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श्रम मंत्री के सफेद झूठ से मोदी सरकार की मंशा पर अब शक नहीं, यूएन में भी सरकार की थू थू

मोदी सरकार के झूठ की पोल उनके मंत्रालय ने ही खोल दी, बताया कितने मरे प्रवासी मज़दूर- नज़रिया

By संदीप राउज़ी

लॉकडाउन के दौरान मारे गए प्रवासी मज़दूरों को मुआवज़ा देने से इनकार के लिए संसद में बोले गए मोदी सरकार के सफ़ेद झूठ से एक एक कर पर्दा हट रहा है।

रेल मंत्री पीयूष गोयल ने राज्यसभा में स्वीकार किया कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनो में यात्रा के दौरान 97 प्रवासी मज़दूरों की मौत हुई थी।

श्रम मंत्री संतोष गंगवार से संसद में सवाल पूछा गया था कि लॉकडाउन के दौरान घर जाते प्रवासी मज़दूरों की मौत का सरकार मुआवज़ा देगी?

संतोष गंगवार का कहना था कि ‘सरकार के पास इस तरह का कोई आंकड़ा नहीं है इसलिए मुआवज़ा देने का सवाल ही नहीं उठता है।’

जबकि कुछ स्वतंत्र संगठनों ने सरकार को ये आंकड़े देने की बात कही। कुछ रिसर्च करने वाले विद्वानों ने प्रवासी मज़दूरों की मौत के आंकड़े जुटाए थे, वहां से भी सरकार को ये आंकड़े मिल सकते थे।

सरकार के इस बयान की चौतरफ़ा आलोचना हुई और 68 दिनों के पुलिसिया दमनकारी लॉकडाउन के दौरान सबसे अधिक संकट में रहे प्रवासी मज़दूरों के जख़्म पर नमक रगड़ने से तुलना की गई।

यूएन में भी मोदी सरकार की करतूत का संज्ञान

यहां तक कहा गया कि नया नागरिकता क़ानून बनाने वाली सरकार जनता से उनके 70 साल के रिकॉर्ड मांग रही है और उसे अपने ही किए गए मनमाने लॉकडाउन में हुई मौतों का आंकड़ा पता नहीं है।

मज़दूरों के ख़िलाफ़ किए गए मोदी सरकार के इस आपराधिक कृत्य की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आलोचना हुई है।

बंधुआ मज़दूरी पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार काउंसिल की स्पेशल रिपोर्ट में भी भारत के प्रवासी मज़दूरों के संकट का ज़िक्र किया गया है।

इसमें कहा गया है कि कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान देश के अंदर क़रीब 10 करोड़ प्रवासी मज़दूरों का पलायन हुआ। इसने उन्हें आर्थिक तौर पर तोड़कर रख दिया और कर्ज के बोझ तले दबा दिया।

इसके साथ ही पुलिस की बर्बरता के नए रिकॉर्ड कायम हुए और साथ ही कोरोना वायरस लाने वाले के रूप में उनको बदनाम किया गया।

लेकिन मोदी सरकार का सफ़ेद झूठ यहीं नहीं रुका, उसने इसकी एक और बानगी देते हुए कहा कि कोरोना की लड़ाई में अगली पंक्ति में खड़े स्वास्थ्य कर्मियों और डॉक्टरों की मौत का आंकड़ा भी उसके पास नहीं है।

इस बयान का इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने कड़ा विरोध दर्ज कराया और कहा कि बयान देने से पहले सरकार को संबंधित संगठनों से पता करना चाहिए।

मोदी सरकार की निष्ठुरता

टीएमसी एमपी डेरेक ओ ब्रायन ने शुक्रवार को जब पीयूष गोयल से सवाल पूछा तो उन्होंने लिखित जवाब देते हुए कहा कि 97 में से 87 मामलों में प्रवासी मज़दूर के शवों का पोस्टमार्टम किया गया था।

हालांकि इस जवाब में भी रेल मंत्री ने मृत्यु के कारणों का उल्लेख कर मुद्दे को भटकाने की चालबाज़ी की।

लिखित जवाब में कहा गया कि 51 पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण हर्ट अटैक, दिल की बीमारी, पक्षाघात, पहले से मौजूद गंभीर बीमारी, फेफड़े और लीवर की गंभीर बीमारी थे।

श्रमिक स्पेशल ट्रेनें एक मई से चलना शुरू हुईं और 31 अगस्त तक 4,621 ट्रेनों से 63 लाख 19 हज़ार प्रवासी मज़दूरों को उनके घर पहुंचाया गया।

असल में ये मोदी सरकार के ये जवाब बताते हैं कि वो उन लोगों की फ़िक्र भी नहीं करती जो उसके उद्देश्यों के लिए खुद को बलि पर चढ़ा देते हैं।

सभी को याद होगा कि लॉकडाउन को ताली थाली बजाने और अंधेरा करके दीप प्रज्जवलित करने से शुरुआत की गई। यहां तक कि स्वास्थ्य कर्मियों के लिए हेलिकाप्टर से पुष्प वर्षा कराई गई। लेकिन जैसे जैसे दिन बीते इन स्वास्थ्य कर्मियों के प्रति सरकार की छिपी निष्ठुरता बाहर आती गई।

मोदी को लेकर अब कोई भ्रम नहीं

अब जबकि इसी महामारी के दौरान 44 श्रम क़ानूनों को ख़त्म करने और देश की कृषि अर्थव्यवस्था को टाटा बिड़ला अडानी अंबानियों के हवाले करने के लिए सरकार ने संसद सत्र आयोजित करने का ड्रामा किया है, उसकी मंशा पर संदेह पैदा होना लाज़िमी है।

किसानों और मज़दूर वर्ग को अब इन जुमलों के चक्कर में आने की गुंजाईश नहीं बची है कि मोदी जी जो कर रहे हैं, अच्छा कर रहे हैं, मोदी जी कर तो रहे हैं, अकेले मोदी जी क्या क्या करेंगे, मोदी जी लॉकडाउऩ नहीं करते तो लाशें बिछ जातीं आदि आदि।

दिक्कत ये है कि मज़दूरों का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी आरएसएस की साम्प्रदायिक राजनीति की पैदल सेना में तब्दील है, धनी किसानों का एक बड़ा हिस्सा सामप्रदायिक राजनीत के ज़हर से पीड़ित है और इसका फ़ायदा आरएसएस-बीजेपी की सरकार उठा रही है।

लेकिन सिर्फ इतनी बात होती तब भी कोई बात थी। एक और मामला है जो मेहनतकश वर्ग को दिग्भ्रमित किए हुए है और वो है विपक्ष की राजनीति। कांग्रेस का 70 सालों का इतिहास और वर्तमान सबके सामने है।

ऐसे में कोई स्वतंत्र मज़दूरों और किसानों का आंदोलन ही वह राह दिखाएगा जहां इस बात को सुनिश्चित किया जा सके कि गिरगिट पूंजीवादी पार्टियों से अलग रास्ता ही मुक्ति का रास्ता है।

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