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कोरोना संक्रमित आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को अस्पताल में नहीं मिल सका बेड, तड़प तड़प कर गई जान

योगी सरकार से परिजनों को 50 लाख रुपये की आर्थिक मदद दिए जाने की उठी मांग

यूपी के उन्नाव ज़िले में कार्यरत आंगनबाड़ी कामिनी निगम की कोरोना संक्रमण और इलाज की सुविधा न मिलने के कारण मौत हो गई।

वर्कर्स फ्रंट के अध्यक्ष दिनकर कपूर ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चिट्ठी भेजकर उनके आश्रितों को शासनादेश के अनुसार, 50 लाख रुपये मुआवज़ा देने की मांग की है।

दिनकर कपूर ने लिखा है कि ‘कोरोना महामारी में सरकार के आदेश के तहत आंगनबाड़ी कामिनी निगम सर्वेक्षण का कार्य कर रही थीं। इसी कार्य के दौरान वह कोरोना संक्रमित हो गयी इसके बाद उन्हें उन्नाव में इलाज की सुविधा नहीं मिली जिससे उन्हें कानपुर हैलेट अस्पताल ले जाया गया जहां भी उन्हें बेड नसीब नहीं हुआ और उन्होंने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।’

चिट्ठी में आगे लिखा गया है कि ‘उनके इलाज के लिए उन्नाव सदर के विधायक पंकज गुप्ता तक ने अपनी फेसबुक पोस्ट में कोरोना महामारी से निपटने की व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं और अपनी असहायता को प्रदर्शित करते हुए लिखा कि उनकी बात तक स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने नहीं सुनी व इलाज का इंतजाम नहीं किया।’

मैं कल से सोच रहा हूँ की कुछ लिखूँ पर कुछ करणो से नहीं लिखा किंतु लिखता हूँ क्योंकि यह मेरा दायित्व है की जनता तक सीधी…

Posted by Pankaj Gupta on Saturday, July 18, 2020

सर्वेक्षण में लगाना ग़ैरक़ानूनी!

अपर मुख्य सचिव राजस्व रेनुका कुमार ने 11 अप्रैल 2020 को आदेश जारी किया था कि कोरोना के कार्य में लगे स्थायी/अस्थायी कर्मचारी या अन्य किसी भी तरह के कर्मचारियों की मृत्यु होने पर कर्मचारी के आश्रितों की सामाजिक सुरक्षा के लिए 50 लाख रूपए का बीमा राज्य सरकार द्वारा देय होगा।

फ्रंट ने मांग की है कि शासनादेश के अनुसार कामिनी निगम के आश्रितों को 50 लाख रुपये का मुआवजा तत्काल दिया जाए।

दिनकर कपूर के अनुसार, “आंगनबाड़ी मुख्ययतः गर्भवती व धात्री महिलाओं, 6 वर्ष के बच्चों और 18 साल से कम उम्र की किशोरी बालिकाओं के पोषाहार, शिक्षा व स्वास्थ्य आदि का कार्य करती है। यह सारे समूह कोविड़-19 में भारत सरकार की गाइडलाइन के अनुसार सुरक्षित समूह में रखे गए हैं जिनकी सुरक्षा के लिए विशेष निर्देश भारत सरकार ने दिए हुए हैं।”

“ऐसे में इन समूहों के बीच कार्य करने वाली आंगनबाड़ी कार्यकत्री को कोविड़-19 के सर्वेक्षण कार्य में लगाना इन सारे समूह के जीवन को ही खतरे में डालना है। यही वजह है कि मध्य प्रदेश समेत तमाम हाईकोर्ट ने इनके कोविड के कार्य में लगाने पर रोक लगायी हुई है।”

न्यायाधीशों का मत है कि यदि आंगनबाड़ी कोविड के कार्य के दौरान संक्रमित हो गयी तो इस कारण से इन सारे समूहों का जीवन ही खतरे में पड़ जायेगा।

कोरोना निरीक्षण पर तत्काल रोक लगाने की मांग

इसलिए तत्काल प्रभाव से आंगनबाड़ी कार्यकत्री व सहायिकाओं को कोरोना के कार्य में नियोजित करने पर रोक लगाने का आदेश देने का निवेदन किया गया।

वर्कर्स फ्रंट ने कहा है कि आंगबाड़ी कार्यकर्ताओं के जुलाई माह से मानदेय पर रोक लग गई है। जून माह में किए कार्य का मानदेय भी अभी तक नहीं प्राप्त हुआ है। यह भी सूचना लगातार मिल रही है कि 62 वर्ष पूरा कर चुकी कार्यकर्ताओं को ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से ज़िले में नौकरी से निकाला जा रहा है।

इस सम्बंध में अधोहस्ताक्षरी ने दो पत्र दिनांक 9 जुलाई 2020 व 16 जून 2020 को प्रमुख सचिव बाल सेवा एवं पुष्टाहार को भी भेजे थे, पर सेवा से पृथक करने की विधि विरूद्ध कार्यवाही पर रोक नहीं लगी। यह बेहद कष्टदायक स्थिति है जबकि आंगनबाड़ी अपनी ज़िंदगी को दांव पर लगाकर सरकार के आदेशों का अनुपालन करते हुए सर्वेक्षण आदि कार्य कर रही है।

स्थिति यह है कि लखीमपुर खीरी, पीलीभीत, सहारनपुर आदि जनपदों में तो उनके कोविड पोजटिव होने की सूचना भी आ रही है।

चिट्ठी में मांग की गई है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का बकाया वेतन जारी करने और नौकरी से निकाले पर तत्काल रोक लगाई जाए।

(जनपथ डॉट कॉम से साभार।)

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