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दो लाख के अधिकारियों को वेतन, 10 हज़ार पाने वाले सफ़ाई कर्मचारियों को नमस्कार

अंबेडकर गांगुली हॉस्टल प्रबंधन की मनमानी, पहले हॉस्टल खाली कराया, फिर बताया फंड नहीं है

By खुशबू सिंह

दिल्ली यूनिवर्सिटी के “अंबेडकर गांगुली स्टूडेंस हाउस फ़ॉर वुमन” हॉस्टल में पिछले 15 सालों से अस्थाई तौर पर काम करने वाले सभी सफ़ाई कर्मचारियों, माली, बस ड्राइवर्स और सिक्योरिटी गार्ड सहित अन्य कर्मचारियों को हॉस्टल प्रबंधन ने अगस्त माह से वेतन न देने की घोषणा कर दी है।

हॉस्टल में काम करने वाले अधिकतर लोग दलित जाति के हैं और किराए का कमरा लेकर रहते हैं। हॉस्टल में काम करने वाली कुछ महिलाएं गर्भवती भी हैं।

यहां पर काम करने वाले कर्मचारियों को प्रबंधन ने सीधे तौर पर काम छोड़ कर जाने के लिए नहीं कहा है। पर अगस्त माह से वेतन का भुगतान करने से मना कर दिया है, जिसके कारण सभी सफ़ाई कर्मचारी परेशान हैं।

हॉस्टल प्रबंधन ने छात्रों पर आरोप लगाते हुए कहा कि, “यहां पर रहने वाले स्टूडेंस फ़ीस का भुगतान नहीं कर रहे हैं जिसके कारण हमारे पास फ़ंड की कमी है। हम यहां काम करने वाले कर्मचारियों को वेतन नहीं दे सकते हैं।”

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दो लाख के अधिकारियों को कैसे मिल रही सैलरी? 

वहीं इसी हॉस्टल में सिक्योरिटी गार्ड का काम करने वाले पुरन कुमार ने वर्कर्स यूनिटी को बताया कि, “लॉकडाउन में स्टूडेंस से जबरन हॉस्टल खाली कराया गया था। कुछ स्टूडेंस तो अभी भी पीजी में रह रही है। हमने प्रबंधन से कहा कि उन्हें हॉस्टल में रहने के लिए बुला ले जिसके बाद उनके फ़ीस के पैसे से वेतन का भुगतान होता रहेगा।”

पुरन आगे कहते हैं, “हॉस्टल प्रबंधन की चाल है, हमें निकालने की। इसमें काम करने वाले अधिकारियों का वेतन 2 लाख रुपये से अधिक है। यदि प्रबंधन के पास फंड नहीं हैं तो उनके वेतन का भुगतान कैसे हो रहा है।”

वो कहते हैं, “कोरोना काल में भी हमने लोगों की सेवा की जिसके बाद हमारे कई साथी कोरोना संक्रमित हो गए थे। इस ईमानदारी का प्रबंधन ने यही तोहफ़ा दिया है।”

अंबेडकर गांगुली स्टूडेंस हाउस फ़ॉर वुमन हॉस्टल में काम करने वाले कर्मचारियों ने वर्कर्स यूनिटी को पत्र भेज कर अपना दर्द बयां किया है।

कर्मचारियों ने लिखा है, “प्रबंधन हमारे साथ जातिगत भेदभाव कर रहा है। वे हमें कमज़ोर समझते हैं कि, ये कम पढ़े लिखे लोग कहां जाएंगे इसीलिए हमें काम से निकालने के लिए साज़िश रची जा रही है। ताकि कर्मचारी खुद ही काम छोड़ कर चले जाएं।”

कर्मचारियों का कहना है कि, “हमने जातिगत भेदभाव, ग़रीबी और लिंग भेद को लेकर कई लड़ाइयां लड़ी हैं। पर यहां पर हमारी उम्मीदें टूटती हुई नज़र आ रही हैं।”

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