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कोर्ट ने कहा, निकाला गया मज़दूर चुनाव लड़ सकता है, मैनेजमेंट और पुलिस ने चुनाव ही नहीं होने दियाः एफ़सीसी क्लच

यूनियन प्रेसिडेंट को एक साल पहले मैनेजमेंट ने मारपीट के आरोप में काम से निकाल दिया था

सिविल कोर्ट के आदेश के बावजूद मानेसर में स्थित एफ़सीसी क्लच इंडिया में यूनियन का चुनाव नहीं हो पाया। पहले मैनेजमेंट और फिर हरियाणा प्रशासन ने ये चुनाव होने नहीं दिया।

सात साल तक एफसीसी क्लच इंडिया एम्प्लाईज़ यूनियन के प्रेसिडेंट रहे और फिलहाल कंपनी से बाहर कर दिए गए सतीश कुमार को गुड़गांव सिविल कोर्ट से प्रधान पद का चुनाव लड़ने की मंजूरी मिल गई थी।

चुनाव रविवार 23 अगस्त 2020 को होने वाला था, लेकिन कंपनी प्रबंधन ने अपने परिसर को चुनाव के लिए इस्तेमाल करने से मना कर दिया।

इस यूनियन के फ़ाउंडर सदस्यों में से एक रहे सतीश कुमार ने वर्कर्स यूनिटी को बताया, “पहले कंपनी प्रबंधन ने एक नोटिस जारी कर कहा कि चुनाव कंपनी परिसर में नहीं हो सकता है। फिर मजदूरों ने एकजुट होकर चुनाव कराने के लिए एक बैंक्वेट हॉल बुक किया।”

वो बताते हैं, “प्रबंधन ने हरियाणा प्रशासन के साथ मिलकर मैरिज हॉल में भी चुनाव नहीं होने दिया। हॉल के मालिक को कोरोना का हवाला देकर पुलिस ने डराया धमकाया जिससे शनिवार की रात को उसने बुकिंग कैंसिल कर दी।”

सतीश का कहना है कि मैनेजमेंट नहीं चाहता कि यूनियन का पदाधिकारी वो बनें, जबकि मज़दूर एकजुट होकर चाहते हैं कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हो।

सतीश पर कंपनी प्रबंधन ने फरवरी 2019 और जुलाई 2019 में एचआर के साथ मारपीट करने के आरोप में एफ़आईआर दर्ज कराई थी और आंतरिक जांच के बाद उन्हें बाहर कर दिया गया।

सतीश का आरोप है कि, ‘मुझे काम से निकालने के लिए प्रबंधन की चाल थी।’

कोर्ट का आदेश भी काम नहीं आया

सतीश के अनुसार, फरवरी में दर्ज किए गए एफआईआर से वे बच गए लेकिन प्रबंधन ने जुलाई 2019 में हुए एफ़आईआर के कारण काम से निकाल दिया।

सतीश बताते हैं कि, ‘प्रबंधन को जैसे ही इस बात की खबर लगी कि कंपनी में प्रधान पद के लिए चुनाव होने वाला है और मज़दूर मुझे प्रधान के तौर पर चुनना चाहते हैं। वैसी ही कंपनी ने गुड़गांव सिविल कोर्ट में याचिका दायर कर दी।’

मैनेजमेंट का तर्क था कि सतीश कि चूंकि कंपनी में अब काम नहीं करते हैं, इसलिए इन्हें चुनाव लड़ने की इज़ाज़त न दी जाए।

एफसीसी क्लच इंडिया यूनियन की ओर से क़ानूनी सलाह दे रहे वकील मोनू ने कहते हैं, “कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए 20 अगस्त को कहा कि, व्यक्ति कंपनी में काम करता है या नहीं इससे प्रधान पद के चुनाव का कोई लेना देना नहीं है। और सतीश कुमार को चुनाव लड़ने की इज़ाज़त दे दी गई।”

असल में इस तरह के विवाद से संबंधित एक फैसला क़रीब डेढ़ दशक पहले उच्च अदालत ने दिया था और उसी आधार पर यूनियन की जीत हुई।

लेकिन कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद मैनेजमेंट ने चुनाव ही नहीं होने दिया। सतीश का कहना है कि ‘कंपनी मजबूत यूनियन नहीं चाहती है और उसे मज़दूरों की एकता से डर लगता है।’

10-10 साल से काम कर रहे ठेका मज़दूरों को निकाला

यूनियन से जुड़े एक अन्य मज़दूर ने बताया कि, एफसीसी क्लच इंडिया में 2009 में यूनियन बनाई गई थी और सतीश इसकी अगुवाई कर रहे थे। वो यूनियन के 2009 से 2014 तक प्रेसिडेंट रहे। फिर 2016 से 2018 तक अपना पद संभाला।

2019 में कंपनी ने इन्हें कथित केस में काम से निकाल दिया, जिसके बाद से ही मज़दूर सतीश कुमार की बहाली करने और फिर से प्रधान चुनने की मांग कर रहे हैं।

कंपनी में दोपहिया और चार पहिया वाहनों का क्लच बनाया जाता है। ये कंपनी बजाज, मारूती, होंडा जैसी अग्रणी वाहन निर्माता कंपनियों को सप्लाई देती है।

एफ़सीसी क्लच कंपनी मैनेजमेंट के ख़िलाफ़ मज़दूरों की तमाम शिकायतों में से एक ये भी है कि लॉकडाउन के दौरान काम पर न आने वाले 90 ठेका मज़दूरों को निकाल दिया था।

कंपनी ने 24 घंटे के अंदर ड्यूटी ज्वाइन करने का आदेश जारी दिया लेकिन मज़दूर उस दौरान अपने घर चले गए थे। सार्वजनिक परिवहन शुरू न होने के कारण वो अपनी ड्यूटी ज्वाइन नहीं कर पाए। मैनेजमेंट ने यही कारण बता कर उन्हें कंपनी से बाहर कर दिया।

ये ठेका मज़दूर कंपनी में 10 -10 15-15 साल से काम कर रहे थे और कंपनी ने बिना किसी मुआवज़ा या सामाजिक सुरक्षा के नियमों का पालन करते हुए उन्हें अचानक काम से निकाल दिया। मज़दूर तबसे धरना प्रदर्शन कर रहे हैं।

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