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जयपुर की मज़दूर बस्ती, बेहतर ज़िंदगी का सपना यहां आकर ख़त्म होता है

पूरे शहर की सफ़ाई करने वालों की बस्ती में सुविधाओं का टोटा

By खुशबू सिंह

देश की पिंक सिटी कही जाने वाली राजस्थान के जयपुर में इंदिरा नगर कच्ची बस्ती नाम से एक इलाका है जो कि झलाना में आता है। इस बस्ती मे रहने वाले बच्चों का भविष्य अंधकार में है।

15 हज़ार आबादी वाली बस्ती 30 साल पुरानी है। इस में रहने वाले अधितकर लोग दलित हैं, और सफाई का काम करते हैं।

ये बस्ती शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं से कोसों दूर है। 15 हज़ार की आबादी पर केवल दो कमरे का एक लकड़ी का स्कूल है। इतनी आबादी पर केवल दो महिला टीचर हैं जो बच्चों को पढ़ाने आती हैं।

रिपोर्टर्स ऑन व्हील्स मुहिम में जयपुर पहुंची वर्कर्स यूनिटी को इसी बस्ती के सनी बताते हैं, “ये दो कमरे का स्कूल बनाने के लिए प्रशासन से बहुत मिन्नतें करनी पड़ीं। आम धारणा है कि, ये लोग पढ़ लिख कर क्या करेंगे? इनको तो साफ- सफाई ही करनी है।”

यहां पर रहने वाले लोग मज़दूरी, सफाई, सुअर पालन कर के आजीविका चलाते हैं। बस्ती में रहने वाले लोगों में शिक्षा का स्तर बहुत कम है।

शायद इसका एक कारण जातिगत भेदभाव भी है क्योंकि बाहर के स्कूलों में भेदभाव बरता जाता है।

कुछ बच्चों ने बताया “जब भी बस्ती के बाहर किसी स्कूल में जाते हैं तो भेदभाव का सामना करना पड़ता है। जिसके कारण वे अपनी शिक्षा को पूरी नहीं कर पाते हैं।”

पढ़े लिखे न होने के नाते और ग़रीबी के कराण यहां पर रहने वाले कम ही लोग अपने बच्चों की शिक्षा में रुचि लेते हैं।

कोरोना कितना ख़तरनाक़ है, सैनिटाइजर क्या है, मास्क क्यों पहनना चाहिए, इन बातों को तो सरकार ने इस बस्ती में भी पहुंचा दिया पर शिक्षा के प्रति उसकी बेरुख़ी बरकरार है।

राजस्थान में 8वीं कक्षा से ही बोर्ड की परीक्षा शुरू हो जाती है। आम तौर पर बच्चे 7वीं कक्षा तक तो पहुंच जाते हैं लेकिन आठवीं में ड्राप आउट की संख्या अधिक हो जाती है।

इसकी बड़ी वजह है अच्छे टीचर, तैयारी और बेहतर माहौल। इन सबके लिए ज़रूरी है पैसा लेकिन बस्ती में अधिकांश घरों की माली हालत इतनी नहीं है कि किशोर हो चुके बच्चे को आगे पढ़ा सकें।

बस्ती

बस्ती पहाड़ के किनारे बसी हुई है और धीरे धीरे पक्की गली, सीवर, बिजली पहुंच गई है।

पहाड़ी के पास बसे इलाके में लोगों का घर टीन का है, और कम ही लोगों के पास दो कमरे से अधिक घर है। राजस्थान की भीषण गर्मी में इन्हें अपने दिन इसी घर में गुजारने पड़ते हैं।

जीवन उजाले में कट जाए और गर्मी में फंखे की हवा मिलती रहे इसलिए लोगों ने बिजली का कनेक्शन लिया हुआ है। पर राजस्थान सरकार सारा पैसा इन्हीं से वसूलती है।

यहां पर लोग एक पंखा लाईट या फिर कूलर चलाते हैं। जिसका बिल एक महीने में 4-4 ह़ज़ार तक आ जाता है।

अधिक बिल की शिकायत लोग नहीं कर पाते हैं उन्हें डर है कहीं उनके घर की बिजली हमेशा के लिए न काट दी जाए।

कुछ लोग शिकायत करने गए भी पर उन्हें डरा धमाका कर बिल भरवा लिया गया।

लोगों के घरों की साफ-सफाई करने वालों के मोहल्ले सबसे गंद्दे पड़े हैं क्योंकि यहां पर कोई सफाई कर्मचारी नहीं आता है। इलाके के आस-पास कचरे का ढेर है।

इसी बस्ती में रहने वाले 16 साल एक लड़की बच्चों को पढ़ाने का काम करती है। लेकिन अब उसकी शादी की जा रही है।

वो कहती हैं कि बड़ी होकर सावित्रीबाई फुले की तरह लड़कियों को और शिक्षित करना चाहती हैं लेकिन अब उनका भविष्य अंधकार में जाता दिखाई दे रहा है, “मुझे नहीं पता वो कौन है, क्या करता है और कैसा दिखता है।”

वो कहती हैं, “मैं शादी नहीं करना चाहती हूं यदि मैं शादी करने से मना करूंगी तो सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है।”

डिजिटल इंडिया और न्यू इडिया जैसै शब्दों से ये बस्ती दूर है। यहां कि एमएलए गंगादेवी हैं जो कि कांग्रेस से हैं। लेकिन सरकार की हर योजनाओं से यहां के लोग वंचित हैं।

इंदिरा नगर बस्ती में रहने वाले लोगों का जीवन दो समय का खाना जुटान में ही निकल जाता है।

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