कोरोना वैक्सीन बहुत बड़ा फ़्रॉड, 20,000 लोगों की हुई मौत, बीमारियों का पिटारा दे गया टीकाकरण

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                                                                                                                                                                                      By अभिनव कुमार

“मुझे और मेरे पति को हेमकुंड साहिब जाना था। हम दोनों को कोविड हो चुका था और हमने निर्णय लिया था कि हम वैक्सीन नहीं लेंगे। लेकिन ट्रेन और बस में सफर करने के साथ- साथ होटल तक में आपके वैक्सीन के सर्टिफिकेट चेक किये जा रहे थे, जिसकी वजह से हमें मज़बूरन वैक्सीन लगवाना पड़ा।”

कोरोना वैक्सीन लगाने वाले पीड़ितों में से एक सिमोना गोयल बताती हैं, “वैक्सीन लगवाने की रात ही अचानक मेरे पति चीखने लगे कि उन्हें पूरे शरीर में झटके महसूस हो रहे हैं। डॉक्टर ने सभी चीजें नार्मल बताईं पर झटकों का कारण उन्हें भी समझ नहीं आया। मेरे पति को हाई ब्लड प्रेशर और डॉयबटीज समेत कई और तरह की बीमारियां हो गईं। मैं खुद आज कई तरह की शारीरक परेशानियों का सामना कर रही हूँ।”

65 वर्षीय एक अन्य वैक्सीन पीड़ित व्यक्ति ने बताया कि, “वैक्सीन लेने के कुछ दिनों बाद मैं अचानक एक रोज बेहोश होकर गिर पड़ा। MRI के बाद मुझे डॉक्टर ने बताया कि मेरे ब्रेन में क्लॉटिंग हुई है और मैं थोड़ी देर और करता तो पूरी ज़िंदगी के लिए पैरालिसिस का शिकार हो जाता। वैक्सीन लेने के 3 घंटे के भीतर मेरी पत्नी का 2021 में देहांत हो गया।”

पिछले हफ़्ते दिल्ली के प्रेस क्लब में देश के जाने माने डॉक्टरों ने इंडिया अवेकन मूवमेंट नाम की संस्था के बैनर तले एक प्रेस कांफ्रेंस कर भारत सरकार और कोरोना वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों पर गंभीर आरोप लगाए और इसे बहुत बड़ा फ़्रॉड बताया।
इस प्रेस वार्ता के दौरान कई ऐसे लोग भी मौजूद थे जिन्होंने खुद या उनके परिवार वालों ने वैक्सीन के दुष्परिणाम भुगत चुके थे। इन्हीं में से एक थीं सिमोना गोयल।

संस्था ने जो आरोप लगाए, उनमें से कुछ आरोपों को वैक्सीन बनाने वाली कंपनी एस्ट्राजेनेका ने ब्रिटेन की अदालत में स्वीकार कर लिया है और अपनी वैक्सीन को मार्केट से वापस मंगा लिया है।

यह वही कंपनी है जिसकी वैक्सीन को भारत में कोविशील्ड का लेबल लगा कर बड़े पैमाने पर बेचा गया और कंपनी ने दो साल में ही अरबों का मुनाफा काटा।

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ब्रिटेन की अदालत ने कैसे कसा शिकंजा

लम्बे समय से कोरोना वैक्सीन के साइडइफेक्ट के आरोपों को झेल रही ब्रिटिश-स्वीडिश फार्मास्यूटिकल कंपनी एस्ट्राजेनेका ने ब्रिटेन की अदालत में बीते दिनों इसके घातक परिणामों को स्वीकार कर लिया।

कंपनी ने कहा कि कुछ मामलों में कोविड वैक्सीन के साइडइफेक्ट सामने आए हैं, और इसकी वजह से कुछ लोगों में थ्रोम्बोसिस (खून का थक्का जमना) के साथ थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम बीमारी के लक्षण देखे गए हैं।

इसके बाद दुनियाभर में कोरोना वायरस महामारी के दौरान लोगों को टीके मुहैया कराने वाली कंपनी एस्ट्राजेनेका ने अपना कोरोना का टीका वापस मंगा लिया है।

कंपनी ने कहा है कि वह दुनियाभर से अपनी वैक्सजेवरिया वैक्सीन को वापस मंगा रही है।

गौरतलब है कि भारत में एस्ट्राजेनेका को कोविडशील्ड के नाम से बेचा गया और इसकी प्रचार जोर शोर से खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने और सारे न्यूज़ चैनलों ने किया।

भारत में लगाई गई कोविशील्ड वैक्सीन भी उसी फार्मूले पर बनी है, जिस पर वैक्सजेवरिया वैक्सीन बनी है। भारत में कोविशील्ड का उत्पादन सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने किया था, लेकिन अभी तक भारत में कोरोना वैक्सीन वापस लेने का कोई फैसला नहीं हुआ है।

द टेलीग्राफ की एक खबर के मुताबिक एस्ट्राजेनेका ने दावा किया है कि वैक्सीन का अपडेट संस्करण उपलब्ध है, ऐसे में वैक्सीन के पुराने स्टॉक को वापस मंगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने 5 मार्च को ही वैक्सीन वैक्सजेरवरिया को वापस मंगाने का फैसला कर लिया था, लेकिन यह आदेश 7 मई से लागू हुआ।

मालूम हो कि एस्ट्राजेनेका कंपनी कोविड वैक्सीन को लेकर कई मुकदमों का सामना कर रही है। आरोप है कि कोविड वैक्सीन लगने के बाद कई लोगों की जान गई है।

यूके में कई लोगों ने एस्ट्राजेनेका के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने कंपनी पर आरोप है कि वैक्सीन लेने के बाद उनके शरीर में कई तरह की समस्याएं देखने को मिली मसलन शरीर में खून के थक्के जमने और दिमाग में भी ब्लीडिंग के मामले सामने आए।

ब्रिटेन में कंपनी के खिलाफ 50 से भी ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं। कंपनी ने भी कोर्ट में लिखित दस्तावेजों में स्वीकार किया कि कोरोना वैक्सीन के कुछ दुर्लभ मामलों में साइड इफेक्ट दिख सकते हैं।

भारत में भी कोविशील्ड को लेकर चिंता उठ रही है और इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई है और वैक्सीन की सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर सुनवाई की मांग की गई है।

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डॉ तरुण कोठारी
कोविशील्ड से 19,273 मौतें

बीते दिनों अवेकन इंडिया मूवमेंट (AIM) द्वारा दिल्ली स्थित प्रेस क्लब में एक प्रेस वार्ता आयोजित की गई जहाँ संस्था से जुड़े लोगों ने जानकारी दी कि ” एआईएम देश में मीडिया/ सोशल मीडिया द्वारा कवर किये गए कोविड वैक्सीन से होने वाली मौतों का विवरण एकत्र कर रहा है और देश के विभिन्न उच्च अधिकारियों के साथ साझा कर रहा है।”

संगठन का दावा है कि ” सरकार इन मौतों की जांच के हमारे अनुरोध का जवाब देने में बार-बार विफल रही है। वर्तमान में हमारे द्वारा जमा किये गए आंकड़ों के अनुसार वैक्सीन लेने के बाद वयस्क आबादी में 19,273 मौतें और बच्चों में 186 मौतें हुई थीं।”
डॉ. तरुण कोठारी ने कहा कि, “सरकार ने कोविड टीकाकरण के बाद दुखद मौतों के बढ़ते मामलों को पूरी तरह से नज़रअंदाज किया है और फिर भी वह उन्हें ‘सुरक्षित’ और ‘प्रभावी’ के रूप में प्रचारित कर रही है।”

50 से अधिक साइडइफ़ेक्ट और कैंसर की आई बाढ़

डॉ. तरुण कोठारी के अनुसार, “एस्ट्राजेनेका ने सिर्फ ब्लड क्लॉटिंग जैसे साइड इफ़ेक्ट को ही स्वीकार किया है जबकि लोगों पर इसके 50 से भी ज्यादा साइड इफ़ेक्ट देखने को मिले हैं. लोगों को ब्रेन स्ट्रोक हुए, डाइबिटीज़ के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है, पैरालाइसिस के मामलों में बढ़ोतरी हुई है इसके साथ ही कैंसर के मामलों में कई हज़ार गुना प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिल रही है।”

इसके साथ ही डॉक्टर कोठारी ने कनाडा के डॉक्टर डेनिस रैनकोर्ट के वैक्सीन के प्रभावों पर एक रिपोर्ट की जानकारी साझा की।

इस रिपोर्ट के अनुसार, “2021 के 4 महीनों अप्रैल, मई, जून और जुलाई में भारत में 35 करोड़ से ज्यादा लोगों को वैक्सीन लगाई गई और इन्हीं चार महीनों के दौरान तत्काल रूप से 35 लाख से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो गई। देखा जाये तो इसके बाद 1.05 प्रतिशत की मृत्यु दर देखने को मिली। भारत में 220 करोड़ वैक्सीन के डोज़ दिए गए हैं तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं पीड़ितों की संख्या क्या रही होगी।”

दिल्ली के एक निजी अस्पताल में कार्यरत न्यूट्रिशनिस्ट डॉक्टर सुजाता मित्तल ने बताया कि, “मैं रोजाना कैंसर, डॉयबटीज, हाई ब्लड प्रेशर, गर्भवती महिलाओं सहित दर्जनों मरीज़ों के साथ काम करती हूँ। मेरा काम है कि मैं बीमार लोगों को खानपान की सलाह दूं ताकि वो अपनी बीमारी के साथ मज़बूती के साथ लड़ सकें।”

वैक्सीन में कैंसरकारक तत्व मौजूद थे?

डॉ. सुजाता मित्तल ने कहा कि “आप सीरम इंस्टिट्यूट द्वारा बनाये गए वैक्सीन कोविशिएल्ड के सारे कंपोनेंट्स पर नज़र डालें। आप पाएंगे कि ये वैक्सीन पूरी तरह से GMO ( जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गनिज्म) और प्रेजर्वेटिव पर आधारित है। एक तरफ तो हम मरीज़ों को GMO रहित भोजन लेने की सलाह देते हैं , वहीं वैक्सीन के नाम पर हमारे शरीर में सीधे- सीधे ऐसे पदार्थों को इंजेक्ट कर दिया गया।”

डॉ सुजाता कहती हैं कि, “अपनी प्रैक्टिस के दौरान मैंने अनुभव किया है कि वैक्सीन लेने के बाद कम उम्र के लोगों के बीच डॉयबटीज, हाई ब्लड प्रेशर कितनी तेजी से बढ़ा है। महिलाओं में खास कर थाइरॉइड के मामले बहुत बढ़े हैं। वैक्सीन लिए हुए कैंसर के मरीजों पर कीमोथेरपी का असर काफी कम हो गया है। गर्भवती महिलाओं में कई तरह की नई समस्याएं देखने को मिल रही हैं।”

इसके साथ ही सुजाता ने बड़े स्तर किये जा रहे विभिन्न तरह के वैक्सीन कार्यक्रम पर भी सवालिया निशान खड़ा करते हुए इसे बड़े-बड़े फार्मा कंपनियों का फ्रॉड बताया।

वो बताती हैं कि, “ICMR खुद कहता है कि जितने भी लोगों को सालाना HPV इन्फेक्शन होता है , उनमें से मात्र 1 प्रतिशत लोगों को सर्वाइकल कैंसर होने का खतरा होता है। ऐसे में 30 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगाने का क्या मतलब है, जबकि वैक्सीन के बाद भी एंटीबॉडी दस साल ही रहने वाली है। कोरोना वैक्सीन भी एक जनता के साथ किया गया एक बहुत बड़ा धोखा है। ये एक जांच का मामला है और सीरम इंस्टिट्यूट को वैक्सीन के ट्रायल से लेकर सभी जानकारियां जांच एजेंसियों के साथ साझा करनी चाहिए।”

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डॉ नीता भार्गव
कोरोना की आड़ में डर का बाज़ार तैयार किया गया

होमियोपैथी डॉक्टर नीता भार्गव ने कहा, “जब एक तरफ ये माना जाता है कि 8-10 साल के रिसर्च और ट्रायल के बाद ही एक वैक्सीन की उपयोगिता को समझा जा सकता है तो फिर इतनी हड़बड़ी में कोरोना वैक्सीन को इज़ाज़त क्यों दी गई? जबकि वैक्सीन लेने के बाद भी लोगों को कोरोना हुआ। कोविड के दौरान लोगों को भर- भर के डोलो- 650 खिलाई गई जबकि बाद में रिसर्च से पता चला 500 mg भी उतनी ही काम करती है। आज मेरे पास सैकड़ों ऐसे मरीज़ आते हैं जिन्हें कोरोना के दौरान दी गई इलाज और वैक्सीन के कारण कई नई तरह की शारीरिक परेशानियों ने घेर लिया है।”

“दवाइयों- ऑक्सीजन के नाम पर आम जनता से अरबों रुपयों की उगाही की गई। बड़े-बड़े हॉस्पिटल ने अपने आस-पास के होटल रूम बुक कर वहां कोरोना के मरीज़ों को रखा। पूरे कोरोना पीरियड के दौरान WHO और ICMR के द्वारा रोजाना लोगों को तरह-तरह के संदेश जारी किये जाते रहे, उनके पास न बीमारी की सही जानकारी थी न इलाज की। इस तरह एक डर का बाज़ार तैयार किया गया।”

वार्ता के दौरान इस बात पर भी सवाल खड़े किये गए कि ‘जब केंद्र की मोदी सरकार ने कोर्ट में कबूलनामा दिया कि वैक्सीन लेना अनिवार्य नहीं है फिर क्यों लोगों को बिना वैक्सीन के फ्लाइट, ट्रेन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट में चढ़ने नहीं दिया गया। स्कूल में बच्चों के वैक्सीन सर्टिफिकेट चेक किये गए। लोगों को क्यों वैक्सीन लेने के लिए मज़बूर किया गया?’

आंकड़े बताते हैं कि भारत में कोविशील्ड वैक्सीन लेने वाले लोगों की संख्या ब्रिटेन की तुलना में लगभग 30 ज्यादा है। वहीं भारत में कोविशील्ड देने के बाद दर्ज की गई मौतें (1148) ब्रिटेन में दर्ज मौतों (2362) से आधी हैं।

अदार पूनावाला ने एक झटके में 32,800 करोड़ रुपये कमाए

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘ब्रिटेन के डेटा से निष्कर्ष निकालते हुए, भारत सरकार को टीकाकरण के बाद 39,793 मौतों और हज़ारों अन्य तरह के दुष्परिणामों का जिक्र करना चाहिए था, जबकि 1148 मौत और 90,996 अन्य साइड इफ़ेक्ट का ही जिक्र किया गया है।’

डॉ. तरुण कोठारी ने बताया कि “वैक्सीन के दुष्प्रभावों पर नज़र रखने के लिए भारत की प्रणाली स्पष्ट नहीं है। सरकार ने 2015 के अपने दिशानिर्देशों को बदल कर जो संशोधित ‘एईएफआई दिशानिर्देशों’ जारी किया उसके अनुसार अब स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को वैक्सीन लेने वाले व्यक्ति की निगरानी करने की आवश्यकता नहीं है।”

“इस बदलाव का मतलब है कि गांवों और मलिन बस्तियों में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को सक्रिय रूप से निगरानी करने की ज़रूरत नहीं है। जबकि भारत सरकार जैकब पुलिएल बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भी अवमानना कर रही है, जिसने सरकार को संदिग्ध प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्ट करने और सभी एईएफआई रिपोर्टों को सार्वजानिक करने और जागरूकता फैलाने का निर्देश दिया है।”

(केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देश के मुताबिक AEFI मतलब एडवर्स इवेंट फॉलोइंग इम्यूनाइजेशन. यानी ऐसी कोई भी प्रतिकूल घटना जिसमें टीका लगने के बाद अनचाही चिकित्सा संबंधी घटना हो. हालांकि यह जरूरी नहीं ऐसी घटना का वैक्सीन से संबंधित हो।)

डॉ. तरुण कोठारी कहते हैं कि “वित्त वर्ष 21 – 22 और 22 – 23 के दौरान वैक्सीन खरीद पर 40,000 करोड़ रुपये खर्च करने वाली भारत सरकार आखिर चिकित्सीय शोध पर एक भी रुपया खर्च नहीं कर रही जिसकी वजह से अदार पूनावाला जैसे लोग आम लोगों के स्वास्थ्य का मजाक बना सिर्फ दो वर्षों में 32, 800 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाते हैं। इस दौरान कोवैक्सीन बनाने वाली कंपनी भारत बायोटेक ने भी 22,500 करोड़ का मुनाफा कमाया।”

AIM
वैक्सीन से मरने वालों को मुआवाज़, कंपनियों पर जांच की मांग

अवेकन इंडिया ने कहा कि सरकार ने कोविड टीकाकरण के बाद मौतों के बढ़ते मामलों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री के तस्वीर के साथ इसको ‘सुरक्षित और प्रभावी’ के रूप में प्रचारित करती रही। भारत सरकार और नौकरशाही ये समझ ले कि नागरिक वैश्विक फार्मास्युटिकल कंपनियों के लिए गिनी पिग नहीं है।

“हम चाहते हैं कि सभी वैक्सीन पीड़ितों या उनके परिवार के सदस्यों को भारत सरकार और वैक्सीन निर्माताओं द्वारा पर्याप्त मुआवज़ा दिया जाए। एक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन कर वैक्सीन के प्रतिकूल प्रभावों की जाँच की जाये साथ ही कंपनियों के झूठ और लोगों के मौत की जवाबदेही तय की जाये।”

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