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सरकार को घुटने पर लाकर महिलाओं ने बताया, बैठने का भी हक़ होता है जनाब!

केरल में असंगठित क्षेत्र की महिला श्रमिकों ने अपनी तरह की देश की पहली अनूठी लड़ाई जीत ली है, राइट टू सिट यानी बैठने के अधिकार की लड़ाई।

लगभग 5 साल के संघर्षों के बाद केरल में दुकानों में काम करने वाली महिला श्रमिकों को ये बड़ी कामयाबी मिली है।

सालों से चले संघर्ष में कई महिला कर्मचारियों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा यहां तक कि वहां की परम्परागत ट्रेड यूनियनों ने भी कुछ इस अंदाज़ में प्रतिक्रिया दी कि ‘हह! बैठने का अधिकार भी कोई मांग है?’

लेकिन सतत संघर्ष और अपनी मांगों पर डटी महिला कर्मचारियो ंके सामने आखिर केरल सरकार को झुकना पड़ा।

केरल सरकार ने हाल ही में ‘केरल की दुकानें और कॉमर्शियल प्रतिष्ठान अधिनियम’ में संशोधन लाने के लिए एक आदेश पारित किया, जिससे रिटेल क्षेत्र में महिला श्रमिकों को बैठने का अधिकार दिया गया।

महिला श्रमिकों की भारी जीत

आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि कार्यस्थल में बैठने के लिए कोई प्रावधान नर्ही है और यदि शौचालय जाने के लिए महिलाओं को ‘पर्याप्त ब्रेक’ नहीं दिया जाता है तो नियोक्ता को जुर्माना लगाया जाएगा।

हालांकि आदेश के कुछ हिस्सों में अस्पष्टता बनी हुई है, जैसे ब्रेक कितनी बार होनी चाहिए, तब भी यह उन महिला श्रमिकों के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है जिन्होंने एक बेहतर कार्यक्षेत्र और कार्य वातावरण के लिए लड़ा है।

यह संघर्ष 2013-14 से जारी है, जब एक छोटे से महिला समूह को एक छोटे शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में महिला श्रमिकों के साथ बातचीत के दौरान पता चला कि अपने कामकाजी घंटों – जो की 10 घंटे तक हो सकता है – के दौरान उन्हें बैठने की इजाजत नहीं थी।

दिन में सिर्फ दो बार टॉयलेट जाने की इजाज़त थी

रिटेल दुकानों में काम करने वाली महिलाओं ने खुलासा किया कि उन्हें केवल दिन में दो बार शौचालय का उपयोग करने की इजाजत थी, दीवार से टेक लेने का भी हक़ नहीं है।

और उन्हें एक-दूसरे से बात करने की भी अनुमति नहीं है।

यदि एक दूसरे से बात करते पाई गईं, तो उन्हें वेतन का नुकसान उठाना पड़ता है।

असंगठित क्षेत्र की महिला श्रमिकों की अनूठी हड़ताल

सामूहिक बाजार में महिलाओं के लिए सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण के मुद्दे को सफलतापूर्वक हड़ताल करके उठाने से उभरा था।

ऐसी कई महिलाएं हैं जो इस बाज़ार के भीतर कई दुकानों में काम करती हैं।

असंगदीथा मेघाला थोजिलाली यूनियन (एएमटीयू) ने कोझिकोड में प्रचार किया और मई 2014 में इरुप्पु समर (बैठे हड़ताल) की घोषणा की।

 

‘राइट टू सिट’, मानवाधिकार है

उन्होंने 8 मार्च से प्रचार किया और 1 मई को घोषणा की।

त्रिशूर में कल्याण साड़ी की महिला श्रमिकों ने भी कार्यस्थल में बैठने के अधिकार की मांग को लेकर हड़ताल किया।

उनमें से 6 इस संघर्ष के लिए काम से निकाल दी गईं और उनका मामला आज भी अदालत में जारी है।

इन उल्लंघनों के कारण महिलाएं मूत्र संक्रमण, वैरिकाज़ नसों और कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त हैं।

ज्यादातर दुकानों में, कर्मचारियों के लिए स्वच्छ पेयजल के लिए कोई प्रावधान नहीं है।

संघ ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से अपील की कि बैठने का अधिकार नहीं मिलना इन महिला श्रमिकों के मानवाधिकारों का उल्लंघन था, जिसे एनएचआरसी ने भी माना।

नए क़ानून में नियोक्ताओं पर ज़ुर्माने का भी प्रावधान

प्रस्तावित संशोधन रात के समय महिलाओं को नियोजित करने की इजाजत देते हैं, जब तक कि अन्य महिला श्रमिक हों।

और यदि नियोक्ता उनके लिए सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था करता है।

संशोधन ने सुरक्षा गार्ड को शामिल करने के लिए कर्मचारी की परिभाषा का भी विस्तार किया है।

महिला श्रमिकों को सलाम, जो राहत और विश्राम के बुनियादी हक़ को विचार में लाईं और संघर्ष से उसे हासिल किया!

(संघर्षरत मेहनकश पत्रिका से साभार)

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