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होंडा के 16 कैजुअल मज़दूरों का अभी भी नहीं हुआ सेटलमेंट, छह महीने से मिल रही तारीख़ पर तारीख़

अक्टूबर 2019 में कैजुअल मज़दूरों ने गैरक़ानूनी तरह से निकाले जाने को लेकर किया था विरोध

सुभाष होंडा में पिछले 7 साल से कार्यरत थे। पिछले साल के अंत में हुई ऐतिहासिक हड़ताल में लगभग सभी ढाई हज़ार मज़दूरों का कंपनी से समझौता हो गया लेकिन सुभाष को कंपनी ने इन्हें कोई हिसाब नहीं दिया।

सुभाष की तरह क़रीब 16 मज़दूर हैं जिनका पिछले छह महीने से मामला लटका हुआ है।

हरियाणा के मानेसर में स्थित होंडा प्लांट में अक्टूबर महीने में हुए प्रदर्शन में ये 16 मजदूर भी शामिल थे।

ग्रेच्युटी के लिए ये सभी मज़दूर पिछले 6 महीने से कंपनी का चक्कर काट रहे हैं, पर कोई सुनवाई नहीं है।

अक्टूबर 2019 में होंडा में काम करने वाले लगभग 2500 मज़दूरों ने लगातार गैरक़ानूनी छंटनी का विरोध करते हुए हड़ताल करदिया था, जिसके बाद कंपनी ने सभी को निकाल दिया।

निकाले गए अधिकांश मज़दूर 10-10 सालों से काम कर रहे थे। इन्हें बिना मुआवजा और नोटिस पीरियड के निकाला गया था।

मज़दूरों का प्रदर्शन कई महीनों तक चलता रहा, इन्हें मार्च में जाकर ग्रेच्युटी मिली।

कंपनी के समझौते से मज़दूर खुश नहीं थे। प्रदर्शन करने वाले आधिकतर मज़दूर ठेके पर काम कर रहे थे।

कंपनी प्रबंधन का दावा नहीं बनता कोई मुआवज़ा

सुभाष ने वर्कर्स यूनिटी को बताया कि, “जब हमें ग्रेच्युटी नहीं मिली तो हमने प्रबंधन से सवाल किया। हमें आश्वासन दिया गया कि, धीरे-धीरे कर के सब को पैसा मिल जाएगा।”

फिर वो बताते हैं, “लेकिन लेबर कोर्ट में प्रबंधन मुकर गया। कहने लगा इनका कोई पैसा नहीं बनता है। कोर्ट भी इन्हीं के पक्ष में है। यूनियन को कोई मतलब ही नहीं है।”

सुभाष कहते हैं, “अक्टूबर से हम बेरोज़गार हैं। क्योंकि हर महीने लेबर कोर्ट को चक्कर काटने पड़ते हैं। इसलिए कोई काम नहीं कर पा रहे हैं। कोर्ट जाने में पैसे भी र्खच हो रहे हैं।”

वो बताते हैं, “जब से लॉकडाउन लगा है। लोगों से उधार लेकर घर का खर्च चल रहा है।”

वहीं मज़दूर बीते जाड़े में होंडा कंपनी के सामने मैदान में महीनों तक डटे रहे, इस दौरान कंपनी में बमुश्किल प्रोडक्शन हो पाया, हालांकि परमानेंट मज़दूर इस हड़ताल में शामिल नहीं थे, लेकिन यूनियन का समर्थन था।

बड़ी मशक्कत के बाद 3 मार्च को मज़दूरों और कंपनी के बीच समझौता हुआ।

शुरुआत में प्रति वर्ष सेवा के लिए 15,000 रुपये मुआवज़ा देने की बात कही थी जिसे अंतिम समझौते में 23,000 रुपये तक बढ़ा दिया था।

चूंकि अधिकांश मज़दूर सालों से कंपनी में कैजुअल वर्कर के रूप में काम कर रहे थे इसलिए उन्हें प्रति वर्ष सेवा के हिसाब से फाइनल सेटलमेंट दिया गया था।

हालांकि मज़दूरों की मांग थी कि उन्हें प्रति वर्ष सेवा के लिए एक लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाए, लेकिन चार महीने से धरने पर बैठे मज़दूर थक गए थे और अंतिम समझौते को लेकर खुश न होने के बावजूद उन्हें धरना ख़त्म करना पड़ा।

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