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भगत सिंह ने मज़दूर विरोधी ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल के ख़िलाफ़ असेंबली में फेंका था बम

शहीदे आज़म भगत सिंह के 113वें जन्मदिन पर विशेष- नज़रिया

By एस. कुमार

भगत सिंह के 113वें जन्मदिन पर देश में वैसी ही परिस्थियां बन गई हैं, जैसी अंग्रेज़ी गुलामी के दौर में थीं। किसानों और मज़दूरों के भयंकर शोषण के नीचे भारत कराह रहा था।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि भगत सिंह ने ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल के विरोध में संसद में बम फेंका था। चंद्रशेखर आज़ाद की अगुवाई वाली हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना (एचएसआरए) के निर्देश पर इस साहसिक कार्य को भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त ने अंजाम दिया।

जिस ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल 1929 के ख़िलाफ़ भगत सिंह ने आठ अप्रैल 1929 को ग़ुलाम भारत की असेंबली में बम फेंका था, उसी संसद में आज मज़दूरों को बंधुआ बनाने वाले लेबर कोड पास किए जा चुके हैं।

बम फेंकने के बाद भगत सिंह के साथी बटुकश्वर दत्त ने जो पर्चा बांटा था उसमें ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल के अलावा, पब्लिक सेफ़्टी बिल और लाला लाजपत राय की मौत का ज़िक्र किया गया था।

ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल 1929 में वही प्रावधान थे, जिन्हें अब लेबर कोड के रूप में जल्द ही पूरे भारत में लागू कर दिया जाएगा।

अंग्रेज़ों द्वारा लाए गए ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल में सभी आवश्यक सेवाओं वाले उद्योगों में हड़ताल पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके अलावा अन्य उद्योगों में सिर्फ औद्योगिक विवाद में ही हड़ताल की इजाज़त दी गई थी।

इसमें साफ़ साफ़ लिखा गया था कि औद्योगिक विवाद के अलावा किसी और उद्देश्य से की गई हड़ताल गैरक़ानूनी होगी। औद्योगिक विवाद को भी केवल कोर्ट के मार्फ़त सुलझाया जाएगा।

बम फेंकने के बाद संसद में जो पर्चा फेंका गया उसमें मज़दूरों के ख़िलाफ़ लाए जा रहे क़ानून की कड़ी निंदा की गई थी।


पर्चे में क्या लिखा था?

विदेशी सरकार ‘सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक‘ (पब्लिक सेफ्टी बिल) और ‘औद्योगिक विवाद विधेयक‘ (ट्रेड्स डिस्प्यूट्स बिल) के रूप में अपने दमन को और भी कड़ा कर लेने का यत्न कर रही है। इसके साथ ही आनेवाले अधिवेशन में ‘अखबारों द्धारा राजद्रोह रोकने का कानून‘ (प्रेस सैडिशन एक्ट) जनता पर कसने की भी धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करनेवाले मजदूर नेताओं की अन्धाधुन्ध गिरफ्तारियाँ यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैये पर चल रही है…

…जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखण्ड को छोड़ कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के विरूद्ध क्रांति के लिए तैयार करें। हम विदेशी सरकार को यह बतला देना चाहते हैं कि हम ‘सार्वजनिक सुरक्षा‘ और ‘औद्योगिक विवाद‘ के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं।


लेबर कोड कैसे है अंग्रेज़ी क़ानून जैसा?

मोदी सरकार ने 44 श्रम क़ानूनों को ख़त्म करके चार लेबर कोड बिल संसद से पास करवा लिए हैं। इनमें मज़दूरी, औद्योगिक सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा, ट्रेड यूनियन एक्ट, औद्योगिक विवाद अधिनियम आदि को ख़त्म कर दिया गया है।

नए क़ानूनों के अनुसार, अब आवश्यक सेवा क्षेत्र को विस्तारित कर अन्य उद्योगों में भी हड़ताल को प्रतिबंधित कर दिया गया है या उसे इतना मुश्किल कर दिया गया है कि व्यावहारिक रूप से हड़ताल की संभावना ख़त्म हो जाए।

ट्रेड यूनियन एक्ट को ख़त्म कर उसकी जगह यूनियन मान्यता को इतना संकीर्ण कर दिया गया है कि अव्वल तो नई यूनियन गठन लगभग असंभव हो जाएगा और जो यूनियनें पहले से मौजूद हैं, उनकी मान्यता रद्द करने का अधिकार सरकारी अधिकारी को मिल जाएगा।

काम के घंटे को बढ़ा दिया गया है और ठेका मज़दूरी को तरह तरह के क़ानूनों के मार्फ़त क़ानूनी बना दिया गया है।

शायद यही कारण है कि मज़दूरों और किसानों के लिए भगत सिंह आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। क्रांति के ज़रिए आज़ादी हासिल करने और इसमें मज़दूर वर्ग में क्रांतिकारी विचार ले जाने की बात भगत सिंह ने कही थी।

आज जब मज़दूर वर्ग के हाथ में कुछ नहीं बचा है, भगत सिंह के विचारों की अहमियत और बढ़ गई  है।

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