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मुंबई में भारतीय मज़दूरों की प्रथम राजनीतिक हड़ताल की राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमिः इतिहास के झरोखे से-10

बीसवीं सदी में मुंबई भारत का सबसे बड़ा औद्योगिक क्रेंद्र के रुप में उभरा।

By सुकोमल सेन

भारतीय मज़दूर वर्ग ने अपनी पहली और सीधी राजनीतिक कार्रवाई का प्रारंभ जुलाई 1908 में मुंबई से किया। भारतीय मजदूर वर्ग की यह प्रथम राजनीतिक कार्रवाई महत्वपूर्ण एतिहासिक घटना थी।

इस कार्रवाई से इस नई सामाजिक शक्ति की जबरदस्त क्रांतिकारी क्षमता और महत्व उजागर हुआ।

इस राजनीतिक हड़ताल के महत्तव का संपूर्ण मुल्यांकन करने के लिए उस समय मुंबई के मजदूरों की स्थितियों की सही समझ, उनकी संख्या, उनकी चेतना और उसके विकास का स्तर और साथ ही साथ शहर में चल रहे राजनीतिक आंदोलन की जानकारी अति आवश्यक है।

बीसवीं सदी के प्रारंभ होते-होते मुंबई भारत के दो सबसे बड़े औद्योगिक केंद्रों में से एक और देश के सबसे बड़े दूसरे शहर के रुप में विकसित हो चुका था।

भारत की 1911 की जनगणना के अनुसार इस शहर की जनसंख्या  9,79,000 थी। औद्योगिक कानून 1908 के अंतर्गत 168 उद्योग पंजीकृत थे।

शहर की 34 प्रतिशत आबादी उद्योगों, भवन निर्माण परिवहन सेवाओं और अन्य सहायक कामों में लगी थी।

इस शहर में उद्योग का विकास खास तरह की औपनिवेशिक पध्दति को प्रदर्शित करता है इसलिए उद्योगों की विभिन्न शाखाओं के बीच विकास का कोई संतुलन नहीं नजर आता।

शहर में 1,80,000 से 2,00,000 के बीच कुल औद्योगिक मजदूर थे। इसमें से लगभग 1,00,000 मजदूर सूती उद्योगों में काम करते थे शहर के करीब एख लाख अकुशल मजदूर थे जो कुली का काम करते थे या इसी प्रकार के कामों में लगे रहते।

मुंबई की जनसंख्या में विभिन्न राष्ट्रीयता के लोग शामिल थे। मराठा प्रभावाशाली थे और उनकी जनसंख्या 51% थी, दूसरे नंबर पर 26 %  गुजराती थे और बाकी 23% में विभिन्न राष्ट्रीयता और भाषा के लोग शामिल थे।

शहर की जनसंख्या की संरचना उस तरह की नहीं थी जैसी सर्वाहारा की संरचना थी। 1911 की जनगणना के अनुसार मुंबई के सूती उद्योग में 90 प्रतिशत मराठा थे जबिक अन्य उद्योगों में भी मराठियों का प्रतिशत 80 से कम नहीं था।

मराठों की बाहुलता के बावजूद, एक विचार योग्य संख्या में हिंदी भाषी लोग, गुजराती, तेलगू आदि अन्य मजदूर भी मुंबई के सर्वहारा का हिस्सा थे, इस प्रकार इनका चरित्र बहुराष्ट्रीयताओं का था।

मुंबई सर्वहारा का बहुराष्ट्रीयताओं वाला संगठन संपूर्ण देश संघर्ष विकसित करने का साधन था। उसी समय मराठी लोगों का बहुमत होने से महाराष्ट्र  की राष्ट्रीय जनवादी ताकतों को मुंबई के मजदूरों से संबंध बनाने में सुविधा हुई।

धर्म, भाषा और राष्ट्रीयता ने भारतीय मजदूर वर्ग के प्रारंभिक विकास में कोई महत्वहीन भूमिका नहीं निभाई।

20वीं शताब्दी के प्रारंभ में जब राष्ट्रीय  आंदोलन विकसित होने लगा तो वह अपने को धर्म से अछुता नहीं रख सका राजनीतिक आवाहनों में भी धार्मिक रंग की छाप दिखती थी।

बाल गंगाधर तिलक और अन्य राष्ट्रीयवादी नेताओं के जरिए प्रचारित राजनीतिक दर्शन भी व्यावहारिक रुप में हिंदू धर्म में जाति ही थी।

इसेक बाद महाराष्ट्र के खास मामले में शिवाजी को महाराष्ट्र के राष्ट्रीय नायक के रुप में स्थापित करना साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष में जनता को जागने के लिए उनकी मुगल बादशाह के खिलाफ शानदार लड़ाकू छवि का इस्तेमाल मुसलमानों की अपेक्षा हिंदुओं को ज्यादा अपील किया और मुंबई में मजदूरों की तीन चौथाई संख्या हिंदू थी और बाकी मुसलमान।

सार रुप में कहा जाए तो मुंबई के इन तीन लाख मजदूरों की सन्निकटता, और धर्म, भाषा, राष्ट्रीयता के आधार पर अनुपातिक मिश्रण त्तकालीन महाराष्ट्र के राष्ट्रीय के सर्वहारा की अपेक्षा मुंबई के सर्वहारा के लिए राजनीतिक संघर्ष में भागीदारी के लिए अधिक अनुकूल परिस्थितियां प्रदान कीं।

कोलकाता मे बहुसंख्यक मजदूर बंगाल के बाहर से आए थे। कोलकाता के बहुराष्ट्रीयताओं वाले और बहुभाषी मजदूरों का जन्म विभिन्न राष्ट्रीयताओं और विभिन्न भाषा वाले अति दरिद्र किसान परिवारों के बीच हुआ था।

वे अधिकतर संयुक्त प्रांत, बिहार, उड़ीसा और बहुत दूर के अंचलों से आए थे। अपनी पारंपरिक जड़ों से कटे हुए उनको भिन्न प्रकार के अन्यायपूर्ण सामाजिक वातावरण में काम करने को बाध्य किया जाता।

उनकी भाषा, रीति-रिवाज सामाजिक और खाने-पीने की आदतें भी एक दूसरे से बहुत भिन्न थीं। यह आपसी दूरी की भावना और बहुत प्रकार से आपसी मेल-मिलाप की कमी ने इन मजदूरों और कोलकाता और पूरे बंगाल में विकसित हो रहे राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन के बीच संबंधों को कमजोर किया।

सन् 1905 से 1908 के दौरान पूरे भारत में फैला राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन बंगाल में काफी उन्नत स्तर का रहा जबकि वहां मजदूरों के आर्थिक संघर्ष भी लगभग पूरी व्यापकता के साथ चले।

प्रत्यक्ष रुप से अनुकूल परिस्थितियों के वाबजूद, अपनी विशेष बनावट और नई जगह से जुड़ाव न महसूस कर पाने के कारण बंगाल के राजनीतिक आंदोलन के उभार के साथ यहां का मजदूर वर्ग एक रुप होने में आत्याधिक शंकालु बना रहा।

लेकिन मजदूर वर्ग का बंगाली हिस्सा जिनकी जड़ बंगाल में ही थी वह निशिचत रुप से राजनीतिक उभार से जुड़ गया और इस दौरान उसने बढ़-चढ़ कर आर्थिक संघर्षों में भी भागीदारी की।

अपने राजनीतिक रंग के कारण इस दौर के आर्थिक संघर्ष में विचार योग्य हैं। ईस्ट बंगाल रेलवे, गवर्नमेंट आफ इंडिया प्रेस, कोलकाता और कुछ अन्य संस्थानों में जहां बंगाली मजदूर भारी तादाद में थे, वहां की हड़तालें विचार योग्य हैं।

(भारत का मज़दूर वर्ग, उद्भव और विकास (1830-2010) किताब का अंश। ग्रंथशिल्पी से प्रकाशित)

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