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गुजरात में आदिवासी महिला खेतिहर मज़दूर से फार्मर ने किया रेप, तीन हफ़्ते बाद केस दर्ज

लॉकडाउन में यातायात बंद होने पर जबरन दंपति को फार्म पर रोककर कराया जा रहा था काम

कम पगार पर हाड़तोड़ मेहनत, फिर भी आबरू की हिफ़ाजत का कोई इंतजाम नहीं। इन हालात में जहां केंद्र सरकार महिलाओं से किसी भी समय, कहीं भी काम करने को आजादी बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है।

वहीं गुजरात में फार्म पर काम करने वाली महिला मजदूर के साथ मालिक ने दो बार बलात्कार किया और तीन सप्ताह बाद बमुश्किल एफआईआर दर्ज हुई।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, दुष्कर्म पीड़िता 22 वर्षीय आदिवासी महिला मजदूर गुजरात के दाहोद की रहने वाली है और 11वीं कक्षा तक पढ़ाई की है। उसने घटना के बाद डिप्रेशन से उबरने पर सामाजिक कार्यकर्ता को आप बीती सुनाकर इंसाफ दिलाने की गुहार लगाई।

पीड़िता ने बताया कि पिछले साल दिसंबर के महीने में पति के साथ कैजुअल लेबर बतौर कच्छ के अंजर तालुका में रतनाल स्थित फार्म पर मजदूरी को गई थी।

मार्च में कोरोना महामारी के चलते यातायात बंद हो गया और वे किसी भी तरह घर जाने की सोच रहे थे, तभी फार्म मालिक आरोपी रणछोड़ अहीर ने जबरन रोक लिया।

तबसे वो खेत में काम करने के साथ ही घरेलू काम भी करने लगी। पीड़िता का आरोप है कि 16 सितंबर की शाम, जब वो फार्म के छोटे से कमरे में अकेली थी मालिक ने उसके साथ ज़बरदस्ती की। पीड़िता के अनुसार, शारीरिक हिंसा का डर दिखा कर फार्म मालिक ने उसके साथ दो बार रेप किया।

यही नहीं शिकायत करने पर मालिक ने पति को जान से मार डालने की धमकी दी जिसके बाद पति पत्नी वहां से निकल गए।

पीड़िता ने बताया कि मोबाइल बेचकर किसी तरह हम लोग गोधरा पहुंचे। इस सदमे से उबरने के बाद किसी के कहने पर वे लोग अहमदाबाद की समाजसेवी मीना जाधव और साबरमती की समाजसेवी प्रीती ओझा से मिले।

वकील की मदद से पुलिस में दुष्कर्म और एससी एसटी एक्ट के तहत आरोपी पर मुकदमा दर्ज कराया गया।

इस तरह की घटनाएं मजदूर महिलाओं के साथ होने की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं, लेकिन श्रम कानूनों में छूट से बेलगाम मालिक और ठेकेदार बेखौफ हैं। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने हाल ही में रात की पाली या देर शाम तक महिलाओं से काम लेने के नियम को बना दिया।

संयुक्त राष्ट्र महिला और अंतरराष्ट्रीय महिला अनुसंधान केंद्र की रिपोर्ट बताती है कि कार्यस्थलों पर यौन हमलों से महिला कामगार दहशत महसूस करती हैं। अधिकांश मामलों में न शिकायत दर्ज हो पाती है और मीडिया की सुर्खियों में मजदूर महिलाओं के साथ यौन अपराध की घटनाएं मुद्दा बनती हैं।

निर्भया केस के बाद हुए एक सर्वे में 73 प्रतिशत महिलाओं ने आस-पड़ोस से होने वाली यौन हिंसा की बात कही। जबकि सर्वे में शामिल आधी महिलाओं ने हर जगह हर समय खुद को असुरक्षित कहा। बीस प्रतिशत महिलाओं ने यहां तक कहा कि दिन में भी अकेले बाहर जाने में डर लगता है, जबकि दस प्रतिशत ने अकेले बाहर नहीं निकलने की बात कही। अंधेरा होने के बाद बाहर जाने के खौफ में 63 प्रतिशत महिलाओं दिखाई दीं।

इस रोशनी में देखा जाए तो मजदूर महिलाएं कार्यस्थलों पर बहुत ही असुरक्षित माहौल में होती हैं। फार्म, फैक्ट्री, कारखानों में बड़ी तादाद में दूरदराज से आकर सामाजिक तौर पर प्रताडि़त समुदायों की महिलाओं के लिए ये माहौल अस्मत से लेकर जान तक पर खेलकर जीविका कमाने की चुनौती बनी हुई है।

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