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मज़दूरों से इतनी घृणा- हरियाणा सरकार ने नए उद्योगों को श्रम क़ानून से 3 साल के लिए किया मुक्त

हरियाणा सरकार ने औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 तथा कारखाना अधिनियम 1948 का अध्यादेश लाकर संशोधित करने का फैसला किया है

मेहनतकश मज़दूरों को उनका वेतन न दिला पाने वाली सरकार, अपने किए हुए वादे से कोर्ट में मुकर जाने वाली सरकार अब मज़दूरों के अधिकार को छीनने पर उतारू हो गई है।

पहले श्रम क़ानूनों को रद्द किया फिर ठेका मज़दूर श्रम क़ानून को रद्द किया अब नए उद्योगों को भी श्रम क़ानून से आज़ादी दे दी है।

हरियाणा सरकार ने नए उद्योगों को पहले ही तीन साल के लिए श्रम क़ानून से मुक्त कर दिया है। यानी कि नए उद्योग को शुरू करने वाले मालिकों को पहले एक हज़ार दिन, यानी की पूरे तीन साल के लिए श्रम क़ानून के बंधन से हरियाणा सरकार ने मुक्त कर दिया है। ताकि वे लोग बेफ़िक्र होकर मज़दूरों का खून निचोड़ सकें।

7 जुलाई को हुई कैबिनेट मीटिंग में मनोहर लाल खट्टर की अगुवाई वाली सरकार ने औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 तथा कारखाना अधिनियम 1948 को अध्यादेश लाकर संशोधित करने का फैसला किया है।

हरियाणा सरकार ने एक आधिकारिक बयान में कहा कि, औद्योगिक विवाद (हरियाणा संशोधन) अध्यादेश 2020 का मसविदा मंत्री परिषद के अगले बैठक में पेश किया जाएगा।

इससे कोरोना के कारण आर्थिक तंगी से जूझ रहे कारखानों को चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलेगी।

ठेका मज़दूर उन्मूलन क़ानून को भी दो साल के लिए किया है रद्द

सरकार के ज़हन में पूंजीपतियों के लिए कितनी संवेदना है और मज़दूर के प्रति कितनी घृणा हैं इस बात का सबूत आए दिन सरकार  खुद ही पेश कर रही है।

इससे पहले लॉकडाउऩ के बहाने यूपी सरकार ने अगले तीन सालों के लिए सभी श्रम क़ानूनों को मज़दूरों से छीन लेने का ऐलान किया था। ये फैसला योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट में हुआ था।

श्रम क़ानूनों को खत्म करने के साथ- साथ सरकार ने सरकारी अनाज गोदामों एफसीआई को भी दो साल के लिए ठेका मज़दूर उन्मूलन क़ानून से मुक्त कर दिया है।

श्रम क़ानूनों को खत्म करने का काम वही सरकार कर रही है, जिसके प्रधानमंत्री ने 24 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा करते समय अपील की थी कि, किसी भी कर्मचारी का वेतन कोई भी नियोक्ता न काटे। पर यहां पर तो कई कंपनियां लॉकडाउन के पहले का वेतन मज़दूरों को नहीं दे रही हैं।

हालांकि पूंजीपतियों के दबाव में आकर सरकार अपने ही किए हुए वादे से मुकर गई। 4 जून को वेतन को लेकर सुनवाई के दौरान सरकार सुप्रीम कोर्ट में इस वादे से पीछे हट गई थी।

सरकार का तर्क था कि, ‘जब लॉकडाउन शुरू हुआ था, तब कर्मचारियों के काम वाली जगह को छोड़कर अपने गृहराज्यों की ओर पलायन करने से रोकने की मंशा के तहत अधिसूचना जारी की गई थी। लेकिन अंततः ये मामला कर्मचारियों और कंपनी के बीच का है और सरकार इसमें दखल नहीं देगी।

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