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पीएफ़ ब्याज़ दरों में कटौती की सरकारी मंशा के विरोध में उतरीं यूनियनें

केंद्र सरकार मौजूदा 8.65% से कम कर 8.5% करना चाहती है

सरकार पीएफ़ पर ब्याज़ दरों में कटौती करने की मोदी सरकार योजना बना रही है। ट्रेड यूनियनों ने इसका खुल कर विरोध करना शुरू कर दिया है।

इम्प्लाई प्राविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (ईपीएफ़ओ) की एक कमेटी इस पर विचार कर रही है लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं उससे पता चलता है कि सरकार 8.65% से कम कर इसे 8.5% पर लाने की कोशिश करेगी।

एटक की महासचिव अमरजीत कौर ने बयान जारी कर कहा है कि लॉकडाउन के कारण वैसे भी कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिली है ऐसे में पीएफ़ में कटौती करना उनके साथ नाइंसाफ़ी होगी।

बयान के अनुसार, सरकार ने पहले ही पीएफ़ में कर्मचारियों और मालिकों की हिस्सेदारी को एकतरफ़ा कम करके मनमाना कार्यवाही की है।

बीते मार्च में पीएफ़ ब्याज़ दर को 8.5% घोषित किया गया था लेकिन वित्त मंत्रालय ने इसे मंज़ूरी नहीं दी है।

पीएफ़ पर मोदी की नज़र

कोरोना के कारण जब लॉकडाउन शुरू हुआ तो मोदी सरकार ने कर्मचारियों की पीएफ़ हिस्सेदारी को 12% से कम कर 10% कर दिया था।

यही नहीं मोदी सरकार ने कंपनियों की पीएफ़ हिस्सेदारी सरकारी खजाने से जमा करने की घोषणा कर की थी। यही नहीं कर्मचारियों के रिटायरमेंट बचत को जमा कराने में भी कंपनियों को समय की छूट दी गई थी।

इसके अलावा कर्मचारियों को अपनी तीन महीने की बेसिक सैलरी या कुल जमा पीएफ़ का दो तिहाई हिस्सा निकाल लेने की भी छूट दी गई थी, ताकि लॉकडाउन की परेशानियों से उबर सकें।

ईपीएफ़ओ का तर्क है कि लॉकडाउन की वजह से संगठन में नकदी की कमी हो गई है और अभी फिलहाल बाज़ार में लगे पैसे वो निकाल नहीं सकता।

इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, ईपीएफ़ओ ने अपना 85% खजाना कर्जदाता कंपनियों में लगा दिया है जबकि 15% हिस्सा एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स में लगाया हुआ है।

चूंकि बाज़ार की हालत ख़स्ता है और बहुत सारे कर्ज़ के डूबने के आसार बन रहे हैं और शेयर मार्केट की भी हालत ठीक नहीं है, इसलिए बाज़ार से पैसा वापस ले पाना अभी मुश्किल ही है।

जब मोदी सरकार ने पीएफ़ और पेंशन का पैसा शेयर मार्केट में लगाने का फैसला किया था, उसी समय इसका विरोध किया गया था।

मौजूदा समय में ईपीएफ़ओ के क़रीब छह करोड़ सदस्य हैं।

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