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कैसे गौर सिटी के बाशिंदों ने 100 सिक्योरिटी गार्ड्स की नौकरी बचाई? कहानी मज़दूर वर्ग और आम जनता की एकता की

गार्ड्स के लिए दीवार बनकर खड़े हुए गौर सिटी के रेज़िडेंट्स के आगे आख़िर झुकना पड़ा बिल्डर को

लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मज़दूरों के लिए आम जनता की ओर से जो एकता देखने को मिली उसका एक और नमूना उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा वेस्ट में स्थित गौर सिटी में एक बार और देखने को मिली।

ग्रेटर नोएडा वेस्ट की सबसे बड़ी हाउसिंग सोसायटी गौर सन्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की सिस्टर कंपनी, आईपी स्टेट प्राइवेट लिमिटेड के तहत काम करने वाले 100 सिक्योरिटी गार्ड्स को कंपनी ने जुलाई में काम से निकालने का फरमान सुना दिया।

ये वही सिक्युरिटी गार्ड्स थे जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान भी अपनी ड्यूटी पर आना जारी रखा जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी तक लोगों को घरों में रहने की हिदायत दे रहे थे।

इन गार्ड्स को निकाले जाने की ख़बर जब सोसायटी के रेज़िडेंट्स को पता चली तो उन्होंने इसका प्रतिवाद किया, गौर सिटी और आईपी स्टेट कंपनी के अधिकारियों से सवाल जवाब किए और सबसे बड़ी बात की इन सिक्युरिटी गार्ड्स के पक्ष में एकजुटता प्रदर्शित की।

गार्ड्स के पक्ष में ट्विटर अभियान चलाया गया। सीएम योगी से लेकर प्रशासन तक को टैग कर मैनेजमेंट के मनमाना बर्ताव पर कार्यवाही की मांग की गई।

नतीजा ये हुआ कि पुलिस प्रशासन को भी सक्रिय होना पड़ा और अंततः मजबूरन प्रबंधन को अपने इस मनमाने आदेश को वापस लेना पड़ा, गार्ड्स की नौकरी बहाल हुई।

पेशे से इंजीनियर गौर सिटी में रहने वाले मुकेश पाल ने वर्कर्स यूनिटी को बताया कि गार्ड्स के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बाद इन्हें नौकरी पर बहाल कर लिया गया है। लेकिन कंपनी ने इन्हें एक महीने का नोटिस पीरियड थमा दिया है। फिलहाल यथास्थिति क़ायम है।

सिक्स्थ एवेन्यू में रहने वाले और इलेक्शन कमेटी सदस्यरंजीत सिंह बताते हैं कि सिक्स्थ एवेन्यू में 21 जुलाई को गौर ग्रुप्स ने 13 सिक्योरिटी गार्ड्स को जबरन रिजाइन कराकर घर भेज दिया, जीसी6 में 42 गार्ड्स ड्यूटी पर रहते थे और अब सिर्फ 29 बचे हैं।

12 घंटे की ड्यूटी और 12,000 रुपये

मुकेश पाल बताते हैं, “जिन गार्ड्स ने अपनी जान की परवाह न करते हुए अपनी ड्यूटी पर समय से आते रहे, जो सालों से यहां कंपनी के पेरोल पर काम कर रहे थे, उन्हें एक झटके में निकाल देना बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी थी और वो भी तब कोरोना के मामले बढ़ रहे हों, नौकरियां जा रही हों, लॉकडाउन अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ हो।”

“आख़िर वो कहां जाएंगे। ऐसे समय में वो कहां नौकरी तलशेंगे और उन्हें कहां नौकरी मिलेगी?”

मुकेश पाल के अनुसार, ‘इन गार्ड्स की कोई यूनियन नहीं है। प्रशासन से भी ये डरते हैं। ये अपनी मांग खुद नहीं उठा पाते, अगर स्थानीय निवासियों की ओर से उन्हें हौसला नहीं मिलता। उन्हें तो ये भी नहीं पता कि कहां शिकायत की जाए लेकिन उन्हें ये ज़रूर पता है कि नौकरी पक्की चली जाएगी।’

ये सारे गार्ड्स गौर सिटी के फ़र्स्ट एवेन्यू, फ़ोर्थ एवेन्यू और फिफ्थ एवेन्यू में पिछले कई सालों से काम कर रहे थे। पर कंपनी इन्हें निकालना चाह रही है क्योंकि अब इससे भी सस्ते गार्ड्स वो रखना चाह रही है।

सोसाइटी के बाशिंदों ने जब सुना कि 18 जुलाई को सुपरवाइज़ ने गार्ड्स को बुलाकर दो दिन बाद हिसाब ले लेने के लिए कहा है, उन्हें भरोसा नहीं हुआ।

मुकेश पाल बताते हैं कि “इन गार्ड्स की हालत बहुत बुरी है। उनसे 12 घंटे ड्यूटी कराई जाती है जबकि रजिस्टर पर केवल आठ घंटे दर्ज किया जाता है और सैलरी भी कितनी? ओवरटाइम करके 10-12 हज़ार रुपये, बस!”

कितना इकट्ठा करता है बिल्डर?

निवासियों ने जब गौर सिटी के बिल्डर से बात की तो उसने पहले कहा कि ये उनकी कंपनी के लोग नहीं है। लेकिन जब पता चला कि आईपी स्टेट इसी बिल्डर की कंपनी है, यहां तक कि इसके रजिस्ट्रेशन का पता गौर सिटी के पते पर ही तो बिल्डर ने आर्थिक तंगी का हवाला दिया।

फिफ्थ एवेन्यू अर्पाटमेंट ओनर्स एसोसिएशन के सदस्य रहे मुकेश पाल कहते हैं, “फर्स्ट एवेन्यू, फ़ोर्थ एवेन्यू और फिफ्थ एवेन्यू को मिलाकर यहां पर तीन हज़ार से अधिक फ़्लैट हैं। हर रेज़िडेंट से तीन हज़ार प्रतिमाह मेंटेनेंस लिया जाता है।”

पूर्व एओए सद्स्य फिफ्थ एवेन्यू राजेश रंजन कहते हैं कि गौर ग्रुप द्वारा निवासियों से सोसयटी के मेंटीनेंस का शुल्क बराबर प्रत्येक माह प्रीपेड मीटर से लिया जा रहा है, गार्ड्स और हाउसकीपिंग स्टाफ को कम किया जा रहा है, और अभी जुलाई के आखिरी सप्ताह में मेंटीनेंस शुल्क बढ़ाने का निवासियों को नोटिस भी आ गया… 2015 में जब पहला पजेशन दिया था तबसे आज तक गौर ग्रुप ने एक बार भी आडिट नहीं कराया और ना ही मेंटीनेंस के शुल्क का हिसाब दिया है।

अगर सामान्य गणित का भी इस्तेमाल किया जाए तो बिल्डर को हर महीने क़रीब 90 लाख रुपये मिलते हैं जबकि 100 गार्ड्स का वेतन क़रीब हर महीने 10 लाख रुपये बैठता है। अगर इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, ऑफ़िस कर्मचारी, सफ़ाई कर्मचारी भी इतने ही हों तो खर्च इकट्ठा की हुई राशि का आधा भी नहीं बैठेगी।

मुकेश पाल हैरानी जताते हैं ‘कि जब बिल्डर को इतना पैसा हर महीने रेज़िडेंट मिलकर देते हैं और इस दौरान कोई ऐसा काम नहीं हुआ जिस पर मोटा पैसा खर्च हुआ हो तो गार्ड्स के वेतन देने में आर्थिक तंगी कहां से आ गई?’

फोर्थ एवेन्यू में रहने वाले कृष्ण मोहन अग्रवाल कहते हैं कि इन गार्ड्स का एपांइटमेंट एंट्री सुपरवाइजर के रुप में हुआ है जिससे साफ होता है कि या तो ये गार्ड्स सिक्योरिटी गार्ड्स की योग्यता को पूर्ण नहीं करते हैं या IP Estates के पास सिक्योरिटी सर्विस देने का लाइसेंस नहीं है। इस समय निवासियों की सिक्योरिटी ताक पर है।

फर्स्ट एवेन्यू के एओए सदस्य अनूप सोनी कहते हैं कि गौर ग्रुप कंपनी ने अपना शातिर दिमाग़ लगा के सभी गार्ड्ज़ से त्याग पत्र ले लिया है और उन्हें बाध्य कर रही है कम वेतन, ESIC और पीएफ़ के बिना काम के लिए। लेबर लॉ का हनन प्रमोटर खुलेआम कर रहा हैं।

गार्ड्स का प्रदर्शन, रेज़िडेंट्स की एकजुटता

हालांकि सिक्युरिटी गार्ड्स को लॉकडाउन से पहले से ही किश्तों में निकाला जा रहा था। दर्जनों गार्ड्स को तो इसी तरह बिना नोटिस पीरियड दिए अचानक छुट्टी कर दी गई।

मुकेश पाल का दावा है कि, “आईपी स्टेट प्राइवेट लिमिटेड गौर सोसायटी का मेंटेनेेंस देखती है और इसी की सिस्टर कंपनी है लेकिन इसके पास गार्ड्स एजेंसी का कोई लाइसेंस नहीं हैं। इसलिए वो सारे गार्ड्स को हटाने में तुले हुए हैं ऐसा लगता है।”

जब देश में लॉकडाउन शुरू हुआ तो कंपनी ने एकमुश्त सारे गार्ड्स को निकालने का फैसला लिया और 18 जुलाई को गार्ड्स को बताया गया कि 20 जुलाई से वो काम पर न आएं। कुछ परेशान गार्ड्स ने सोसाइटी के निवासियों को ये बात बताई।

मुकेश कहते हैं, “मैंने उन लोगों से 20 जुलाई को सुबह पूरे यूनिफार्म में गौर सिटी के फ़र्स्ट एवेन्यू में इकट्ठा होने की सलाह दी लेकिन इस हिदायत के साथ कि ये प्रदर्शन की तरह होना चाहिए लेकिन शांतिपूर्ण। आख़िर 20 जुलाई को सारे गार्ड्स गेट पर मौजूद होते हैं। पुलिस आती है और शांति बनाए रखने की हिदायत देकर चली जाती है।”

गार्ड्स की एकता और उनके साथ रेज़िडेंट्स की एकजुटता को देखते हुए पुलिस चुप रही और हालात भांपते हुए कंपनी ने इन सारे गार्ड्स को बहाल कर दिया।

मुकेश बताते हैं कि बात यहीं ख़त्म नहीं हुई। गार्ड्स ने बताया कि दूसरे दिन उन्हें एक महीने का नोटिस दिया गया और 20 अगस्त के बाद नौकरी ख़त्म करने की बात कही गई। इस बीच पता चला है कि सारे गार्ड्स से सादे काग़ज़ पर इस्तीफ़ा ले लिया गया है।

फिफ्थ एवेन्यू निवासी शिवेन्दू शेखर कहते हैं कि आर्थिक मंदी की मार झेल रहे देश में जहां पूंजीपतियों को आगे बढ़ कर नौकरीपेशा लोगों की मदद करनी चाहिए, वहां उनका नाजायज़ फ़ायदा उठाया जा रहा है और मंदी के नाम पर और शोषण किया जा रहा है।

जब जीडीपी 10% से गिर कर 1.5% पर आ जाए तो करोड़ों लोग अचानक गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। मंदी की मार कमजोरों को बहुत जोर की लगती है। इस स्थिति में हमें अपनी जिम्मेदारी समझ कर हर वो कोशिश करनी चाहिए कि गार्ड और इनके जैसे और मेहनती भाई बहन अपनी जीविका चला सकें।

शिवेंदू कहते हैं कि मध्यम वर्ग को खास कर अपनी भूमिका इस सन्दर्भ में समझनी चाहिए और इन पूंजीपतियों के खिलाफ आगे आकर ऐसे मेहनती भाई बहनों का साथ देना चाहिए। आज इनकी कल आपकी बारी भी हो सकती है। आज आप इनकी मदद करेंगे, कल ये आपकी। और, बड़े हर्ष की बात है कि गौर सिटी के निवासी ऐसा ही कर के समाज के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण दे रहे हैं।

बंधुआ मज़दूरी की ओर ले जाते हालात

इस पूरे मसले पर मुकेश पाल ने ग्रेटर नोएडा जिलाधिकारी को पत्र भी लिखा पर अभी तक इसका कोई ज़वाब नहीं आया है।

काम के कठिन हालात और मामूली वेतन पूरे देश में गार्ड्स की नौकरी की एक कड़वी सच्चाई है, लेकिन मौजूदा छंटनी और नौकरियों का जाना उन्हें और बुरी स्थिति में धकेल देगा।

मुकेश पाल दुख जताते हैं, “गार्ड की नौकरी करने वाले मज़दूर अलग- अलग राज्य के रहने वाले हैं। अपने परिवार के साथ किराए का कमरा लेकर रहते हैं। 10-12 हज़ार वेतन मिलता है। 3 हज़ार कमरे के किराए में निकल जाता है। 7-8 हज़ार रुपये में बड़ा मुश्किल से गुज़ारा होता है।”

फोर्थ एवेन्यू में रहने वाले सीनियर सिटीजन विद्याधर पांडेय कहते हैं कि सुरक्षा गार्डों के साथ हो रहे अन्याय तमाम लोगों से सुना। मीडिया कैंपेन में हिस्सा भी लिया। जनाक्रोश और पुलिस हस्तक्षेप से छंटनी रुक गई। लेकिन चर्चा है कि इन सुरक्षा गार्डो से त्यागपत्र ले लिया गया है।

वो आगे कहते हैं कि जिन लोगों ने नौकरी से निकाले जाने का विरोध किया है वे सुरक्षा गार्ड की नौकरी से त्यागपत्र क्यों देंगे? इनके पास आजीविका के अन्य साधन नही हैं। समस्या की जड़ है प्रशासन व मुख्यत: श्रम विभाग की अकर्मण्यता। लोग मिली भगत कहते हैं इसे।

विद्याधर का कहना है कि किसी कर्मचारी को निकालें नहीं और इस बात को प्रशासन श्रम विभाग व पुलिस तंत्र लागू कराए तो समस्या हल हो।

सिक्युरिटी गार्डों का काम के घंटे इतने असीमित हैं और अनियमित हैं कि आम तौर पर महीने में एक एक गार्ड को तीन से चार बार लगातार 36-36 घंटे ड्यूटी करनी पड़ती है तब ओवरटाइम के साथ उन्हें 10-12 हज़ार रुपये मिल पाते हैं।

मुकेश पाल कहते हैं कि ‘अगर इतनी मेहनत के बाद इतनी सैलरी भी कंपनियों को भारी लगती है तब तो भविष्य में बंधुआ मज़दूरी ही हकीक़त बन जाएगी।’

जिस बात को मुकेश पाल महसूस कर पा रहे हैं, पूरे देश में ताबड़तोड़ छंटनी को देखते हुए वो दिन बहुत दूर नहीं दिखाई देता।

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