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होंडा मानेसर प्लांट में कैजुअल वर्करों के बाद परमानेंट वर्करों से छुट्टी पाने की तैयारी

कंपनी ने बड़े पैमाने पर वीआरएस देने की स्कीम निकाली, पांच महीने पहले ही हुआ था वेतन समझौता

आख़िरकार ठीक एक साल बाद मानेसर की होंडा कंपनी ने परमानेंट वर्करों से पीछा छुड़ा लेने का अपना दांव चल ही दिया। अभी कुछ दिन पहले ही ग्रेटर नोएडा के होंडा प्लांट में क़रीब 1000 परमानेंट वर्करों को ज़बरदस्ती वीआरएस देकर प्लांट को खाली करा लिया गया था।

मानेसर के होंडा प्लांट में पिछले महीने हुए शट डाउन के बाद अब बड़े पैमाने पर परमानेंट वर्करों को जबरदस्ती वीआरएस दिए जाने की ख़बरें सामने आ रही हैं।

नाम ने छापने की शर्त पर कंपनी से जुड़े एक वर्कर ने वर्कर्स यूनिटी को बताया कि ‘कंपनी ने मेंटेनेंस के नाम पर दिसम्बर में ही शट डाउन घोषित कर दिया और जब वर्कर छुट्टियों पर थे, उन्हें इस संबंध में जानकारी मिली।’

बीते पांच जनवरी को कंपनी ने वीआरएस से संबंधित एक नोटिस जारी कर अपनी मंशा को स्पष्ट कर दिया है। इसमें कहा गया है कि पांच जनवरी से 23 जनवरी 2021 तक ये योजना चलेगी और 31 जनवरी 2021 तक जो लोग 10 साल पूरा कर चुके होंगे या 40 साल की उम्र पार कर चुके होंगे, वे पात्र होंगे।

वीआरएस योजना में सीनियर मैनेजर, वाइस प्रेसिडेंट, मैनेजर, डिप्टी मैनेजर, असिस्टेंट मैनेजर, सीनियर एक्ज़ीक्युटिव, एक्ज़ीक्युटिव, एक्ज़ीक्युटिव, असिस्टेंट एक्ज़ीक्युटिव और परमानेंट वर्कर अप्लाई कर सकते हैं।

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72 लाख के अलावा पांच लाख देने का प्रलोभन

कंपनी ने गणना करके देय राशि भी बताई है, जिसके तहत परमानेंट वर्करों को 72 लाख रुपये मिलेगा, जिसमें टैक्स लाभान्वित को देना होगा।

कंपनी को इतनी जल्दी है कि नोटिस में कहा गया है कि शुरु के 1 से 400 आवेदन करने वालों को पांच लाख रुपया अतिरिक्त दिया जाएगा और अगर इससे अधिक आवेदन आते हैं तो सभी को 4 लाख रुपये दिए जाएंगे।

ये नोटिस डिवीज़नल हेड जनरल अफ़ेयर्स नवीन शर्मा द्वारा हस्ताक्षरित है और इसके पीछे कंपनी के बेहतर परिचालन का कारण बताया गया है। कम्पनी ने कहा है कि ऑटो उद्योग में आर्थिक गिरावट होने से संकट की स्थिति है।

कंपनी के अनुसार, भारतीय दोपहिया बाज़ार के प्रतिस्पर्द्धा में बने रहने के लिए उच्च क्षमता और सस्ती लागत बनी रहनी चाहिए।

कंपनी का तर्क ये है कि भारतीय दोपहिया बाज़ार, कोरोना संकट के कारण बिक्री में कमी और आर्थिक गिरावट के कारण चुनौती दौर से गुज़र रहा है।

ठीक साल भर पहले इसी प्लांट में कैजुअल वर्करों की एक ऐतिहासिक हड़ताल हुई थी और चार महीने तक कंपनी के सामने बैठने के बावजूद कंपनी और वर्करों के बीच कोई संतोषजनक हल नहीं निकल पाया।

5 नवंबर 2019 को होंडा के ढाई हज़ार मज़दूर हड़ताल पर चले गए थे। कैजुअल मज़दूर कंपनी के अंदर 14 दिन तक बैठे रहे, इसके बाद 19 नवंबर को मज़दूर कंपनी से निकल कर बाहर धरने पर बैठ गए।

इस आंदोलन में कैजुअल वर्करों के साथ परमानेंट वर्करों की यूनियन भी बाहर से समर्थन दे रही थी और इस कारण यूनियन के तत्कालीन प्रधान को भी बाद में नौकरी से निकाल दिया गया।

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परमानेंट वर्करों से भी छुट्टी पाना चाहती है कंपनी

उस हड़ताल में 2500 कैजुअल वर्करों को कंपनी ने निकाल दिया और उन्हें मुआवज़े के तौर पर कुछ पैसे देकर रफ़ा दफ़ा कर दिया गया।

गौरतलब है कि अभी पांच महीने पहले ही होंडा की एम्प्लाईज़ यूनियन और मैनेजमेंट के बीच वेतन समझौता हुआ था और वर्कर इसे अपनी जीत के रूप में ले रहे थे लेकिन क्या पता था कि मैनेजमेंट की रणनीति कुछ और है।

ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट योगेश का कहना है कि ‘कंपनी कोरोना महामारी की आपदा को अवसर में बदलने के मोदी के आह्वान का अक्षरशः पालन कर रही हैं और इसका फायदा उठा कर परमानेंट वर्करों से पूरी तरह छुट्टी पा लेना चाहती हैं।’

इसी महामारी के दौरान मोदी सरकार ने 29 श्रम क़ानूनों को ख़त्म तीन लेबर कोड संसद से ज़बरदस्ती पास करा लिए थे जिसमें यूनियन बनाने से लेकर हड़ताल करने तक को लगभग मुश्किल बना दिया गया है।

यही नहीं अब 300 तक की संख्या वाली कंपनियों में छंटनी की खुली छूट दे दी गई है और लेबर कोर्ट को अब सिर्फ सलाह देने वाले क्लर्क ऑफ़िस तक सीमित कर दिया गया है।

इसी के साथ, बोनस, ईपीएफ़, पेंशन, काम के आठ घंटे के अधिकार, वर्करों के लिए कल्याणकारी योजनाएं, प्रवासी मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए बने क़ानूनों को समाप्त कर दिया गया है।

मोदी सरकार की नीतियों का असर

ट्रेड यूनियन नेताओं का कहना है कि असल में ये लेबर कोड मज़दूर आंदोलन को देश से ख़त्म कर दिए जाने के लिए लाया गया है। और सरकार की इन्हीं नीतियों के चलते उद्योगों में भारी पैमाने पर छंटनी, तालाबंदी, शटडाउन, लेऑफ़ धड़ल्ले से हो रहा है।

मारुति सुज़ुकी मज़दूर संघ के अध्यक्ष नरेंद्र कहते हैं कि लेबर कोड मज़दूर वर्ग पर सरकार की ओर से किया गया अबतक का सबसे बड़ा हमला है।

मोदी सरकार की इन्हीं नीतियों के चलते किसान दिल्ली के बॉर्डर को एक महीने से घेरे बैठे हैं, जिसकी शुरुआत केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर 26 नवंबर को देशव्यापी हड़ताल से हुई थी।

उल्लेखनीय है कि मानसून सत्र में आनन फानन में तीन कृषि बिलों और तीन लेबर कोड को ज़बरदस्ती पास करा लिया गया था जिसका बहुत विरोध हो रहा है।

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