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ये है सबसे पॉज़िटिव ख़बर, तनहाई में रखे गए मज़दूरों ने स्कूल की काया पलट कर दी

सीकर के पलसाना में बनाया गया था मज़दूरों के लिए ट्रांज़िट कैंप

मजदूर समाज से जितना लेता है उससे कहीं ज़्यादा लौटाता है। मेहनतकश तबका बेहद आत्मसम्मानी, कृतज्ञ और ईमानदार होता है, जिसे मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग समझ नहीं सकता।

ये तस्वीर राजस्थान के सीकर में पलसाना की है जहां एक गांव के हाईस्कूल को मज़दूरों के लिए ट्रांजि़ट कैंप बनाया गया था, जिसमें 54 मज़दूर ठहरे हुए हैं।

यहां विभिन्न जगहों से आए प्रवासी मजदूरों को क्वॉरेंटाइन में रखा गया था और उन्होंने स्कूल की ही तस्वीर बदल दी।

दैनिक भास्कर की एक ख़बर के अनुसार, ट्रांज़िट कैंप का निरिक्षण करने आए ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव जगत सिंह पंवार ने इसे रोल मॉडल बताया।

क्वारंटाइन में रखे मजदूरों ने देखा कि लम्बे समय से स्कूल की पुताई और साफ सफाई नहीं हुई है। तब उन मजदूरों ने सरपंच के सामने पेंटिंग और साफ सफाई करने का प्रस्ताव रखा।

क्या कोरोना वायरस मज़दूर वर्ग के ख़िलाफ़ साजिश है?

अचानक लॉकडाउन के बाद करोड़ों प्रवासी मज़दूर अपनी जगहों पर फंस गए हैं, जो घर को चले थे उनमें कितनों की रास्ते में ही मौत हो गई। लेकिन जब बांद्रा, सूरत और दिल्ली में भूख से बिलबिलाते मज़दूर सड़क पर उतर गए तो सरकारें इसे साजिश बताने लगीं। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक डॉ. सरोज गिरी से बातचीत में इसी को समझने की कोशिश की गई।

Posted by Workers Unity on Tuesday, April 21, 2020

तुरंत ही पेंट, चूना, ब्रश इत्यादि का इंतजाम हुआ और उन मजदूरों ने अपने क्वॉरेंटाइन के दौरान पूरे स्कूल की सूरत बदल दी और बदले में फूटी कौड़ी तक नहीं ली।

सरपंच ने जवाब कुछ देना चाहा तो मजदूरों ने कहा एकस्वर में कहा – “हम यहां पर रह रहे हैं, हमारा फर्ज बनता है कि हम कुछ न कुछ इस स्कूल को दें।”

बता दें कि पलसाना कस्बे के शहीद सीताराम कुमावत और सेठ केएल ताम्बी राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के 54 मजदूर ठहरे हुए हैं।

ये सभी लोग पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं और इनकी पृथकवास अवधि भी पूरी हो गयी है।

अंग्रेजों के समय से अब कितना फर्क आया है मज़दूरों के पलायन में?

उन्नीसवीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर उत्तर भारतीयों का पलायन हुआ और 1917 से 1920 के बीच जाकर रुका। उस समय के और आज के समय में प्रवासी मज़दूरों के पलायन में क्या फर्क है बता रहे हैं लेबर हिस्टोरियन प्रोफ़ेसर प्रभु मोहपात्रा।

Posted by Workers Unity on Monday, April 20, 2020

केन्द्र में ठहरे मजदूरों ने बताया कि इस दौरान सरपंच और गांव के दानदाताओं ने उनके रहने के लिए बहुत ही बढ़िया व्यवस्था की थी।

वे इस व्यवस्था से इतना खुश थे कि बदले में गांव के लिए कुछ करना चाहते थे और इसी सोच में उन्होंने स्कूल के रंग रोगन का काम शुरू कर दिया।

हालांकि क्वारंटाइन अवधि ख़त्म होने के बाद भी उन्हें वापस घर जाने की कोई सूरत नहीं दिखाई दे रही है क्योंकि सरकार इनके जाने का इंतज़ाम करने की बजाय लॉकडाउ को और कड़ा बना रही है।

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