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सात साल से काम कर रहे मज़दूर को किरण इंटरप्राइजेज ने निकाला, कहा ठेका मज़दूरों से कराएंगे काम

बड़ी कंपनी से लेकर छोटे दुकानदारों को भी अस्थाई मज़दूर सस्ते लग रहे

By खुशबू सिंह

देश की आर्थिक राजधानी मुबंई, के गोरेगांव में स्थित किरन इंटरप्राइजेज में काम करने वाले एंथनी डीकोस्टा को कंपनी ने जनवरी का वेतन दिए बिना ही काम से निकाल दिया है।

किरन इंटरप्राइजेज रेडीमेड गारमेंट्स की दुकान है। एंथनी डीकोस्टा का कहना है कि, वे पिछले सात सालों से यहां काम कर रहे थे।

एंथनी डीकोस्टा ने वर्कर्स यूनिटी को बताया कि, “वेतन का भुगतान किए बिना ही प्रबंधन ने जनवरी में ही मुझे काम से निकाल दिया था। प्रबंधन से काम से निकालने का कारण पूछा तो उनका कहना था कि, अब हम काम पर स्थाई मज़दूरों को नहीं रखेंगे। दुकान का सारा काम अस्थाई मज़दूरों द्वारा ही होगा।”

उन्होंने ने आगे कहा, “मालिक के इस रवैये के खिलाफ मैंने कंप्लेंट भी दायर की है। मेरे वकील ने प्रबंधन से काम से निकालने का कारण पूछा तो प्रबंध ने मुझे ठेका मज़दूर घोषित कर दिया जब कि मैं परमानेंट मज़दूर था।”

“हमारे यहां कोई मज़दूर यूनियन नहीं है। पर मज़दूरों के  लिए काम करने वाली संस्था धड़क ने मुझे वेतन दिलाने का आश्वासन दिलाया है और कंपनी को लेटर भी भेजा है। लेकिन कोरोना के कारण आगे की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ पा रही है।”

इस पूरे मसले के बारे में जानने के लिए हमने किरन इंटरप्राइजेज के मालिक राधू गोयल को फ़ोन किया तो उनका कहना था कि, “फालतू सवाल है आप का। आप के पास कोई जानकारी नहीं हैं। दोबारा फ़ोन मत करना ये बोलकर फ़ोन काट दिया।”

एंथनी का आरोप है कि, “काम तलाश ही रहा था तभी कोरोना के कारण लॉकडाउन हो गया  तब से लकर अब तक मैं बेरोज़गार ही बैठा हूं। घर में पत्नी और एक बेटी है। रिश्तेदारों से उधार मांग कर खर्चा – पानी चल रहा है।”

वे आगे कहते हैं, “जनवरी का वेतन मांगने के लिए मैं कई बार गया पर मुझे अंदर नहीं जाने दिए गया। मैंने तो वेतन की उम्मीद भी छोड़ दी है बस उम्मीद करता हूं कही काम मिल जाए जिससे मैं अपने परिवार को दो वक्त का खाना खिला पाऊं।”

उन्होंने ने कहा, “फर्म बहुत बड़ी है पर कुल मिला कर केवल सात मज़दूर ही काम करते हैं। लोगों से 12 घंटे काम कराया जाता है और वेतन 8 घंटे का ही दिया जाता है।”

वे कहते हैं, “मैं अकेला नहीं हूं मेरी तरह कई मज़दूरों के साथ इसी तरह से बर्ताव किया जा रहा है।”

श्रम क़ानून पहले ही लागू नहीं हो रहे थे लेकिन जबसे लॉकडाउन हुआ है, बड़ी से लेकर छोटी कंपनियां परमानेंट या थोड़ा अधिक वेतन वाले मज़दूरों को नौकरी से निकाल रही हैं।

यही नहीं कंपनियां या तो लॉकडाउन का वेतन नहीं दे रही हैं बल्कि कंपनी खुलने पर वेतन में कटौती भी कर रही हैं।

इससे पहले राजस्थान के भिवाड़ी में स्थित कॉन्टिनेंटल इंजंस कंपनी कोरोना के नाम पर मज़दूरों के वेतन से 10 प्रतिशत प्रतिमाह  काट रही है। लेकिन सैलरी स्लिप में इस बात का कोई ज़िक्र  नहीं किया जा रहा है।

प्रताड़ना से परेशान होकर सोनू नाम के एक मज़दूर ने आत्महत्या करने की कोशिश भी की, जिसके कारण उनके सिर में गहरी चोट आ गई थी ।

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