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केरल से 8 लाख प्रवासी मज़दूर अपने गांव लौटे, खाड़ी से आए 70 हज़ार

इतनी जलालत झेलने के बाद मज़दूर वर्ग और किसान कुछ सबक लेगा- नज़रिया

By नन्हें लाल

मार्च के अंतिम सप्ताह में केंद्र सरकार द्वारा लॉकडाउन घोषित होने के बाद केरल राज्य से तीन लाख प्रवासी मजदूर अपने घरों को लौट चुके हैं जबकि लॉकडाउन से ठीक पहले अकेले इसी राज्य से पांच लाख प्रवासी मजदूर अपने गांव लौट चुके थे।

23 जून 2020 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट से पता चलता है कि लॉकडाउन के बाद तीन लाख प्रवासी मजदूर अपने गांव को लौटे हैं।

इन मजदूरों को राज्य सरकार ने बसों और ट्रेनों के माध्यम से उन्हें भेजा है। इनमें प्रवासी मजदूरों की वह संख्या शामिल नहीं है जो अपने गृहस्ती के सामान अपने सर पर लादे  छोटे बच्चों के साथ पैदल ही रास्ता नापते हुए निकल पड़े थे।

सरकार द्वारा लॉकडाउन में थोड़ी ढील मिलने के बाद मजदूरों की भारी कमी कमोवेश सभी औद्योगिक शहर महसूस कर रहे हैं। केरल में ज्यादातर मजदूर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल के काम कर रहे थे।

प्रवासी मजदूरों में ज्यादातर संख्या निचली जातियों की होती है। मध्य प्रदेश में वापस लौटे मजदूरों के सर्वे में यह बात सामने आई है।

उनके पास परंपरागत रूप से खेती बाड़ी की जमीन नहीं होती है और कुछ है भी तो इतना कम है उससे परिवार का भरण पोषण संभव नहीं हो पाता। अपने देश की बड़ी आबादी जाति व्यवस्था से परंपरागत रूप से पीड़ित है रही है।

इस आबादी को बुनियादी शिक्षा भी हासिल नहीं है। जागरूकता की कमी के वजह से वे संगठित होकर राजनीतिक पार्टियों से अपने इलाकों में रोजगार के साधन विकसित करने के लिए उन्हें बाध्य करने के बजाए जातिवादी और हिंदू मुस्लिम की राजनीति में फंसकर अपना और अपने बच्चों का भविष्य चौपट कर रहे हैं।

केरल देश के विकसित राज्यों में से एक है जहां साक्षरता लगभग 99% है। इससे प्रदेश के ज्यादातर मजदूर अपने हैसियत के अनुसार पढ़ाई पूरी कर खाड़ी देशों में काम की तलाश में चले जाते हैं।

इस राज्य में आए हुए प्रवासी मजदूर भवन निर्माण, उद्योग और खेती के कामों में अपना श्रम बेचते हैं। केरल के एक जिला कोझीकोड मैं निर्माण और उत्पादन के क्षेत्र में ठेका मजदूर मुहैया कराने वाले शमीर वी. टी. ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि लॉकडाउन से पहले उनके पास 150 मजदूर थे लेकिन अब जून के अंतिम सप्ताह में मात्र 6 मजदूर मौजूद हैं।

शमीर वी. टी. केरल के उत्तरी जिलों में भवन निर्माण में ठेका मजदूर मुहैया कराते थे। इनमें ज्यादातर मजदूर उत्तर पूर्व के थे। लॉकडाउन  से पहले इन अकुशल मजदूरों की दिहाड़ी ₹700 से ₹800 की थी लेकिन अब वे ₹1000 मांग रहे हैं।

केरल के जो मजदूर खाड़ी देशों में काम कर रहे थे इस महामारी के चलते ज्यादातर की नौकरी छूट गई है। 23 जून तक 72 हज़ार मजदूर खाड़ी देशों से वापस केरल आ चुके हैं और एक लाख और मजदूरों के आने की संभावना है।

राज्य के श्रम मंत्री टी.पी राधाकृष्णन खाड़ी देशों से लौट रहे केरल के मजदूरों को उम्मीद की निगाह से देख रहे हैं।

उनका मानना है कि प्रवासी मजदूरों की कमी की भरपाई खाड़ी देशों से लौट रहे मजदूर कर सकते हैं। केरल सरकार चाहती है कि यह मजदूर अपने काम के क्षेत्र के कुशलता के बारे में राज्य के श्रम विभाग में नामांकन कराएं ताकि कार्यकुशलता के अनुसार भवन निर्माण, उद्योग और खेती के कामों में लगाया जा सके।

केरल सरकार और उद्द्योगपति आवश्यकता पड़ने पर मजदूरों को क्वारंटाइन की सुविधा देने को भी तैयार हैं।

मजदूरों की कमी से राज्य के भवन सड़क व अन्य निर्माण कार्य बुरी तरह प्रभावित हुआ है। राज्य के 90% काम अकुशल और 40% काम अर्ध कुशल प्रवासी मजदूरों पर निर्भर था।

मजदूरों की कमी के बारे में चिंता जाहिर करते हुए केरला बिल्डर एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी जॉर्ज थॉमस ने कहा कि आने वाले दिनों में मुश्किलें और भी बढ़ सकती हैं।

लॉकडाउन से पहले त्रिवेंद्रपुरम के एक भवन निर्माण साइट पर 2000 प्रवासी मजदूर काम करते थे। अब मात्र 300 ही मजदूर बचे हैं।

इसी तरह केरल सरकार के निर्माण कार्य में ठेका मजदूर सप्लाई करने वाली संस्था ‘ठेका मजदूर सहकारी समिति’ के पास लॉकडाउन से पहले 4000 मजदूर थे लेकिन अब मात्र 1000 प्रवासी मजदूर ही बचे हैं।

समिति के कार्यकारी प्रबंधक शाजु एस स्थिति से निपटने के लिए खाड़ी देशों से वापस लौट रहे मजदूरों को लेने का इरादा बनाया है।

मध्य केरल के एर्नाकुलम में प्लाईवुड और आरा मशीन कारोबार लड़खड़ाने लगा है। इस उद्योग में प्रवासी मजदूरों की सबसे ज्यादा संख्या थी।

मजदूरों की कमी का आलम ऐसा है कि इससे उत्पादन में 40% कमी दर्ज की गई है। लॉकडाउन से पहले केरल राज्य के उद्योगों में प्रवासी मजदूर रीढ़ बने हुए थे।

लॉकडाउन के कारण ज्यादातर मजदूर अपने गांव लौट चुके हैं जो बचे हैं वह अब पहले से ज्यादा दिहाड़ी की मांग पर अड़े हुए हैं।

राज्य के खेती-बाड़ी में भी यही समस्या बनी हुई है। पलक्कड़ जिला जो धान की पैदावार के रूप में जाना जाता है, कृषि विभाग के अधिकारियों का मानना है कि प्रवासी मजदूरों की कमी से धान की खेती भी काफी प्रभावित होगी।

यहां धान की रोपाई और देखभाल ज्यादातर बंगाल और तमिलनाडु के प्रवासी मजदूर ही करते थे।

अनन्नास खेतिहर संगठन के अध्यक्ष बेबी जॉन कहते हैं कि हर साल जून महीने में 15000 एकड़ में अनन्नास की खेती होती थी किंतु इस बार लॉकडाउन से प्रवासी मजदूरों के चले जाने के कारण 300 एकड़ से ज्यादा बुवाई संभव नहीं है।

प्रवासी मजदूरों के न्याय के लिए लड़ने वाले प्रगतिशील श्रमिक आंदोलन से जुड़े जॉर्ज मैथ्यू इस विकट स्थिति में सुधार की संभावना को देखते हैं।

उनका मानना है कि अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है। उनके पास प्रवासी मजदूरों का फोन आ रहा है कि वह बढ़े हुए मजदूरी पर वापस आने को तैयार हैं।

अब देखना यह है कि सरकार द्वारा लॉकडाउन में उन्हें अपने रहमोकरम पर छोड़ देने और अपनी जिजीविषा को साबित करने वाले देश की अर्थव्यवस्था का सिरा धमनी बने मजदूर-किसान मेहनतकश जनता, मात्र अपने दोजून की रोटी के लिए ही फिर से मालिकों के मुनाफे की बढ़ोतरी में लग जाएगी या सम्पति के संपूर्ण संसाधनों पर अपनी दावेदारी के लिए संगठित तैयारी करेगी।

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