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कानपुर से लेकर कोलकाता तक तूफ़ानी मज़दूर हड़तालों का साल 1935-36 : इतिहास के झरोखे से-7

जब मंदी के बाद भी वेतन कटौती जारी रखने पर फूटा मज़दूरों का गुस्सा

By सुकोमल सेन

बीते कुछ सालों में कमजोर हुआ ट्रेड यूनियन आंदोलन 1935-36 में पुन: शक्ति प्राप्त करने लगा था। ट्रेड यूनियन आंदोलन में किए गए एकता के प्रयास निश्चय ही लाभप्रद साबित हुए और आंदोलन में पुन: जान डालने में बड़ी भूमिका निभाई।

लेकिन ऐसे ही समय राजनीतिक मोर्चे पर हुए विकास ने भी इस ताक़त के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण किया।

नागरिक अवज्ञा आंदोलन (असहयोग आंदोलन) और अन्य लोकप्रिय सघर्षों में भाग लेते हुए और अंत में राष्ट्रीय कांग्रेस ने कांग्रेस सोशलिस्ट ग्रुप और निरंतर आगे बढ़ रहे कम्युनिस्टों की गतिविधियों को बराबर मुकाबले वाली शक्ति के रूप में पाया।

सन् 1934 के बाद नई राजनीतिक शाक्तियों के उदय से वाम रुझान वाली राजनीति के उभार ने इस कमजोर हो रहे भारत के मजदूर वर्ग आंदोलन पर फिर से अपनी ताक़त इकट्ठा करने वाला प्रभाव डाला।

सन् 1934 के प्रारंभ में ही वैश्विक मंदी की परिस्थिति में परिवर्तन दिखने लगा था। यह परिवर्तन भारत में सबसे पहले जूट और सूती कपड़ा मिलों में दिखाई दिया।

मंदी सामाप्त होते-होते भारत के संगठित उद्योगों में मजदूरों की संख्या भी धीरे-धीरे बढ़ने लगी। सन् 1933 में कुल मजदूरों की संख्या करीब 14 लाख (14,03,212) थी, यह 1934 में बढ़ कर, 14.87 लाख (14,87,231) हो गई, 1935 में यह संख्या 16 लाख (16,10932) से बढ़कर, 16.52 लाख (16,52,147) हो गई।

दमन के बाद पूरे कानपुर में फैली हड़ताल

औद्योगिक उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि के बावजूद, मालिकों ने मंदी के नाम पर की गई वेतन कटौती को समाप्त करने से इनकार कर दिया।

इसके अतिरिक्त औद्योगिक रिकॉर्ड उत्पादन ने मालिकों के अंदर अकूत मुनाफा कमाने की इच्छा को जन्म दिया और उन्होंने आधुनिक मशीनों को लगाने का रास्ता चुना ताकि मजदूरों का और अधिक शोषण हो सके।

इसलिए इस अवधि में मजदूर वर्ग को पहले से चली आ रही वेतन कौटती को समाप्त कराने, वेतन बढ़ोत्तरी और नए तरह से होने वाले शोषण में वृद्धि के ख़िलाफ़ भी संघर्ष करना पड़ा।

इस अवधि में होने वाली हड़तालों में कोलकाता की केशवराम कॉटन मिल और अहमदाबाद काटन मिलें सर्वोपरि रहीं। केशवराम कॉटन मिल के 5,000 मजदूरों ने काम बंद रखा जिससे 1,19,000 कार्यदिवसों की हानि हुई।

अहमदाबाद के 23,000 कपड़ा मजदूरों ने 12.5 प्रतिशत वेतन कटौती के ख़िलाफ़ काम बंद रखा जिससे 93,000 कार्यदिवसों की हानि हुई।

इन दोनों मिलों में हुए कार्यदिवसों की हानि इस वर्ष में सर्वाधिक थी। सन् 1935-36 मे 63 प्रतिशत हड़तालें वेतन के प्रश्न पर हुईं।

अहमदाबाद के मजदूरों ने वास्तव में समझौते को तोड़ कर हड़ताल की थी। इस समझौते में वेतन कटौती स्वीकार की गई थी और इसके लिए गांधीजी ने मजदूरों को ‘शांतिपूर्वक समझौता स्वीकार करने’ की सलाह दी थी।

कानपुर से से लेकर कोलकाता तक हड़तालों का तांता

समझौते के बावजूद काम्युनिस्टों की पहलकदमी से मज़दूरों ने एक हड़ताल शुरु कर दी। लेकिन मजदूर महाजन के द्वारा हड़ताल का सक्रिय विरोध करने से हड़ताल 5 फरवरी को वापस ले ली गई।

कानपुर के भी कपड़ा मजदूरों ने काम रोक दिया। 10 सितंबर 1936 को एथर्टन वेस्ट मिल में छंटनी और वेतन कटौती के ख़िलाफ़ हड़ताल शुरू हुई जो 8 दिन बाद हुए समझौते से समाप्त हुई।

एक और हड़ताल कूपर एलॉय मिल में हुई। इस हड़ताल के 39वें दिन इसके समर्थ में पूरे कानपुर में हड़ताल हुई और 41 दिन तक हड़ताल चलने के बाद 29 दिसंबर को समझौता हुआ।

बंगाल के जूट मिल में भी इसी अवधि में हड़तालें हुईं। 9 अप्रैल 1936 को हुकुमचंद जूट मिल के मजदूर हड़ताल पर चले गए।

मालिकों ने मजदूरों को डराना-धमकाना शुरू किया और अंत में जब पुलिस को अंदर बुला लिया गया तो दोनों के बीच झड़पें होने लगीं।

जानबूझ कर किए गए पुलिस दमन से मजदूर क्रोधित हो उठे और हड़ताल दूसरे मिलों में भी फैल गई।

हुगली, जगदल और नइहारी के 20,000 जूट मिल मजदूरों ने हड़ताल में भागीदारी की। मजदूरों ने यह हड़ताल वेतन कटौती को समाप्त करने की मांग और सप्ताह में काम के घंटे 40 से बढ़ाकर 54 करने के ख़िलाफ़ की थी।

मेवाड़ के अजमेर स्थान पर बेवर सूती मिल के 4,000 मजदूरों ने वेतन में कमी करने के ख़िलाफ़ जुलाई 1936 में हड़ताल की।

इस हड़ताल में 3,75,000 कार्यदिवसों की हानि हुई। एक देशी रियासत में हड़ताल का होना इसकी ख़ासियत थी।

रेलवे में भी हड़ताल शुरू हो गई

फैक्ट्री एक्ट के प्रवाधानों को न लागू करने और इस प्रकार मजदूरों का अधिकतम शोषण करने के उद्देशय से पूंजिपतियों ने इस दौरान देशी राजाओं की रियासतों में औद्यगिक निवेश करना प्रारंभ किया।

लेकन इन देशी रियासतों के पिछड़े मजदूर भी अपनी जीवन स्थितियों और कार्यदशा में सुधार के लिए हड़ताली संघर्षों में कूद पड़े।

इस समय की सबसे बड़ी हड़ताल बी.एन. रेलवे में हुई, जिसमें 26,500 मजदूरों ने भागीदारी की।

हड़ताल 13 दिसंबर 1936 को शुरू हुई और 10 फरवरी 1937 तक चली। इस प्रकार 10 लाख से अधिक कार्यदिवसों की हानि हुई।

हड़ताल शुरू होने से पहले बी.एन. रेलवे इंडियन लेबर यूनियन ने प्रबंधकों से लंबी बातचीत चलाई। लेकिन अचानक 27 ट्रेन निरीक्षकों को नौकरी से निकाल दिया गया।

नौकरी से इस निष्कासन के खिलाफ मजदूर बैठ हड़ताल पर चले गए। रेलवे अधिकारियों नें सेवामुक्त किए गए मजदूरों को नौकरी पर वापस लेने की बजाए 1,100 और मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया गया साथ ही रेलवे बोर्ड ने यूनियन की मान्यता भी वापस ले ली।

अधिकारियों की इन निरंकुश कार्रवाइयों के ख़िलाफ़ हड़ताल शुरू हुई और पूरे रेलवे में फैल गई।

हड़ताल जारी रहते हुए, राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने फैजपुर के अधिवेशन में हड़तालियों के साथ सहानुभूति प्रदर्शित की और जनता से हड़ताल के समर्थन में खड़ा होने और सहयोग करने की अपील की।

उपरोक्त घटनाएं, कुछ बड़ी गतिविधियों का ज़िक्र भर हैं, इसके अलावा बहुत सी छोटी-छोटी और अल्प अवधि की हड़तालें विभिन्न उद्योगों में घटित हुईं।

(भारत का मज़दूर वर्ग, उद्भव और विकास (1830-2010) किताब का अंश। ग्रंथ शिल्पी से प्रकाशित)

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