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‘हमें फांसी देने से तुम मज़दूर आंदोलन को नहीं ख़त्म कर सकते’- फांसी से पहले मज़दूर नेता स्पाइस का बयान

अल्बर्ट पार्सन्स, जॉर्ज एंगेल, एडोल्फ फिशर, ऑगस्ट स्पाइस और लुइस लिंग को 11 नवंबर को दी गई थी फांसी

यह 11 11 नवंबर की तारीख़ थी, सन् 1887 की। अमरीका के शिकागो नगर में आठ घंटे के काम के दिन के लिए लड़ रहे आन्दोलनकारियों में से चार, अल्बर्ट पार्सन्स ,जॉर्ज एंगेल, एडोल्फ फिशर, ऑगस्ट स्पाइस  को फांसी पर लटका दिया गया।

वे मज़दूर नेता थे जिन्हें अधिकारियों ने 8 घंटे के काम के दिन की लड़ाई में उनकी भूमिका के कारण जानबूझ कर फंसाया था।

हर साल एक मई को पूरी दुनिया के मेहनतकश और उनके दोस्त इन शहीदों को याद करते हैं।

पहले  ग़ुलाम रहे और बाद में मज़दूर नेता अल्बर्ट पार्सन्स की पत्नी, लुसी पार्सन्स ने 50 साल बाद उस दिन को याद करते हुए कहा था,  “11 नवंबर 1887 की उस उदास सुबह, मैं अपने प्यारे पति को विदाई देने के लिए अपने दो छोटे बच्चों को जेल ले गई। मैंने पाया कि जेल को  भारी रस्सों से घेर रखा था। पिस्तौल वाले पुलिसकर्मी बाड़े में गशत कर रहे थे।”

“मैंने उनसे अपने पति से मिलने के लिए अनुमति मांगी और कहा, ‘हमें उसकी हत्या से पहले अपने प्रियजन के पास जाने दो’। उन्होंने कुछ नहीं कहा। फिर मैंने कहा, ‘इन बच्चों को अपने पिता को आखरी सलाम तो कहने दो। इन्हें अपने पिता का आशीर्वाद तो लेने दो। ये कोई नुकसान नहीं कर सकते।’ कुछ ही मिनटों में एक गश्ती गाडी  आई और हमें  एक पुलिस स्टेशन में बंद कर दिया गया। उस समय ( फांसी देने का ) नारकीय काम किया गया। ओह, दुःख, मैंने तेरा दुःख का प्याला आखिरी बूँद तक पिया है लेकिन मैं अभी भी एक विद्रोही हूँ।”

जिन लोगों को फांसी दी जानी थी, उनमें जॉर्ज एंगेल, एडोल्फ फिशर, अगस्त स्पाइस  और लुइस लिंग शामिल थे, हालांकि लिंग़ ने पिछली रात खुद को उड़ाकर जल्लाद को धोखा दे दिया था।

अपनी सजा सुनाए जाने पर, स्पाइस ने अदालत से कहा था, “अगर आपको लगता है कि हमें फांसी देने से तुम मज़दूर आंदोलन को ख़त्म कर सकते हो  – जिस आंदोलन से आभाव और कष्ट में जीते करोड़ों, करोड़  दुखी, दबे कुचले मेहनती मज़दूर मोक्ष की उम्मीद करते हैं – अगर यह तुम्हारी राय है, तो हमें फांसी पर लटका दो!”

“लेकिन आप एक चिंगारी को भड़का रहे होंगे, यहां, और वहां, और आपके पीछे, और आपके सामने, और हर जगह, आग की लपटें फैल जाएंगी। यह एक भूमिगत आग है। इसे बुझाया नहीं जा सकता। जिस पर आप खड़े हैं उस जमीन पर आग लगी है।”

फांसी के वक़्त उसने कहा, “एक समय आएगा जब हमारी चुप्पी आज आपके द्वारा गाली देने वाली आवाज़ों से अधिक शक्तिशाली होगी।”

बेशक आज के समयमें हमारे हुक्मरान इस लड़ाई के हासिल को छीनने की कोशिश में लगे हैं। काम के दिन को बढ़ा कर 12 घंटे का कर दिया है  पर यह ज्यादा दिन नहीं चल सकेगा। यही इतिहास का सच है।

(वाया रवींद्र गोयल; इतिहासकार Peter Linebaugh द्वारा लिखित – The Incomplete, True, Authentic, and Wonderful History of May Day पर आधारित।)

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