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आरएसएस और कारपोरेट के अभूतपूर्व हमले के जवाब में ट्रेड यूनियनें फ़ेल हो चुकी हैं? अंतिम भाग

दशकों पुराने मांग पत्रक और नारों के सहारे ट्रेड यूनियन आंदोलन कितना खड़ रह पाएगा- नज़रिया

By प्रदीप कुमार

आम तौर पर ट्रेड यूनियन आंदोलन से वर्करों के दूर होने के बहुत घातक परिणाम सामने आ चुका है।

यहां तक कि रेडिकल ट्रेड यूनियनों के मंच मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) भी बहुत सारे मौकों पर इन्हीं केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के खोखले नारों और मांग पत्रों को ही उधार लेता है।

इसिलिए बिना इन ग़लतियों की तत्काल पहचान किए उसी गति को प्राप्त होने का ख़तरा ज़्यादा है।

मोदी सरकार और इसके फ़ासिस्ट प्रोजेक्ट को हराने का मुद्दा सामने है। लेकिन केंद्रीय ट्रेड यूनियनें क्या कर रही हैं? बढ़ती बेरोज़गारी, गंभीर समस्या झेलते वर्कर और केंद्र सरकार द्वारा उनके अधिकारों को ख़त्म करने को रेखांकित करना ही उनका एकमात्र हथियार बना हुआ है।

सिर्फ यही एकमात्र रणनीति अपनाने से काम नहीं बन रहा है।

क्या अब भी ये साफ़ नहीं हुआ है कि फ़ासिस्टों और मोदी को हराने का काम बार बार सिर्फ आर्थिक संकट को मज़दूरों के सामने दुहराते रहने से नहीं होने वाला?

मज़दूर इन मुद्दों को केंद्र सरकार से जोड़ नहीं पाते और यहीं किसान और मज़दूर पूरे समाज में खुद को अलग थलग पाते हैं।

अकेले शहर के दम पर ट्रेड यूनियन आंदोलन

निराशा के कारण पैदा हुआ ज़मीन और काम से अलगाव मोदी और केंद्र सरकार से उनकी उम्मीदों को बढ़ाता  है। और मोदी क्या देते हैं- राष्ट्रीय स्वाभिमान, सांप्रदायिकता और ‘भ्रष्टाचार मुक्त केंद्र सरकार’ की निहायत ग़लत धारणा!

मोदी और उनकी सरकार से मज़दूर वर्ग की उम्मीदें हैं लेकिन वो सिर्फ उनकी आर्थिक नीतियों में ही निहित नहीं है।

ऐसे हालात में यूनियनें नौकरी ख़त्म होने, बेरोज़गारी बढ़ने और बढ़ते निजीकरण की बात करती हैं और उम्मीद करती हैं कि मज़दूर वर्ग अपनी इस हताशा को केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ एक प्रभावी लड़ाई की ओर मोड़ देगा।

इस तरह का हमने अभी तक कोई उदाहरण नहीं देखा है। मज़दूरों का गुस्सा जल्द ही हताशा निराशा, दिशाहीनता और बिखराव में तब्दील हो जाता है क्योंकि ऐसा कोई सतत संघर्ष नहीं है, जिसका वो हिस्सा बन सकें।

समय की ज़रूरत क्या है? अधिक मुखर सरकार विरोधी, वैचारिक और रणनीतिक रुख़ जो गांव से लेकर शहरों तक मज़दूरों की ज़िंदगी को ट्रेस कर सके और दो मांगों को प्रमुखता से सबके सामने लाए।

पहला- गांवों ज़मीन, न्यूनतम समर्थन मूल्य और खेती से जुड़े अन्य मुद्दे। दूसरा- शहरों में सम्मानजनक रोज़गार का मुद्दा।

इसका अर्थ ये है कि, गांवों में ज़मीन वितरण और शहरों में रोज़गार की एक संयुक्त मांग रखी जानी चाहिए जोकि देश के अधिकांश ठेका मज़दूर और असगंठित क्षेत्र के मज़दूरों को प्रभावित करता है।

सुधारवादी राजनीति का अंत

लेकिन आज हम जो देखते हैं, वो बिल्कुल उलटा है। जो प्रवासी मज़दूर पैदल चलकर अपने गांव पहुंचे, उन्हें आज ट्रेड यूनियन आंदोलन में भुलाया जा चुका है।

जब मज़दूरों की पहचान इतनी अस्थायी है कि कब वो किसान है और कब मज़दूर इसका आंकलन करना एक समय में नामुमकिन है, तो ऐसे में मज़दूर वर्ग का आंदोलन अकेले शहरी इलाक़ों में अलग थलग खड़ा नहीं हो सकता।

इस महासंकट के दौर में ट्रेड यूनियन का मुख्य फ़ोकस जनता के बुनियादी और लोकतांत्रिक अधिकारों की एक बिल्कुल साफ़ और सीधी मांग पर होना चाहिए। और ये मांग सुधारवादी तौर तरीक़ों से नहीं उठाई जा सकतीं।

21वीं सदी का फ़ासीवादी प्रोजेक्ट जैसे जैसे भारत में अपना आकार ले रहा है, सुधारवादी राजनीति की जगह बिल्कुल ख़त्म है।

अब ये सुधार या क्रांति का सवाल नहीं रह गया, बल्कि अब सवाल है फ़ासीवाद या क्रांति!

(ये लेखक के स्वतंत्र विचार हैं और इसपर अगर कोई प्रतिक्रिया देता है तो उसे भी प्रकाशित किया जाएगा। अपनी प्रतिक्रिया workersunity18@gmail.com पर भेज सकते हैं।)

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One Comment

  1. मासा कैसे रैडिकल है इस बारे में लेखक बगैर फैक्ट के ठोस राय बनाये हुए है,। इससे स्पस्ट है कि ये महोदय सिर्फ प्रोपेगैंडा कर रहे है।और इसी प्रोपेगैंडा को आधार देने के लिये सेन्ट्रल ट्रेड यूनियन में बगैर फर्क किये एक जैसा ठहराने की मुहिमबाजी की जा रही है।ताकि स्वघोषित रेडिकल को जायज बताया जा सके।

    मासा को जन्म हुए जितना समय हुआ है उसमें क्या रैडिकल है ? वो रैडिकल कहा दिख रहा है ? क्या इन बिंदु को खुलासा नहीं होना चाहिए।

    क्या महज दावा ही पुष्टि है (वो भी अपने लिये)?

    लेखक सेंट्रल ट्रेड यूनियंस के साझे मांग पत्र को मजदूरों को समझ मे न आने वाला बताता है जैसा कि केंद्र सरकार कहती है।जनाब ये नही बताते की इस मांग पत्र में क्या है? यह दृष्टि दोष कहाँ ले जाएगा?

    मजदूर वर्ग की राजनीति के बगैर मजदूर आंदोलन क्या है?

    रस्मी कार्यवाही है और बार बार आर्थिक सत्य का प्रकट होना है जिसका चरम जंगी अर्थवाद है। जो की रैडिकल नहॉ है। फैक्टरी गेट की लड़ाई को समग्र मजदूर आंदोलन पर आच्छादित कर देना या देश राजनीति से स्वतंत्र समझना एक ऐसी पुरानी खाज की बीमारी है जो न तो संक्रामक है और न ही शांत रहने वाली। इसी लिये ऐसे तत्व कभी भी किसी धारा के रूप में अस्तित्व मान नही है।

    मजदूरों को राजनीति से स्वतंत्र रखने की कोशिशपूंजीवादी सत्ता की प्रबल जरूरत है । लेनिन ने उद्घाटित किया था कि मजदूर वर्ग की राजनीति मजदूरों में बाहरी होती है इसलिए मजदूर आंदोलन में मजदूर वर्ग की राजनीति दी जानी चाहिए नकी राजनीति से दूरी बरतने की कार्यवाही। मांगपत्र मजदूर वर्ग की राजनीति का कदम है।

    मजदूर आंदोलन के प्रति गैर राजनीतिक नजरिया कल्पनाओं में ही भला व निर्दोष है, हकीकत में वो शासको के रक्त सने हाथों का रुमाल होता है।

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