श्रम संहिताएँ: आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा श्रम सुधार या नई गुलामी की नींव?

श्रम संहिताएँ: आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा श्रम सुधार या नई गुलामी की नींव?

By नदीम अंसारी

चार लेबर कोड्स—जो क्रमशः मज़दूरी पर श्रम संहिता, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यस्थितियों पर श्रम संहिता, औद्योगिक संबंधों पर श्रम संहिता और सामाजिक सुरक्षा पर श्रम संहिता के नाम से जानी गईं हैं, सरकार अब इन्हें 1 अप्रैल 2026 से पूरी तरह से लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

भारतीय मज़दूर संघ (बीएमएस) को छोड़कर लगभग सभी ट्रेड यूनियनें इन कोड्स का विरोध कर रही हैं और 12 फरवरी को इन्हें लागू न करने की मांग के साथ आम हड़ताल का आयोजन किया था। इस हड़ताल में पूरे देश भर में मज़दूर और किसान व्यापक पैमाने पर सड़कों पर उतरकर अपना विरोध दर्ज कराया।

वहीं बीएमएस ने चारों कोड्स का स्वागत किया है और इन्हें स्वतंत्रता के बाद का सबसे बड़ा श्रम सुधार बताया है।

बीएमएस के अतिरिक्त सभी ट्रेड यूनियनें कह रही हैं कि ये श्रम संहिताएँ मज़दूरों के उन सभी अधिकारों को समाप्त कर देंगी, जो उन्होंने भारत के औपनिवेशिक शासन से और आज़ाद भारत की सरकारों से लड़कर हासिल किए थे।

Labour code
Itava, Uttar Pradesh, 12 फ़रवरी 2026 को पूरे देश में आम हड़ताल का आयोजन किया गया था और लेबर कोड्स को रद्द करने की मांग की गई थी।

कैसे हुई थी इन संहिताओं की शुरुआत?

इन संहिताओं को लाने की शुरुआत वर्ष 1999 में ही भाजपा सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दूसरे श्रम आयोग के गठन के साथ कर दी थी।

15 अक्टूबर 1999 को रवींद्र वर्मा की अध्यक्षता में गठित उस श्रम आयोग ने 29 जून 2002 को श्री अटल बिहारी वाजपेयी को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें सिफारिश की गई थी कि मौजूदा 44 केंद्रीय श्रम कानूनों के प्रावधानों को सरलीकृत, सम्मिलित और युक्तिसंगत बनाते हुए कार्यात्मक आधार पर उन्हें चार या पाँच श्रम संहिताओं में वर्गीकृत किया जाए।

Labour code
Dahod, Gujarat

न्यायालय की भूमिका: 1997 का वह ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस बताते हैं कि दूसरे श्रम आयोग के गठन से भी दो साल पहले, सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बेंच ने 1997 में ही अपने फैसले से इन संहिताओं के निर्माण के रास्ते को सुगम बना दिया था।

एयर इंडिया स्टैच्यूटरी कॉर्पोरेशन बनाम यूनाइटेड लेबर यूनियन (1996) के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया था कि जब अनुबंध श्रम (विनियमन और उन्मूलन) अधिनियम, 1970 की धारा 10 के तहत संविदा श्रम को प्रतिबंधित किया जाता है, तो श्रमिकों को मुख्य नियोक्ता द्वारा स्वतः ही नियमित कर्मचारी के रूप में अवशोषित किया जाना चाहिए।

इस ऐतिहासिक निर्णय ने सामाजिक-आर्थिक न्याय के आधार पर संविदा श्रमिकों के शोषण को समाप्त करने और उन्हें वैधानिक निगमों में नौकरी की सुरक्षा देने की पुष्टि की थी।

लेकिन उसी वाद में सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बेंच ने संविदा श्रमिकों के शोषण को समाप्त करने और उन्हें वैधानिक निगमों में नौकरी की सुरक्षा देने के निर्णय को पलट दिया।

कोर्ट ने कहा कि 1976 की अधिसूचना के बाद सरकारी संस्थाओं में ठेका श्रम पर प्रतिबंध के बावजूद, यदि ठेकेदारों के माध्यम से सफाई और सुरक्षा का काम करवाया जा रहा है, तो ठेका श्रमिकों को सीधे मालिक के तहत कर्मचारी नहीं माना जाएगा।

इस तरह से उस समय सुप्रीम कोर्ट ने ही स्थायी प्रकृति के काम को भी ठेका प्रथा से कराने की प्रवृत्ति को जारी रखने पर मुहर लगा दी थी।

Labour code
Murena Madhya Pradesh

हालिया फैसला: घरेलू कामगारों के साथ अन्याय

इसी तरह के एक हालिया निर्णय में, 29 जनवरी 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मज़दूरी की मांग वाली जनहित याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया कि ऐसा करने पर लोग घरेलू सहायकों को काम पर रखना बंद कर सकते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि न्यूनतम वेतन तय करने पर हर घर मुकदमेबाजी में उलझ जाएगा और इससे नौकरी के अवसर कम हो सकते हैं।

न्यूनतम मज़दूरी का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है जो संविधान के अनुच्छेद 23 के विस्तृत अर्थ से उत्पन्न होता है।

इसे सर्वोच्च न्यायालय ने ही 1982 के ऐतिहासिक पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ के मामले में स्पष्ट किया है। उत्पीड़ित घरेलू सहायिकाओं के पक्ष में नकारात्मक परिणामों की आशंका से प्रेरित होकर निर्णय देना, आज की बढ़ती महंगाई में उनकी आर्थिक दशा को और अधिक बदतर बना देगा।

गौरतलब है कि घरेलू सहायिकाओं को रखने वाले अधिकतर लोग अच्छी आमदनी वाले होते हैं और बिना सहायिका के उनका काम नहीं चल सकता।

सहायिका रखना उनके लिए एक बाध्यता होती है। न्यूनतम वेतन तय होने से धन का प्रवाह उच्च वर्ग से निचले वर्ग की ओर होता, जिससे आर्थिक समरसता आती और ये सहायिकाएँ भी अपने काम के प्रति अधिक जवाबदेह बनतीं।

Labour code
Telangana

न्याय का झुका हुआ तराजू

दोनों ही तरह के मामलों में सुप्रीम कोर्ट का न्याय तराजू मालिकों की तरफ झुका हुआ दिखता है और कर्मियों को उनके हाल पर छोड़ देता है। चारों श्रम संहिताओं में भी मालिकों की तरफ झुके न्याय के तराजू को अत्यधिक विस्तारित किया गया है।

इन संहिताओं के माध्यम से छंटनी को आसान बनाया गया है, हड़ताल के अधिकार को सीमित किया गया है और ठेका मज़दूरी को बढ़ावा दिया जा रहा है।

इनके माध्यम से 300 से कम मज़दूरों वाले कारखाने के मज़दूरों के लिए न्यायालय के दरवाजे बंद किए जा रहे हैं और ऐसी व्यवस्था की जा रही है कि न्याय मांगने के लिए उन्हें अपने साथ अन्याय करने वाले मालिकों के पास ही जाना होगा।

इस प्रकार से ये संहिताएँ देश के भीतर एक नई गुलामी प्रथा की शुरुआत करने जा रही हैं, जिसमें मालिक को यह अधिकार होगा कि वह जितने घंटे चाहे मज़दूरों से काम कराए, जितना चाहे उतना कम मज़दूरी दे और जब चाहे तब मज़दूरों को काम से हटा दे।

Labour code

रास्ता क्या हो सकता है?

ऐसे में जब न्यायालय पहले से ही संहिताओं को लागू कराने की भूमिका निभा रहा है, तो न्यायालय से कोई उम्मीद करना मज़दूर संगठनों के लिए आत्म-धोखा होगा। न्यायपालिका के रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि वह मज़दूरों के अधिकारों की संरक्षक की बजाय नियोक्ताओं के हितों की संरक्षक बनकर उभरी है।

इसलिए, यदि मज़दूरों को अपने लिए आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना है, तो उन्हें उसी रास्ते पर बढ़ना होगा जिसपर चलकर उन्होंने तमाम अधिकारों को हासिल किया था, यानी आंदोलनों का रास्ता।

मज़दूरों को न्यायालय पर भरोसा करने के बजाय भगत सिंह, महात्मा गांधी और अंबेडकर की शिक्षाओं पर भरोसा करते हुए अनिश्चितकालीन हड़ताल जैसे संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ना होगा, केवल तभी वे खुद को और अपनी आने वाली पीढ़ियों को गुलामी की जिंदगी से बचा पाएँगे।

https://i0.wp.com/www.workersunity.com/wp-content/uploads/2023/04/Line.jpg?resize=735%2C5&ssl=1

https://i0.wp.com/www.workersunity.com/wp-content/uploads/2023/04/Line.jpg?resize=735%2C5&ssl=1

(वर्कर्स यूनिटी स्वतंत्र निष्पक्ष मीडिया के उसूलों को मानता है। आप इसके फ़ेसबुकट्विटरऔर यूट्यूबको फॉलो कर इसे और मजबूत बना सकते हैं। वर्कर्स यूनिटी के टेलीग्राम चैनल को सब्सक्राइब करने के लिए यहांक्लिक करें

Workers Unity Team

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.