंधन लगातार मज़दूरों पर दबाव बनाता रहता है।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में 22 मार्च से ही लॉक आउट घोषित है। इस बीच मुख्यमंत्री ने सभी कारखानों के बंद रहने व अवकाश पर रहने की घोषणा की।

लेकिन उसके भीतर ही यह प्रावधान डाल दिया कि हर जिले के जिला अधिकारी अपने स्तर से इसको देखेंगे। परिणामस्वरूप राज्य के दोनों औद्योगिक केंद्रों- हरिद्वार और उधम सिंह नगर में कई कारखानों को चलाने की अनुमति जिला प्रशासन ने दे दी। बताया कि वे दवाइयों और खाद्य सामग्री का उत्पादन कर सकते हैं।

यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है कि इस बहाने कॉस्मेटिक और जरूरी खाद्य सामग्रियों के अतिरिक्त दूसरे तीसरे प्रकार के उत्पादन वाले कारखाने भी इसमें अनुमति लेने में सफल रहे। हरिद्वार जिले में 44 कंपनियों को अनुमति मिली हुई है।

उधम सिंह नगर में पूरी सूची उपलब्ध नहीं है, लेकिन जो सूची जिला प्रशासन द्वारा जारी की गई है उनमें 19 कारखानों को अनुमति दिए जाने का जिक्र है। इसमे पारले नहीं है।

यही नहीं, बिड़ला ग्रुप का लालकुआं स्थित सेंच्युरी पल्प एंड पेपर मिल भी अपना उत्पादन कराता रहा, हालांकि अब उसके बंद हो जाने की सूचना प्राप्त हुई है। आईटीसी, हरिद्वार सहित कई कंपनियों में उत्पादन के लिए मज़दूर विवश हैं।

जहाँ एक ओर इस भयावह बीमारी के संक्रमित होने से पूरी कम्युनिटी पर असर पड़ने की स्थितियां हैं और इससे बचाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण समूह में लोगों के ना रहने और एक दूसरे से दूरी बनाने की सलाह पर सख्ती से अनुपालन हो रहा है, वहीं दूसरी ओर कंपनियों की मनमर्जी पर रोक के लिए कहीं कोई कारगर कार्यवाही की स्थिति नहीं है।

साफ है कि मुनाफे की हवस के सामने मज़दूरों की जान की कोई कीमत नहीं है।

(मेहनतकश वेबसाइट से साभार।)

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