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घोर सरकारी निकम्मेपन ने देश को घनघोर बेरोज़गारी के दुष्चक्र में फंसा दिया

अभूतपूर्व बेरोजगारी और भारतीय पूंजीवादः समाजवाद ही अंतहीन बेरोज़गारी का आख़िरी विकल्प- नज़रिया

By प्रसाद वी

कोरोना के कारण किए गए लॉकडाउन ने भारत में बेरोजगारी दर को इतिहास में कभी न देखे गए स्तर तक पहुंचा दिया है। संकट इस वजह से और भी गंभीर हुआ क्योंकि सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता तक के लिए कोई व्यापक श्रम साध्य कार्यक्रम नहीं लिया जैसा ऐसे संकटों में पहले पूंजीवादी देशों तक में लिया जाता रहा है। इसके बजाय मोदी सरकार इसके आँकड़ों पर ही पर्दा डालने में लगी है। अतः सिर्फ आंशिक आँकड़े ही सार्वजनिक हुए हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) के अनुसार अप्रैल में 12.2 करोड़ व्यक्ति बेरोजगार हुए जिसमें से 75% दिहाड़ी मजदूर और छोटे कारोबारी थे हालाँकि बड़ी तादाद में वेतन भोगी भी बेरोजगार हुए हैं।

मई 2020 के उपलब्ध आँकड़ों अनुसार भारत में बेरोजगारी दर अमरीका की चार गुना अर्थात 27% थी अर्थात हर चौथा व्यक्ति बेरोजगार। परिणामस्वरूप शहरों से भाग अपने गाँवों-घरों को पैदल ही निकल पड़े विवश प्रवासी मजदूरों की मीडिया में छाई तस्वीरें हम सबने देखी हैं जो इतिहास की एक महाकाय मानवीय त्रासदी थी। लॉकडाउन में बाद में दी गई छूटों के बाद भी बेरोजगारी की स्थिति में अब तक कोई खास सुधार नहीं हुआ है।

संसद में इस मुद्दे पर हुई चर्चा भी इस गंभीर संकट पर मौजूदा सरकार के नितांत अमानवीय लापरवाही भरे रवैये की गवाही देती है। सांसद डेरेक ओ ब्रायन द्वारा बेरोजगारी के माहवार आँकड़ों के सवाल के उत्तर में श्रम मंत्री ने इसका जवाब देने के बजाय साल 2018-19 के बेरोजगारी आँकड़े बता दिये। इसी प्रकार पिछले छह महीनों में महामारी संबंधित प्रतिबंधों से कितने रोजगार खत्म हुए सवाल के जवाब में श्रम राज्य मंत्री संतोष गंगवार ने 16 सितंबर को यह जवाब दिया, “साल 2018-19 के सावधिक श्रमबल सर्वेक्षण के अनुसार देश में सभी आयु वर्ग की सामान्य स्थिति अनुसार अनुमानित बेरोजगारी दर 5.8% थी।”

अन्य सांसदों के सवालों के भी मंत्री ने ऐसे ही उल्टे-सीधे जवाब दिये अर्थात वास्तव में मासिक बेरोजगारी दर और इस पर लॉकडाउन के प्रभाव के बारे में किसी भी सवाल का जवाब देने से ही इंकार कर दिया।

मोदी सरकार की नाकामी

कोविद-19 के कारण लॉकडाउन ने भारत सहित दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाओं पर अपना कहर ढाया है। सरकार ने इससे राहत के नाम पर प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना, आत्मनिर्भर भारत तथा प्रधानमंत्री गरीब कल्याण रोजगार अभियान आदि के नाम से रोजगार सृजन हेतु कुछ तथाकथित कार्यक्रम भी आरंभ किए हैं।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी प्रोत्साहन पैकेज के नाम पर 5 चरणों में कई लंबे लंबे ऐलान किए थे किन्तु उससे भी अर्थव्यवस्था में मांग, उत्पादन और रोजगार सृजन की स्थिति में कोई विशेष सकारात्मक अंतर नहीं पड़ा है।

भारतीय जनता पर लॉकडाउन थोपे जाने के पहले ही देश में बेरोजगारी की दर बहुत ऊँचे स्तर पर पहुँच चुकी थी। आधिकारिक आँकड़ों अनुसार यह तभी जुलाई 2017 के 3.4% से बढ़कर 8.7% हो चुकी थी। लॉकडाउन ने स्थिति को और भी भयावह बनाया है। उधर कई वित्तीय सलाहकार/विश्लेषक पहले ही वित्तीय वर्ष 2020-21 में अर्थव्यवस्था के 10-12% सिकुड़ने की संभावना व्यक्त कर चुके हैं।

यद्यपि अप्रैल के बाद से लॉकडाउन के प्रतिबंधों में काफी ढील दी जा चुकी है फिर भी इससे अर्थव्यवस्था में सुधार का कोई रुख दिखाई नहीं दिया है और बेरोजगारी दर अभी भी उच्च स्तर पर बरकरार है। उधर, हालाँकि लॉकडाउन लगाने का मकसद कोरोना महामारी को रोकना बताया गया था किन्तु इससे उसके प्रसार में भी कोई बाधा नहीं पड़ी है।

न सिर्फ लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था को गहरी मंदी की हालत में पहुँचा दिया है बल्कि कोरोना महामारी से निपटने के इस गैरवैज्ञानिक प्रबंधन ने महामारी के प्रसार को भी और तेज ही किया है।

पिछले महीनों-सप्ताहों में हवाई यात्रा, पर्यटन, होटल-रेस्टोरैंट, वाहन, फुटकर व्यापार, आदि क्षेत्रों की कई बड़ी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर छँटनी की है। जहाँ तक लघु व मध्यम कारोबारों का प्रश्न है अभी भी यह कह पाना मुश्किल है कि भविष्य में इनमें से कितने वापस काम शुरू कर पायेंगे। इसकी वजह से नौकरियों में होने वाली भारी कमी और वेतन कटौती से आर्थिक सुधार की संभावना और भी क्षीण होती जा रही है।

महामारी से पीड़ितों को आत्मनिर्भरता का स्लो प्वाइज़न

इसलिए महामारी से निपटने की तैयारी और इसके प्रबंधन में सरकार द्वारा दिखाये गए घोर निकम्मेपन और पूर्ण नाकामयाबी का परिणाम आर्थिक गिरावट और बेरोजगारी का घनघोर दुष्चक्र है। मोदी सरकार ने महामारी जनित बेरोजगारी से निपटने के लिए अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में रोजगार सृजन के लिए भी कुछ नहीं किया है।

सरकार कोविद-19 के प्रसार की रोकथाम के लिए ही कई बड़े कार्यक्रम ले सकती थी जैसे सार्वजनिक स्थलों की नियमित सफाई और कीटाणुनाशन-विसंक्रमण, भौतिक दूरी रख सकने के लिए सार्वजनिक सेवाओं-सुविधाओं की व्यापक पुनर्संरचना, व्यापक सामाजिक कोरोना टेस्टिंग अभियान, भंडारित खाद्यान्नों का व्यापक वितरण, आदि। इनमें निजी कंपनियों से छँटनी हुए बेरोजगारों को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलता।

आतीत में ऐसे संकटों के दौरान पूंजीवादी देशों में भी ऐसे कितने ही विशाल रोजगार सृजन कार्यक्रम आरंभ किए ही जाते थे। किन्तु मौजूदा मोदी सरकार ने ऐसे सभी प्रस्तावों-सुझावों को पूरी तरह नजरअंदाज किया है। उधर उसके ही बड़े ढ़ोल-नगाड़ों के शोर के साथ घोषित आत्मनिर्भर भारत योजना का भी महामारी पीड़ित जनता को रोजगार दिलाने में कहीं कोई क्रियान्वयन व असर दृष्टिगोचर नहीं हुआ है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के दौर में जब इसमें विश्व औसत की दोगुनी अर्थात सालाना 7-8% वृद्धि हो रही थी तब भी इसकी सालाना रोजगार वृद्धि दर 1% ही थी जबकि उदारीकरण पूर्व इसकी आधी 3-4% सालाना वृद्धि के काल में रोजगार वृद्धि दर इसकी दोगुना अर्थात सालाना 2% थी। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की उच्च वृद्धि दर के दौर का चारित्रिक लक्षण था।

उदारीकरण पश्चात दौर में अर्थव्यवस्था में कई कारणों से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर रोजगार सृजन की दर से असंबद्ध हो चुकी है। उत्पादन प्रक्रिया के अभूतपूर्व यंत्रीकरण और उच्च कौशल के प्रयोग द्वारा प्रति श्रमिक उत्पादकता की दर में चक्रवृद्धि दर से कई गुना इजाफा हुआ है। भारतीय औद्योगिक पूंजीपति के वैश्विक पूंजीवादी उत्पादन का अंग बनने से पैदा भारी होड़ ने इस प्रक्रिया को अत्यंत तीव्र किया है।

बेरोज़गारी- पूंजीवादी बीमारी

साथ ही लघु दस्तकारी आधारित पुरातन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के ध्वंस और जमीन मालिकाने के केंद्रीकरण ने भी पहले के बहुतेरे छोटे रोजगारों को नष्ट कर दिया है। अतः सभी मुख्य उद्योगों में उत्पादन व उत्पादकता में वृद्धि होने के साथ रोजगार सृजन की दर कम हुई है। किन्तु यह उद्योगपतियों के लिए प्रसन्नता की बात थी क्योंकि उदारीकरण ने उन्हें औद्योगीकरण के शिखर पर पहुंचाने के साथ ही लगभग मुफ्त जमीन, खनिज, अन्य संसाधन एवं बहुत सी रियायतों के रूप में बहुमूल्य उपहार प्रदान किए।

पूंजीवाद में बेरोजगारी एक दुष्चक्र है। जैसे जैसे श्रमिक बेरोजगार होते हैं उनकी उपभोग क्षमता कम होती है और वे जरूरी उपभोक्ता वस्तुएं नहीं खरीद पाते। ऐसे उत्पादों का बाजार संकुचित होता है और पूंजीपतियों को उत्पादन कम करना पड़ता है। इससे उनकी लाभप्रदता कम होती है और उसे बरकरार रखने के लिए पूंजीपति श्रमिकों की और भी छँटनी करते हैं। इस तरह बेरोजगारी बाजार संकुचन करती है और बाजार संकुचन बेरोजगारी बढ़ाता है और यह एक दुष्चक्र बन जाता है।

महामारी के आरंभ के वक्त ही भारत की पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था अपने कारणों से ही गंभीर संकट में फंसी हुई थी। महामारी ने इसको संकट के इस ढलान पर और भी तेज धक्का दे दिया है। बेरोजगारी का संकट पहले से ही गंभीर था पर महामारी ने तो इसे चरम अभूतपूर्व स्थिति में पहुँचा दिया। ऊपर से मौजूदा मोदी सरकार ने इस स्थिति में मेहनतकश जनता को राहत देने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था में भी रोजगार सृजन के जो तात्कालिक कार्यक्रम हाथ में लिए जा सकते थे वह भी करने का रत्ती भर प्रयास तक नहीं किया।

श्रमिकों की संख्या में कटौती द्वारा बेरोजगारी पूंजीपतियों के फैसलों का परिणाम होती है। पूंजीपतियों के लिए श्रमिकों की संख्या तय करने की एकमात्र कसौटी उनकी लाभ की दर है। अतः पूंजीपति वर्ग के निर्णय पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के नियमों की जरूरत से चालित होते हैं, नहीं तो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के नियम से उन्हें दुष्परिणाम भुगतने होते हैं।

निर्णय पूंजीवादी आर्थिक नियमों के अनुरूप हों तो उन्हें लाभ होता है। लाभ के नियम से संचालित पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था ऐसे ही चलती है। अतः महामारी का वक्त हो या अन्य कोई वक्त पूंजीपतियों के लाभ को बढ़ाने की दृष्टि से किए गए निर्णय से होने वाली बेरोजगारी या अन्य मुश्किलें पूंजीवादी आर्थिक पद्धति का अनिवार्य नतीजा हैं।

बेरोज़गारी बढ़ना, यानी मुनाफ़ा बढ़ना

पूंजीपति वर्ग बिना श्रमिकों की श्रम शक्ति खरीदे लाभ अर्जित नहीं कर सकता। श्रमिक भी बिना रोजगार के जीवित नहीं रह सकते। अतः औद्योगिक उत्पादन व्यवस्था का जारी रहना दोनों वर्गों की आवश्यकता है। सरकार भी बिना औद्योगिक उत्पादन के नहीं चल सकती क्योंकि सरकार की कर आय भी औद्योगिक उत्पादन से प्राप्त मुनाफे का ही एक हिस्सा है। तब इन निरंतर आर्थिक संकटों की वजह क्या है जो लाभ की दर कम करते हैं तथा बेरोजगारी बढ़ाकर श्रमिकों का जीवन भी तकलीफदेह बनाते हैं?

अन्य विकसित पूंजीवादी देशों की तरह ही भारतीय पूंजीवादी अर्थव्यवस्था भी एक के बाद एक आर्थिक संकटों से गुजर रही है। पर पूंजीपतियों या सरकार दोनों का संकट में कोई प्रत्यक्ष हित नहीं है। कह सकते हैं कि मूलतः पूंजीवादी व्यवस्था के बुनियादी चरित्र – लाभ के मकसद से उत्पादन – में ही वह अंतर्विरोध निहित है जो पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकार के न चाहने पर भी निरंतर संकटों और बेरोजगारी को जन्म देता रहता है।

पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा बेरोजगारी के निरंतर पुनरुत्पादन की कुछ मूल वजहें हैं और पूंजीपति वर्ग के हित इससे सीधे जुड़े हैं। जब भी लाभ की दर ऊंची होती है तो पूंजी निवेश बढ़ जाता है और श्रमिकों की मांग भी, जिससे कुछ समय के लिए तात्कालिक तौर पर श्रमशक्ति के दाम या मजदूरी में वृद्धि होती है। पर बढ़ती मजदूरी पूंजीपतियों की लाभप्रदता को कम करती है और उन्हें अपने कारोबार की लाभप्रदता के हित में उपाय करना जरूरी हो जाता है। छँटनी द्वारा बढ़ी बेरोजगारी से बेरोजगार श्रमिकों की एक बड़ी रिजर्व फौज तैयार हो जाती है और जिंदा रहने के लिए किसी तरह काम पाने हेतु इन बेरोजगार श्रमिकों में होड़ तीव्र होती है।

इस स्थिति में किसी तरह कोई रोजगार पाने की चाहत लिए इन बेरोजगार श्रमिकों का बड़ा भाग कम मजदूरी पर काम करने के लिए तैयार हो जाता है चाहे वह कोई नया काम हो या वह जगह किसी अधिक मजदूरी पर काम करने वाले श्रमिक को बेरोजगार कर मिलने वाली हो। चुनांचे बेरोजगारों की यह बड़ी रिजर्व फौज मजदूरी की दरों को नीचे करने का दबाव पैदा कर देती है जिससे पूंजीपतियों को मजदूरी दर गिरा मुनाफे की दर बढ़ाने में मदद मिलती है। अतः रोजगार और बेरोजगारी दोनों का यह चक्र पूंजीवादी व्यवस्था के मूल नियमों से ही संचालित होता है ताकि पूंजीपति अपना लाभ बढ़ा सकें और सारे आर्थिक संकट पूंजीवादी व्यवस्था के इस मूल चरित्र का ही परिणाम हैं।

अतः पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था बेरोजगारी की समस्या का हल नहीं कर सकती। बल्कि बेरोजगारी की एक निरंतर उच्च स्थिर दर उसकी मूलभूत आवश्यकता है ताकि मजदूरी दर को नीचा रखा जा सके। कभी कभी अपवाद के तौर पर उच्च निवेश के अस्थायी दौर में मजदूरों को कुछ बेहतर मजदूरी पर नियमित काम मिल सकता है पर यह हमेशा और जल्दी ही न संकट को जन्म देकर बेरोजगारी को फिर बढ़ा देता है। इसलिए पूंजीवादी का नियम आम तौर पर स्थायी उच्च बेरोजगारी और संकट के दिनों में बेहद अधिक बेरोजगारी और कंगाली है।

आखिरी विकल्प

पूंजीवाद ही बेरोजगारी का उत्पादन करता है किन्तु खुद बेरोजगार उन फैसलों में कहीं शामिल या जिम्मेदार नहीं होते जिनकी वजह से बेरोजगारी ऊंची होती जाती है हालांकि इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव मजदूरों और उनके परिवारों पर ही होता है।

बेरोजगारी का नतीजा सिर्फ अत्यंत कंगाली ही नहीं इससे मजदूरों और उनके परिवारों में चिंता और तनाव का जो माहौल बनता है वह उनके शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है, उनके आत्म-सम्मान और कार्यकुशलता पर असर होता है और इसका नतीजा डिप्रेशन, नशाखोरी, घरेलू मारपीट और परिवारों के टूटने तक में होता है।

पूंजीवाद के समर्थक अक्सर शिकायत करते हैं कि बेरोजगारी से प्रभावित श्रमिक पूंजीवाद विरोधियों की उकसावे भरी तकरीरों और प्रचार के जाल में फंस जाते हैं। पर पूंजीवाद के ऐसे समर्थक बेरोजगारी की समस्या के मूल कारण को नहीं समझते या समझना नहीं चाहते। वे नहीं समझते कि खुद यह पूंजीवादी व्यवस्था जब तक कायम है तब तक बेरोजगारी को जन्म देती रहेगी।

पूंजीवादी व्यवस्था में निरंतर पैदा होते आर्थिक संकटों का अनिवार्य परिणाम ही बेरोजगारी है अर्थात पूंजीवादी व्यवस्था के पास इसका कोई समाधान ही नहीं है। समझना होगा कि अगर लाभ के उद्देश्य से उत्पादन की व्यवस्था ही बेरोजगारी का मूल कारण है तो उत्पादन से लाभ के उद्देश्य रहित उत्पादन व्यवस्था में ही इसका समाधान मुमकिन है, लाभ के उद्देश्य से हीन उत्पादन व्यवस्था ही बेरोजगारी और इससे जनित तकलीफ़ों को दूर कर सकती है, और अंततः पूंजीवादी व्यवस्था का उन्मूलन एवं समाजवादी व्यवस्था का निर्माण ही इसका वास्तविक समाधान है।

(यथार्थ पत्रिका से साभार)

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