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कोरोना के बहाने ‘तीसरा महायुद्ध’- अंतिम भाग

राहत की खुराकें व्यवस्था और मजदूर वर्ग के काम नहीं आ रही है

By आशीष सक्सेना

कोविड-19 संक्रमण अब 200 से ज्यादा देशों में फैल चुका है। अरबों लोग संक्रमण के भय में हर वक्त जी रहे हैं। हर मौत का आंकड़ा और संक्रमण की गिनती पल भर में दुनिया के कोने-कोने में पहुंच रही है।

भय के इस वातावरण में बचाव की दवा और वैक्सीन का इंतजार हर पल हो रहा है। इसके आने की तैयारियों की सूचना भी लोगों के अंदर आशा जगा रही है और वे सबकुछ उसको पाने के लिए दांव पर लगाने को जैसे तैयार बैठे हैं। सिर्फ वे ही इसका इंतजार नहीं कर रहे, जिनको बिना कोरोना संक्रमण के ही जिंदगी जीना आसान नहीं है।

इस माहौल का मतलब है कोरोना संक्रमण से बचाव की हर दवा और नुस्खा का बड़ा बाजार तैयार है। ये संयोग ही है कि ऐसी ही किसी घातक बीमारी के फैलने की उम्मीद पर फार्मा कंपनियां भविष्य के मुनाफे का गणित लगा रहीं थीं।

मार्केट रिसर्च डॉट कॉम पर 16 मई 2018 को ‘द ग्रोइंग फार्मास्टिकल मार्केट: एक्सपर्ट फोरकास्ट एंड एनालाइसिस’ लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख में बताया गया कि 2017 में 934.8 बिलियन डॉलर का वैश्विक बाजार था, जो 2021 में 1170 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है, लेकिन इसके लिए कुछ जरूरी शर्तें होंगी।

फार्मा मार्केट के आगामी लक्ष्य के विस्तार की शर्तों में खासतौर पर बताया गया कि किसी महामारी में इलाज के लिए गुणवत्तापरक आपूर्ति को दवा की खोज खास उपलब्धि हो सकती है।

इसी लेख में पेसटल (पीईएसटीईएल) एनालाइसिस फॉर फार्मा मार्केट में छह बिंदु में हेल्थ मार्केट की ग्रोथ के कारक गिनाए गए। जिसमें भारत और चीन की जीडीपी विकास वृद्धि दर 6 प्रतिशत से ज्यादा होना, आबादी के तेजी से बूढ़ा होने और सुस्त जीवनशैली के चलते गंभीर बीमारियों के बढऩे, शहरीकरण बढऩे के साथ ही प्रदूषण स्तर में बढ़ोत्तरी से अस्थमा जैसे सांस के रोगों का बढऩा खास कारक गिनाए गए।

यहां ये भी जानना जरूरी है कि वैश्विक फार्मा बाजार में अकेले अमेरिका का 25 प्रतिशत का हिस्सेदार है और चीन तीसरे नंबर पर है। चीन और भारत इस बाजार में अमेरिका के मुकाबले दोगुनी रफ्तार से जगह बना रहे थे।

इसमें कोई संदेह नहीं कि सभी तरह के बाजार को कब्जे में लेने को अमेरिका और चीन के बीच खींचतान कोरोना वायरस फैलने से पहले से लेकर अब तक जारी है। कोरोना वायरस संक्रमण के समय दोनों ही देशों एक दूसरे के सहयोगी देशों में सहायता के रूप में दखल देकर अपने लिए जगह बनाई है या फिर आगे के रास्ते आसान किए हैं।

चीन ने यूरोप समेत कई देशों में कोरोना से बचाव को दल से लेकर दवा तक की सहायता देकर अपना सिक्का जमाया है, तो अमेरिका ने चीन के पड़ोसी देशों में विश्वबैंक की सहायता से अपना दबदबा बनाने की कोशिश की है।

कोरोना वायरस को लेकर चीन-अमेरिका के बीच तनातनी में विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक की भूमिका भी संदिग्ध हो चुकी है। वैश्विक संस्थाओं ने स्वीकारना शुरू कर दिया है कि हालात 1930 की मंदी जैसे हो चुके हैं या फिर दूसरे विश्वयुद्ध के समय जैसे बेरोजगारी और लाचारी का माहौल पैदा हो गया है।

विश्व आर्थिक मंदी के गहराने के बाद नई परिस्थितियों और हालात को संभालने के लिए मौजूदा ढांचा कारगर साबित नहीं पा रहा है। राहत की खुराकें व्यवस्था और मजदूर वर्ग के काम नहीं आ रही हैं।

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