लॉकडाउन में गर्भपात के मामले बढ़े, नौकरी जाने का गुस्सा महिलाओं ने झेलाः सर्वे

पूंजीवादी व्यवस्था में पुरुषवादी वर्चस्व से पिसती आधी आबादी। मेहनत मशक्कत और संघर्ष से हासिल मामूली आजादी भी लॉकडाउन ने महिलाओं से छीन ली। न सेहत का बंदोबस्त न अस्मत की रखवाली।

दो वक्त के निवाले की मुश्किलों में खुद फांका कर परिवार की सांसें बचाने की जद्दोजहद के दिन।

महामारी से ज्यादा सरकारी बेडिय़ों ने जैसे उम्मीद और ख्वाब चकनाचूर कर दिए हों। इस मंजर का सामना और घुटन को प्रगतिशील महिला एकता केंद्र ने जानने की कोशिश की।

उत्तराखंड के कई बड़े इलाकों में महिलाओं ने ऑनलाइन और ऑफलाइन सर्वेक्षण में हिस्सेदारी कर दर्द को बयां किया।

महामारी अधिनियम की दुश्वारियों के बीच हुए सर्वे में उत्तराखंड के नैनीताल जिले में हल्द्वानी, लालकुआं व ग्रामीण क्षेत्र बिंदुखत्ता, पंतनगर विश्वविद्यालय की मजदूर बस्ती ‘ट’ कॉलोनी, जवाहर नगर, रामनगर व ग्रामीण क्षेत्र पीरूमदारा, हरिद्वार ज़िले की कुछ मज़दूर बस्तियां व दिल्ली की मजदूर बस्ती शाहबाद डेरी क्षेत्र की महिलाएं शामिल हुईं।

सर्वे में मजदूर महिलाएं, स्वरोजगार करने वाली महिलाए, आशा वर्कर, भोजन माता, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, अध्यापक, डाक्टर, फार्मासिस्ट, सफाई कर्मचारी, छात्राएं, घरेलू कामगार महिलाएं व घरेलू महिलाएं शामिल रहीं।

सबसे ज्यादा मुसीबत मज़दूर महिलाओं ने झेली।

काम छूटा ही नहीं काम का भार भी बढ़ गया

लॉकडाउन और रोजगार के मुद्दे पर 300 में से 65 मजदूर महिलाओं ने बताया कि उनका काम छूट गया। पूरे लॉकडाउन में न तो कोई और काम मिला और न ही कहीं से कोई आर्थिक मदद।

स्वरोजगार (सिलाई, पार्लर, कागज की थैली बनाने वाली, कॉस्मैटिक व छोटी-मोटी राशन की दुकान) वाली महिलाओं को भी लॉकडाउन के दरम्यान कोई काम नहीं मिला।

भोजनमाता, आशा वर्कर, आंगनबाड़ी, अध्यापक, फार्मासिस्ट, डॉक्टर, सफाई कर्मचारी आदि महिलाओं के रोजगार नहीं छूटे। अलबत्ता, कार्यस्थलों पर अतिरिक्त काम का भार बहुत बढ़ गया है।

सफाई कर्मचारियों ने बताया कि उनसे 4800 रुपये में आठ-नौ घंटे ठेकेदारी पर काम कराया जाता था, जबकि काम दोगुना हो गया।

शुरुआत में कोरोना से बचाव के लिए केवल एक पीपीई किट दी गई थी। उसके बाद कोई सुरक्षा उपकरण नहीं दिए गए।

दो हज़ार मानदेय, मई में वो भी नहीं मिला

आशा वर्करों ने लॉकडाउन के बीच आई जिम्मेदारियों के बोझ को बताया। कहा कि कहने को कोरोना योद्धा तमगा मिला, लेकिन सुरक्षा के नाम पर कोई सुविधा या मानदेय में कोई इजाफा नहीं हुआ।

भोजनमाताओं ने बताया, भले ही स्कूल बंद थे, लेकिन मिडडे मील देने या क्वारंटीन सेंटर बने स्कूलों में भोजन व्यवस्था बिना सुरक्षा कराया गया। साफ-सफाई और झाड़ी काटने का भी काम थोपा गया।

मानदेय के नाम पर मात्र दो हजार रुपये मिलते हैं। मई का तो मानदेय मिला भी नहीं।

प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने वाली शिक्षिकाओं ने बताया कि स्कूल बंद रहे, वेतन नहीं मिला। ऑनलाइन शिक्षण का कोई अनुभव नहीं था, जिससे सामान्य जीवन अस्तव्यस्त हो गया, बाद में आधा वेतन मिला।

फार्मासिस्टों ने बताया कि कोरोना से बचाव के नाम पर सैनेटाइजर मिला, बाकी कुछ नहीं।

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दूध की जगह चीनी का घोल पिलाना पड़ा बच्चों को

घरेलू महिलाओं ने बताया कि लॉकडाउन में पतियों की नौकरी/मजदूरी छूट गई, जिससे रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी मुसीबत हो गई।

हल्द्वानी की एक मज़दूर महिला ने कहा, ‘लॉकडाउन हुआ तो रोजगार छूट गया, घर में खाने के लिए पैसे नहीं बच्चे। तीन बच्चे हैं। दो बच्चे दूध पीते हैं। घर में पैसे न होने के कारण उनके लिए दूध नहीं ला पाए। तब कई बार पानी में चीनी घोलकर बच्चों को पिलाया।’

घरेलू महिला आसिफा ने बताया कि लॉकडाउन में घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि राशन कार्ड पर
गेहूं, चावल, दाल लाने को तीन सौ रुपये तक नहीं बचे, इसलिए राशन नहीं ला सके।

लॉकडाउन में घरेलू काम का बोझ कई ने माना, जबकि कई ने सामान्य बताया क्योंकि बाकी सदस्यों ने मदद की। कई महिलाओं ने बताया कि इस लॉकडाउन में पति और बच्चे सब घर पर ही रहे। इस वजह से घर में काम का बोझ बढ़ गया। सामान्य दिनों में पति काम पर चले जाते थे और बच्चे स्कूल चले जाते थे।

लॉकडाउन में सब लोगों के घर पर रहने से खाना, चाय और बर्तन धोने का काम बढ़ गया। कुछ कामकाजी महिलाओं ने बताया कि घर का काम जल्दी-जल्दी खत्म करके नौकरी पर जाना पड़ता था और वहां भी काम अधिक बढ़ गया था।

लॉकडाउन में गर्भपात के मामले बढ़े

महिलाओं ने बताया महिला अपराध व घरेलू हिंसा में इस दौरान इजाफा हुआ।

महिलाओं के अनुसार, लॉकडाउन में रोजगार छूटने घर में खर्च के लिए पैसे नहीं रहे, बच्चे भूखे रहे और कोई काम न मिलने से सब लोग घर पर खाली बैठे रहे।

ऐसे में लोगों के अवसाद में चले जाने की वजह से घरों में लड़ाई, झगड़ा, मार-पिटाई हुई। परेशान पुरुष तनाव में महिलाओं पर गुस्सा उतारने लगे।

एक शिक्षिका ने कहा कि मीडिया से पता चला कि कई महिलाओं ने खुद आत्महत्या कर ली और बच्चों को भी मार देने तक घटनाएं हुईं, जो तनाव की इंतहा है।

आशा वर्कर राबिया ने बताया कि लॉकडाउन में कुंवारी लड़कियों के गर्भपात कराने के बहुत केस आए जो महिलाओं के साथ यौन अपराधों को उजागर करते हैं।

इसके अलावा कुछ महिलाएं जो और बच्चे पैदा नहीं करना चाहती थीं वे लॉकडाउन के समय में गर्भवती हो गईं और बच्चा पैदा करने को मजबूर हुईं।

गर्भवती महिलाओं के दुर्दिन

हालांकि तमाम महिलाओं ने इस तरह के अपराध के होने को नहीं माना, क्योंकि अधिकांश सदस्य घरों में ही रहे। अधिकांश ने कहा कि इस दौरान इलाज नहीं मिला, जिन्हें मिला तो आधा अधूरा। दो महीने तक जांचें तक नहीं हुईं। गर्भवती महिलाओं के लिए ये बहुत ही बुरा वक्त रहा।

हरिद्वार की एक मजदूर महिला ने बताया कि बीमार व गर्भवती महिलाओं को कोरोना के नाम पर एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल दौड़ाया गया। हरिद्वार की ही एक घरेलू महिला ने बताया, ‘मैं गर्भवती थी, अचानक मेरा बच्चा खराब हो गया। मैं अस्पताल गई लेकिन मुझे कोई सुविधा नहीं मिली।’

आशा वर्कर्स ने बताया कि दो महीने टीकाकरण भी ठप रहा। हल्द्वानी में कुमाऊं का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल सुशीला तिवारी कोविड सेंटर बनने से मरीजों को किसी भी तरह के इलाज बगैर घर में ही रहना पड़ा।

जिन प्राइवेट अस्पतालों में आपात स्थिति में जाना पड़ा, वहां लूट मची थी। बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मोबाइल, इंटरनेट और घर में शिक्षित सदस्य के साथ बैठे रहकर पढ़ाने के काम ने सब बेपटरी कर दिया। अधिकांश बच्चों पर ऐसी सुविधा न होने से उनकी शिक्षा बाधित हो गई।

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