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सुप्रीम कोर्ट का एक और जनविरोधी फैसला, दिल्ली की 48000 झुग्गियों को 3 महीने में उजाड़ने का आदेश

जस्टिस मिश्रा की बेंच ने बाकी अदालतों को स्टे देने और राजनीतिक पार्टियों की दखलंदाज़ी पर भी प्रतिबंध लगा दिया है

एक और जनविरोधी फैसला देते हुए दिल्ली में रेलवे लाइनों के किनारे बसीं 48,000 झुग्गी झोपड़ियों को हटाने का आदेश जारी किया है।

दिल्ली में 140 किमी लंबी रेलवे पटरियों के किनारे बसे लोगों को बेदखल करने के लिए महज तीन महीने का समय दिया है।

इस आदेश को चुनौती न दी जा सके सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में ये भी व्यवस्था करते हुए कहा है कि कोई और अदालत इस पर स्टे नहीं जा कर सकती है।

यानी लाखों परिवारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इंसाफ़ का दरवाजा भी बंद कर दिया है। ये फ़ैसला ऐसे समय आया है जब कोरोना महामारी का प्रकोप चरम पर है और लोगों को घरों में रहने की लगातार नसीहत दी जा रही है।

पहले ही अपनी विश्वसनीयता से जूझ रही सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘रेलवे लाइन के आसपास अतिक्रमण के संबंध में यदि कोई अदालत अंतरिम आदेश जारी करती है तो यह प्रभावी नहीं होगा।’

ये भी आदेश जस्टिस मिश्रा ने दिए हैं, जिनके आदेशों को लेकर बीते दिनों काफ़ी आलोचनाएं हुई हैं।

रेलवे ने सुप्रीम कोर्ट में इन झुग्गियों को हटाने की अपील की थी और कहा था कि नेशनल ग्रीन ट्रीब्यूनल ने दो साल पहले 2018 में इन झुग्गी बस्ती को हटाने के लिए स्पेशल टास्क फ़ोर्स गठित किया था।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पर्यावरण मामलों की निगरानी संस्था है और पिछले कुछ सालों में अपने फैसले को लेकर काफ़ी आलोचना का सामना करती रही है।

इन फ़ैसलों में जंगल में खदानों को मंजूरी देने से लेकर श्री श्री रविशंकर के उस विशाल कार्यक्रम को इजाज़त देने का फैसला जिससे दिल्ली में यमुना के जैवविविधता वाला एक पूरा हिस्सा बर्बाद हो गया।

रेलवे का तर्क है कि एनजीटी के आदेश के बावजूद राजनीतिक दख़लंदाज़ी के चलते रेलवे लाइनों का अतिक्रमण हटाया नहीं जा सका है। रेलवे ने कहा कि इसमें एक बड़ा हिस्सा रेलवे के सुरक्षा ज़ोन में है।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा है कि ये झुग्गी बस्ती हटाने के लिए चरणबद्ध तरीक़े से काम किया जाए और रेलवे सुरक्षा ज़ोन में सबसे पहले अतिक्रमण हटाया जाए, जो कि तीन महीने में पूरा कर दिया जाए।

जस्टिस मिश्रा की पीठ कहा है कि इसमें किसी राजनीतिक दबाव और दख़लंदाज़ी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

असल में दिल्ली में प्रदूषण को लेकर एमसी मेहता की अपील पर सुनवाई हो रही है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 1985 के बाद से दिल्ली और उसके आसपास प्रदूषण से संबंधित मुद्दों पर समय-समय पर आदेश जारी करता रहता है।

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