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 पेट्रोल पर लूट-1ः कैसे पेट्रोल डीज़ल के दाम बढ़ा जनता को लूट रही मोदी सरकार?

तेल की क़ीमतों ने कैसे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर रही है, पढ़ें पहली कड़ी

By एसवी सिंह

“हर साल देश के 2 करोड़ युवाओं को रोज़गार, हर एक को सन 2022 तक पक्का घर, स्विस बैंकों में जमा अकूत काला धन वापस लाया जाएगा जिससे हर नागरिक के खाते में रु 15 लाख जमा होंगे और इतना कर वसूल होगा कि सालों तक किसी को कोई कर देना ही नहीं पड़ेगा, जन स्वास्थ्य के लिए उत्तम व्यवस्थाएं, एक भारत श्रेष्ठ भारत, ये करेंगे, वो करेंगे…” 

2014 लोक सभा चुनाव से पहले की गई ये घोषणाएँ कुछ इस अंदाज़ में हुई थीं कि अभी तक ज़हन में गूंज रही हैं, ऊँची कर्कश कानफोडू आवाज, हाथ-आँख के अद्भुत समायोजन के साथ महामानवीय ठसक में एकदम लयबद्ध नाटकीय अंदाज़ में हर सभा में हर रोज़।

उसके बाद इन बोल वचनों को हर व्यक्ति के ज़हन में ठूंसने की ज़िम्मेदारी टुकड़खोर मिडिया की थी जिसने सौंपा गया काम पूर्ण समर्पण के साथ अंजाम दिया।

उसके साथ ही अंधराष्ट्रवाद और मज़हबी खुमारी की कॉकटेल; भोले- भाले बदहाल लोग जो काँग्रेसी कुशासन और भ्रष्टाचार से पहले से ही त्रस्त थे उस आंधी में बहने से खुद को नहीं रोक पाए।

विश्वगुरु बन जाने के नशे की खुमारी में वे चुनाव केन्द्रों पर ऐसे टूट कर पड़े कि परिणामों पर भाजपा खुद दंग रह गई।

कच्चे तेल का दाम शून्य से भी नीचे चला गया

किसी भी कोने से उठने वाली किसी भी समझ, विचार को कि, ये सब प्रपंच बड़े पूंजीपतियों की दौलत के बल पर हो रहा है क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था का संकट और असाध्य रोग अब हल होने की संभावना से परे निकल गया है।

और सत्ता अपने सबसे भयानक रूप फ़ासीवाद का सहारा लेने को ऐसा कर रही है, लोगों ने मखौल बनाकर दुत्कारा और झटक दिया।

2019 में तो ऐसी किसी घोषणा की भी ज़रूरत नहीं पड़ी। सीमा पर ऐसी स्थिति बनाई गई और अंधराष्ट्रवाद के नशे को चरम पर पहुंचा दिया गया।

घर में घुसकर मारने की बेख़ुदी ने सब दुःख दर्द भुला दिए और पहले से भी ज्यादा ताक़त के साथ फिर से मोदी सरकार प्रकट हुई।

कुल 6 सालका ‘विकास’ आज हम सब के सामने है!! हर नागरिक के जीवन को प्रभावित करने वाली मदों, डीज़ल, पेट्रोल और गैस की कीमतों के सन्दर्भ में मोदी सरकार के प्रदर्शन का वस्तुपरक मूल्याङ्कन करना इस लेख का उद्देश्य है।

कच्चे तेल का दाम अभूतपूर्व न्यूनतम स्तर पर है और पेट्रोल-डीज़ल-गैस के दाम अभूतपूर्व उच्चतम स्तर पर।

सभी जानते हैं कि सरकारों ने जब भी डीज़ल-पेट्रोल के दाम बढाए उसकी एक ही वज़ह बताई गई कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल (क्रूड आयल) के दाम बढ़ गए इसलिए पेट्रोल डीज़ल के दाम बढ़ाने ज़रूरी हो गए थे।

आज कोरोना उपरांत की दुनिया में वो घट रहा है जो अविश्वसनीय है और जो कभी नहीं घटा। 27 अप्रैल 2020 को विश्व तेल मूल्य निर्धारित करने वाला मानक ‘वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट’ में कच्चे तेल का दाम इतिहास में पहली बार नेगेटिव में, मतलब शून्य से भी नीचे -$37.63 पर बन्द हुआ।

Petrol prices

उधर दाम कम हो रहे, इधर दाम बढ़ रहे

कोरोना माहमारी के चलते बन्द पड़े अंतरराष्ट्रीय बाज़ार, कहीं कोई मांग नहीं, दूसरी तरफ़ सऊदी अरब के नेतृत्व में तेल उत्पादन एवं निर्यात संस्थान (ओपेक), रूस और अमेरिका के तेल कीमतों को लगातार कम करते जाने और उत्पादन मात्रा सम्बन्धी शर्तों को पालन ना करने के ‘तेल व्यापर युद्ध’ के चलते तेल आपूर्ति, तेल की मांग से लगभग 1 करोड़ बैरल प्रति दिन के हिसाब से अधिक हो गई।

पर्यावरण नियमों के चलते तेल को समुद्र में भी बहाया नहीं जा सकता। इन सब कारणों ने मिलकर ऐसे स्थिति पैदा की कि क्रूड के भाव नकारात्मक हो गए।

इसका मतलब ये हुआ की तेल उत्पादक देश, तेल को मुफ़्त ही नहीं बल्कि ‘तेल भी ले लो और साथ में पैसे (मतलब डॉलर) भी लो’ ऐसा करने को मज़बूर हो गए!! क्या कोई इस बात पर भरोसा कर सकता है!!

ऐसा इससे  पहले कभी नहीं हुआ। और यहाँ, अपने प्यारे देश में तेल के दाम के मामले में उसी वक़्त क्या हो रहा था?

जितना कच्चे तेल का दाम अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में नीचे आता गया उतना ही नहीं बल्कि उससे कहीं अधिक टैक्स सरकार उसपर लगाती गई।

इससे जो राहत आम उपभोक्ता को मिलनी चाहिए थी वो तो छोडिये उनपर और ज्यादा बोझ लादा जाता गया और पेट्रोल डीज़ल के दाम बेतहाशा बढ़ते गए।

इन्डियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 74 साल का कच्चे तेल के भाव का ग्राफ देखा जाए तो हम पाते हैं कि, भारत के कच्चे तेल खरीदी का औसत मूल्य कई दशकों में सबसे नीचे स्तर पर पहुँच गया है। इतना नीचे कि मई 2020 में ये $19.9 प्रति बैरल पर पहुँच गया जबकि इसी साल मार्च में $33.36 प्रति बैरल था और जनवरी में $64.31 प्रति बैरल। इन सब तथ्यों के बावजूद भी सरकार डीज़ल पेट्रोल के दाम बढ़ाने को उचित ठहराने में क़ामयाब होती जा रही है।

मोदी अपनी विफलताओं का जश्न मनवा रहे हैं?

प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हरिशंकर परसाईं का ये व्यंग्य याद आ जाता है- ‘अगर प्रजा मूर्ख हो तो राजा अपनी विफलताओं का भी जश्न मनवा सकता है!!’

यही वज़ह है कि सरकार लोगों को कूपमंडूक बनाए रखने, उन्हें मज़हबी मुद्दों, मंदिर-मस्जिद झमेलों में उलझाए रखने, पुराने दकियानूसी विचारों और अंधविश्वासों में लिप्त रखने के लिए बहुत अधिक संसाधन खर्च कर रही है।

भूखे, बदहाल, बीमार लोग असली कठोर सच्चाई ना जान पाएं और अंधराष्ट्रवाद के नशे की खुमारी में टुन्न रहें, हमेशा ग़फलत में रहें इसके लिए सभी संभव प्रयास ज़ारी रहते हैं।

अभी तक मोदी सरकार अपने मंसूबों में क़ामयाब भी होती जा रही है ये स्वीकार करना पड़ेगा।

इतिहास, लेकिन, हमें सिखाता है कि शासकों की ये नीति हमेशा के लिए क़ामयाब नहीं होती और जिस दिन आम जन को असलियत समझ आ जाती है, वे वर्ग चेतना से लैस हो जाते हैं, उनका क्रोध कई गुना बढ़ जाता है और वो कितनी भी चालाक और धूर्त सत्ता को उखाड़ फेंकते हैं।

सब लोगों को कुछ दिन, कुछ लोगों को हमेशा के लिए मूर्ख बनाया जा सकता है लेकिन सब लोगों को हमेशा के लिए मूर्ख नहीं बनाया जा सकता!!

कभी कभी एक छोटी सी चिंगारी दावानल बन जाती है, सत्ताओं को ये याद दिलाना पड़ता है। (क्रमशः)

(यथार्थ पत्रिका से साभार)

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