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लॉकडाउन सरकारों की ग़लत नीति थी? कोरोना नहीं, पूंजीवाद सबसे बड़ी महामारी भाग-3

महामारी से निपटा जा सकता था, बिना बर्बर पुलिसिया दमन का इस्तेमाल किए- नज़रिया

महामारी को रोकने में तालाबंदी नाकाम क्यों हुई? क्या महामारी रोकने में तालाबंदी मूलतः ग़लत नीति थी?

बचाव के लिए टीके और परीक्षण द्वारा प्रभावी सिद्ध इलाज दोनों के ही अभाव की स्थिति में स्वास्थ्य विज्ञान की दृष्टि से संक्रमण के प्रसार की पहचान के लिए व्यापक जाँच, संक्रमित रोगियों को अलग कर उनकी जरूरी देखभाल के साथ संक्रमण की शृंखला को तोड़ने के लिए शारीरिक दूरी बनाये रखना एक तार्किक, सटीक एवं प्रभावी रणनीति है जिसके लिए तालाबंदी की जा सकती है।

अर्थात लाखों ज़िंदगियों पर जोखिम के वक्त एक उपाय के रूप में इसमें स्वयं में मूलतः कुछ गलत नहीं है। परंतु मुख्य बात यह है कि किसी समाज में जो आर्थिक-सामाजिक ढाँचा मौजूद है।

उस पर विचार किए गये बगैर ऐसे तार्किक और वैज्ञानिक रूप से सही सिद्ध उपायों को लागू करना नामुमकिन है, विशेषतया इसलिए क्योंकि यहाँ प्रश्न अलग-अलग व्यक्तियों के इलाज का नहीं पूरे समाज के सार्वजनिक स्वास्थ्य का है जिसे सामाजिक व्यवस्था से अलग कर नहीं देखा जा सकता।

विकल्प

तालाबंदी जैसे उपाय मात्र एक मानवीय एवं न्यायसंगत समाज में ही प्रभावी ढंग से लागू किए जा सकते हैं जैसे समाजवादी व्यवस्था की नियोजित सामाजिक उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था जिसमें उत्पादन और वितरण की व्यवस्था को सारी आबादी की सामूहिक सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु असरदार ढंग से परिवर्तित-समायोजित किया जा सकता है।

ऐसी सामाजिक व्यवस्था में जहाँ पूरी आर्थिक व्यवस्था और उत्पादन का ढाँचा निजी संपत्ति मालिकों के मुनाफ़ों को उच्चतम करने हेतु संचालित करने के बजाय जरूरत के वक्त सभी सामाजिक संसाधनों को समाज के सभी सदस्यों की प्रत्यक्ष जरूरतों की पूर्ति के काम में नियोजित ढंग से शीघ्रता से जुटाया-लगाया जा सकता है।

ऐसी वक्त जरूरत के लिए भंडार में रखे अन्न भंडारों को कारखाने-फार्म-दफ्तर बंद होने पर भी भोजन के लिए मुफ्त उपलब्ध कराया जा सकता है

बफर भंडार क्या है?

आज से बड़ी वक्त जरूरत क्या हो सकती है जब एक ओर 10.40 करोड़ टन अनाज बफर भंडार में हो और गरीब लोग भोजन न जुटा पा रहे हों? ऐसी व्यवस्था में प्रधानमंत्री 80 करोड़ के लिए अन्न वितरण की व्यवस्था का झूठ नहीं बोल पाता जबकि वितरण खुद सरकारी आँकड़ों में भी केवल 10 करोड़ व्यक्तियों को ही हुआ हो।

ऐसी व्यवस्था में बिक्री न हो पाने से उत्पादक दूध, सब्जी, फल को फेंकते नहीं बल्कि उन्हें उपभोक्ताओं तक पहुंचाने का पक्का इंतजाम किया जाता। ऐसी व्यवस्था में कार-टीवी कारखाने बंद रहने से भी सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने का काम जारी रहता बल्कि कार एवं अन्य ऐसे उत्पादन करने वाले कारखानों को जल्दी से वेंटिलेटर,ऑक्सिजनसिलिंडर, आदि निर्मित करने के काम में लगा दिया जाता क्योंकि इस वक्त सामाजिक जरूरत इन वस्तुओं की है।

ऐसी व्यवस्था में बालकों एवं बुजुर्गों की देखभाल के काम को ऐसे प्रबंधित किया जाता कि वे संक्रमण से उतनी अधिक दूर रखे जा सकें जितना तकनीकी-व्यवहारिक रूप से संभव हो।

समाजवादी व्यवस्था में ये सभी कर पाना मुमकिन होता क्योंकि सब कुछ सामाजिक स्वामित्व में होता और उत्पादन का संगठन-प्रबंधन सामूहिक-सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति होता।

ऐसे मानवीय और न्यायसंगत समाज में अगर स्वास्थ्य विशेषज्ञ महामारी से निपटने के लिए तालाबंदी को ही सर्वश्रेष्ठ उपाय बताते तो उसे भी प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता, और इसके लिए किसी नृशंस पुलिस बल की भी जरूरत न होती क्योंकि ऐसा समाज लोगों को सामाजिक जरूरतों और जिम्मेदारियों से विमुख नहीं करता और वे स्वयं स्वेच्छा से इसे असरदार ढंग से लागू कर देते।

(मज़दूर मुद्दों पर केंद्रित ‘यथार्थ’ पत्रिका के अंक तीन, 2020 से साभार)

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