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कोयला खदान बेचने के ख़िलाफ़ अड़ी यूनियनें, मोदी सरकार का न्योता ठुकराया, 2 जुलाई से होगी हड़ताल

कोयला खदानों को निजी हाथों में बेचने को मोदी सरकार बता रही आत्मनिर्भरता

कोयला खदानों को प्राइवेट कंपनियों को देने के फैसले पर ट्रेड यूनियनें अब आर पार की लड़ाई के मूड में आ गई हैं।

कोल इंडिया एससीसीएल में दो जुलाई से तीन दिन के राष्ट्रव्यापी हड़ताल से पहले मोदी सरकार की ओर से बुलाई गई मीटिंग के न्योते को ठुकराकर ट्रेड यूनियनों ने अपने इरादे ज़ाहिर कर दिए हैं।

ऑल इंडिया कोल वर्कर्स फ़ेडरेशन के जनरल सेक्रेटरी डीडी रामानंदन ने कहा कि हड़ताल पूर्व निर्धारित तारीखों पर ही होगी।

उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार ने लॉकडाउ को एक अवसर बताकर कई सरकारी प्रतिष्ठानों को प्राईवेट कंपनियों के हाथों में बेच डालने का फैसला लिया था।

इसमें भारत पेट्रोलियम, कोल इंडिया समेत इसरो जैसे बहुत ही संवेदनशील सरकारी प्रतिष्ठान भी शामिल हैं।

एक ट्विटर यूज़र समीर ने लिखा है कि ‘भारत सरकार ने खनन क्षेत्र में 100 प्रतिशत एफ़डीआई की इजाज़त दी है। कोल इंडिया लि. दुनिया की सबसे बड़ी खनन कंपनी है जिसका मुनाफ़ा 2018-19 में 27,000 करोड़ रुपये था और कंपनी के पास 31,000 करोड़ रुपये सरप्लस हैं। आप समझ सकते हैं कि सरकार आखिर इसे क्यों बेच रही है?’

आरएसएस नियंत्रित बीएमएस भी विरोध में

कोल इंडिया से जुड़ी कंपनी सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिज़ाइन इंस्टीट्यूट लि. को अलग किए जाने पर भी ट्रेड यूनियनों ने ऐतराज जताया है।

इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, 28 जून को मोदी सरकार ने ट्रेड यूनियनों की बैठक बुलाई थी।

आरएसएस के नियंत्रण वाले भारतीय मज़दूर संघ (बीएमएस) के नेता बीके राय ने अख़बार को बताया,  “ज्वाइंट सेक्रेटरी स्तर की एक मीटिंग बुलाई गई थी लेकिन ट्रेड यूनियनों ने इसमें शामिल होने से मना कर दिया। हम केवल कोयला सचिव या कोयला मंत्री से ही बात करेंगे।”

ट्रेड यूनियनों का कहना है कि अगर सरकार कोयला खदानो को निजी कंपनियों को बेच देने की अपनी ज़िद पर अड़ी रही तो मज़दूर और कड़े कदम उठाने पर मजबूर होंगे।

अख़बार ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि अगर ये हड़ताल होती है तो इससे क़रीब 40 लाख टन कोयला उत्पादन का नुकसान होगा।

आत्मनिर्भरता या बेचने की साजिश!

ट्रेड यूनियन नेताओं का आरोप है कि कोल इंडिया में ठेकेदारों के मार्फ़त काम कराए जाने से भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया है। बीते मार्च की तिमाही में ठेका प्रथा पर अनाप शनाप खर्च बढ़ा है और इसलिए कंपनी को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा है।

मोदी सरकार कोयला खदानों को बेच देने की अपनी करतूत को अभी भी आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा कदम बता रही है।

लेकिन ट्रेड यूनियनें इसे मोदी सरकार की निजीकरण की साजिश बता रही हैं।

मोदी सरकार ने लॉकडाउन के दौरान श्रम क़ानूनों को भी भी एक एक कर ख़त्म करने का काम किया है।

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