महिला

मैं हर समय गुस्से में क्यूं रहती हूं?

(चौतरफा हमलों के बीच संभ्रांत महिलाओं की चिंता में असुरक्षा एक प्रधान पहलू बन गया है. मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम में अनाथ बच्चियों को सेक्स स्लेव बनाने की घटना हो या मंदसौर में एक मासूम बच्ची के साथ बलात्कार का मामला हो, पिछले कुछ दिनों से माहौल कुछ ऐसा बन गया है कि मजबूत से मजबूत इरादे वाली महिला का साहस भी डोल जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिला सुरक्षा मामले में भारत को दुनिया का सबसे ख़तरनाक देश ठहराये जाने की खबर बचे खुचे साहस पर भी पानी डाल देती है. इन परिस्थितियों में स्त्री के अंदर एक खास किस्म का गुस्सा उपज रहा है. निधि मिश्रा ने अपने फेसबुक पोस्ट में इसी को अभिव्यक्त किया है. कुछ और पहलुओं पर बहस की जा सकती है लेकिन वाकई ये ग़ौर फरमाने वाला लेख है जिसे अद्यांत यहां पुनः प्रकाशित किया जा रहा है. सं. मंडल)

मूसलाधार बारिश के बीच स्टेशन से कार उठाकर “अकेले” अभी घंटे भर पहले घर पहुंची हूं।शहर से बाहर गयी थी कल (२८ की रात)। तब भी बारिश हो रही थी और १२:०६ मिनट की ट्रेन थी। कार वहीं स्टेशन पर पार्क करके छोड़ दी थी। घर पहुंचते ही भाई-बहनों सबको message डाले कि “Reached home safely at 1:30am”. उसके पहले message डाले थे कि “Reached station at 1:00am”.
और उससे पहले कल शहर छोड़ते समय “Reached station at 11:00pm” फिर पटना पहुंच कर “Reached Patna at 5:00am” , फिर पटना में होटल पहुंच कर “Reached hotel at 6:30am” और पटना से निकलते समय “Boarded train at 7:15pm.”!

प्रकृति से मैं बिल्कुल भीरु नहीं।

डरना मेरी फितरत में नहीं। मां ने डरना सिखाया ही नहीं।भाई-बहन सब ही यह बात जानते हैं। बहनों में सबसे छोटी और उन ही की सीखी-सिखाई हूं। भरोसा भी है उन्हे मेरी समझदारी पर। लेकिन मौजूदा हालात को देख कर चिंतित हो जाते हैं। और खासकर अगर रात में “अकेले” शहर में ड्राइव करना हो।

इतनी सुंदर दुनिया बनायी है आप सबने औरतों के लिए, कि सैंतालीस साल कि उम्र में आकर अब मिनट टू मिनट अपने कुशल होने का सबूत देना पड़ रहा है। रात में अकेले जाना औरत के लिए खतरे से खेलने जैसा बना दिया गया है। क्यों?

रात को क्या मैं देश की दोयम दर्जे की नागरिक (lesser citizen) हो जाती हूं??

और आप पूछते हैं कि मैं हर समय गुस्से में क्यों रहती हूं?

इतना ही नहीं ,रात को लौटते समय कई लड़के दिखे स्टेशन पर भी और सड़क पर भी । अपने ठिकाने को जाते हुए। कुछ मस्ती में तो कुछ मजबूरी में…..मूसलाधार बारिश में भीगते हुए! थोड़ा रश्क हुआ उनसे और थोड़ा तरस आया उन पर।कई बार कार धीमी करी यह सोच कर कि उनको लिफ्ट दे दूं। १८-२५ साल के बीच रहे होंगे ज़्यादातर। मेरे बेटे की उम्र के। लेकिन इतनी सुंदर दुनिया बनाई है आपने बार बार “men will be men” & “boys will be boys” की घोषणा कर के कि मानवता को ताक पर रखना पड़ा और बिना रुके निकल गई। अपने बच्चे के उम्र के लड़कों पर भी भरोसा ना कर सकूं, इतना सशंकित बनाने के लिए आप सबको बहुत बहुत धन्यवाद।

फिर आप पूछते हैं कि मैं हर समय गुस्से में क्यों रहती हूं?

पंद्रह दिन पहले अपने पार्टनर के साथ सफर कर रही थी। वही ट्रेन। रात में २:००बजे वाशरूम जाने की जरूरत महसूस हुई।वाशरूम महज दो कंपार्टमेंट दूर। पूरी ट्रेन में सन्नाटा पसरा हुआ था। पंकज को जगाया कि “उठो,ज़रा मेरे साथ चलो, वाशरूम जाना है”! पंकज को पहले तो समझ ही नहीं आया, कुनमुना कर वापस सो गये। फिर बोले कि तुम जाओ मैं जगा हुआ हूं, तुम्हें देर लगेगी तो आ जाउंगा”!

उनके लिए यह बिल्कुल अप्रत्याशित था कि दो छोटे छोटे बच्चों को लेकर “अकेले” सफर करने की आदी उनकी २२ साल “पुरानी” पत्नी,दो जवान बेटों की मां, वाशरूम जाने के लिए आज अचानक उनका साथ ढूंढ रही है।

उन्हें रात चढ़े मैं क्या बताती कि उस ही दिन सुबह के अखबार में डेढ़ दर्जन बलात्कारों की ख़बरों के बीच एक खबर यह भी थी कि ट्रेन के वाशरूम में मां-बेटी का बलात्कार करके ,ट्रेन से ढ़केल दिया गया। खैर “अकेले” गई औरत सुरक्षित वापस आ गई। औरतों के अकेले वाशरूम जाने को भी जंग बना देने के लिए आप सबका शुक्रिया।

क्या आप अब भी जानना चाहेंगे कि मैं हर समय गुस्से में क्यूं रहती हूं?

मैं अपना टैक्स समय से भरती हूं। कोई काला धन नहीं मेरे पास।सारे ट्रैफिक नियम यथा संभव पालन करती हूं।पालिथिन का प्रयोग छोड़े १५-१६ साल हो गये। स्वच्छता अभियान के अवतरित होने से बहुत पहले से सड़क पर कचरा ना फेंकने को लेकर जागरूक हूं।सड़क पर वृक्षारोपण करती हूं।पब्लिक नल से पानी टपकता देखती हूं तो भी हमेशा बंद करती हूं। स्कूल-कालेज के साथी गवाह हैं कि क्लास/लेक्चर थियेटर से हमेशा आखिर में निकलती थी……..पंखे-लाइट्स सब बंद करके।
यानि संक्षेप में, अपने देश और उसके लोगों से बेइंतहा मोहब्बत करती हूं। इतनी मोहब्बत कि जो आपका छिछला राष्ट्रवाद और खोखला नेशनलिज्म, नाप ना सके। लेकिन फिर भी इस देश‌ को “अकेले” navigate करने के लायक नहीं छोड़ा आप सबने,इस बात का शुक्रिया।

फिर मत पूछिएगा कि मैं हर समय गुस्से में क्यूं रहती हूं?

दिनों-रात, औरत के temporarily भी “अकेले” होने को कहीं इंसान से कमतर होने का एहसास ,औरतों के दिलो-दिमाग पर काबिज़ रहता है।

आप को इस बात पर गुस्सा नहीं आता, इसलिए मुझे हर समय गुस्सा आता है।

आप का गुस्सा चुनिंदा प्रदेश में,या चुनिंदा धर्म की औरतों के चुनिंदा बलात्कारों पर ही दिखता है। मुझे इसलिए हर समय गुस्सा आता है।

आप उन बलात्कारों को विपक्ष को‌‌ मात्र नीचा दिखाने का हथियार बनाए रखना चाहते हैं, मैं इसलिए हर समय गुस्से में रहती हूं।

आप “अकेली” औरत के दुर्भाग्य को “विधवा-विलाप” और “रंडी-रोना” जैसा मुहावरा बनाकर विपक्षियों के लिए इतनी अश्लील मात्रा में अपनी भाषा में प्रयोग करते हैं कि कहीं यह लगता है कि या तो विधुर ,पत्नी के मरने पर लड्डू बांटते होंगे या विधवाएं रोने की ‌नौटंकी करती होंगी। आपको इस मर्दवादी भाषा की अश्लीलता दिखाए नहीं दिखती, इस लिए मैं हर समय गुस्से में रहती हूं।

आप औरतों को बेवकूफ,झगड़ालू,ईष्यालु, शंकालु,लालची बताने वाले चुटकुलों पर खी-खी,खी-खी , खींसे निपोर कर हंसते हैं। चुटकुलों में उनको कमतर‌ बनाना ,समाज में उनकी स्थिति को कमतर बनाए रखने का हिस्सा है, यह आप तमाम डिग्री-डिप्लोमा के बावजूद , जानबूझकर समझना नहीं चाहते, इस लिए मैं हर समय गुस्से में रहती हूं।

आप यह लेख पढ़ कर एक कुटिल मुस्कान या घाघ हंसी के साथ अपने किसी पुरुष साथी को हाई-फाइव करते हुए कहेंगे कि “भैया, इनको किससे डर है,इन से तो‌ मर्द खुद ही डरते हैं” और फिर गाभिन बकरी से गैंगरेप की खबर को पढ़ते हुए थोड़ा और खिखियाएंगे, मैं इस लिए हर समय गुस्से में रहती हूं।

और‌ हां, मेरे गुस्से के कारण को जानबूझकर नज़रअंदाज़ करके आप, “आप हर समय गुस्से में क्यूं रहती हैं?” यह प्रश्न उछाल कर मेरे गुस्से को नाजायज़ और गैर ज़रूरी ठहराने की जो मर्दवादी कोशिश करते हैं, मैं इसलिए हर समय गुस्से में रहती हूं।

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