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क्या योगी सरकार कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय बंद कर रही है?

दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों की बच्चियों को मुफ़्त शिक्षा देने के लिए बनाए गए हैं ये आवासीय विद्यालय

दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के लिए बने कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों में बीते मार्च से पढ़ाई बंद होने की वजह से यूपी की योगी सरकार ने स्थानीय सरकारी स्कूलों में बालिकाओं का अस्थाई एडमिशन कराने का आदेश जारी किया है।

अपने 20 अगस्त के आदेश में राज्य परियोजना निदेशक विजय किरन आनंद की ओर से जारी निर्देश में कहा गया है कि ‘कोविड-19 की वजह से विद्यालय बंद है और इसलिए छात्राएं नहीं आ पा रही हैं। इसलिए इन छात्राओं का स्थानीय विद्यालयों में टेंपरेरी एडमिशन कराया जाए।’

इस आदेश के बाद ही कई जन संगठनों ने आवासी बालिका विद्यालयों को बंद करने की आशंका जताई और इसे लेकर प्रदेश भर के क़रीब साढ़े सात सौ इन आवासीय विद्यालयों के शिक्षक और स्टाफ़ नौकरी जाने की आशंका से डरे हुए हैं।

हालांकि कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों के कर्मचारी यूनियन की प्रतिनिधि भाग्यवती ने बंद किए जाने की आशंकाओं को निराधार बताया लेकिन छंटनी के ख़तरे से इनकार भी नहीं किया।

इन आवासीय विद्यालयों की शुुरुआत साल 2004 में दलित, पिछड़े और आदिवासी बालिकाओं को मुफ़्त शिक्षा मुहैया कराने के उद्देश्य से किया गया था।

इसमें सिर्फ लड़कियों को रखा जाता था और खाना, कपड़ा, किताबें, रहने की व्यवस्था सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं की ओर से जाती है। इसकी देखरेख मुख्यतः राज्य सरकार के जिम्मे है।

छंटनी की आशंका से शिक्षक भयभीत

भाग्यवती अमरोहा में कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की वार्डन  भी हैं। वो कहती हैं, “सरकार सीधे तौर पर स्कूलों को बंद नहीं कर रही है। लेकिन ऐसा पता चला है कि 75 फ़ीसदी शिक्षकों को निकालने की तैयारी कर रही है।”

उन्होंने बताया, “15-20 सालों से काम कर रहे शिक्षकों को सरकार फुल टाइम ड्यूटी करने के लिए दबाव डाल रही है। यदि कोई शिक्षक फुल टाइम काम करता है तो उसे स्कूल में ही रूकना पड़ेगा। पर लड़कियों के स्कूल में पुरूषों को रहने की मनाही है तो सरकार ने इन्हें निकालने का फैसला लिया है।”

उनके अनुसार, “जो शिक्षक पहले से ही फुलटाइम पढ़ा रहे हैं उन्हें  सरकार ने चार विषय पढ़ाने का आदेश दिया जिसमें हिंदी, इंग्लिश, गणित, विज्ञान शामिल है। पर हर शिक्षक की अपनी क्षमता है। सरकार ने इन्हें भी निकालने का फैसला किया है।”

भाग्यवती ने का कहना है कि, “इसी तरह सभी शिक्षकों में कोई न कोई खामी निकाल कर उन्हें बर्खास्त करने के फ़िराक में सरकार लगी है।”

हालांकि इन विद्यालयों में कांट्रैक्ट पर काम कर रहे शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों से पता चला है कि 31 अगस्त तक अधिकांश शिक्षकों और कर्मचारियों का कांट्रैक्ट रिन्यू कर दिया गया है और कुछ शिक्षकों के ट्रांसफ़र भी किए गए हैं। हालांकि इसकी अभी आधारिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है।

यूपी के मिर्जापुर, सोनभद्र, चंदौली जैसे पिछड़े जिलों में दलित, अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के लिए ये आवासीय  विद्यालय लड़कियों की शिक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

लेकिन सरकार के ताज़ा आदेश से पैदा हुए असमंजस में कई संगठनों ने इस कदम का विरोध किया है।

राशन के पैसे ट्रांसफ़र किए जाने की कवायद

ऑल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफ) ने बयान जारी कर कहा है कि, “ऑनलाइन पढ़ाई के लिए इन स्कूलों को बंद करके परिषदीय विद्यालयों में दाखिल कराने का सरकारी तर्क दोषपूर्ण है और ईमानदार नहीं है।”

संगठन से जुड़़े जितेन्द्र धांगर का कहना है कि, “ऑनलाईन शिक्षा कि व्यवस्था सरकार इन्हीं स्कूलों में कर सकती थी, लेकिन सुविधा उपलब्ध कराने की बजाए सरकार स्कूलों को फिलहाल बंद कर रही है।”

उन्होंने आगे कहा, “प्रदेश की आरएसएस-बीजेपी की सरकार अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े वर्ग के बच्चे बच्चियों को शिक्षा से दूर रखना चाहती है।”

हालांकि आदेश में ये साफ़ कहा गया है कि ये व्यवस्था अंतरिम है और टेंपरेरी एडमिशन इसलिए कराए जा रहे हैं कि इन बालिकाओं की शिक्षा प्रभावित न हो।

विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि कोविड-19 के कारण बंद इन विद्यालयों की मरम्मत के लिए सरकार ने फंड जारी किए हैं ताकि इसी बीच ये काम कराया जा सके।

इसके अनुसार, स्थानीय प्राइमरी विद्यालयों में टेंपरेरी एडमिशन इसलिए कराए जा रहे हैं ताकि इन बच्चियों को मिड डे मील के रूप में राशन मिल सके।

इऩ आवासीय विद्यालयों में एक बच्ची के प्रतिदिन के खुराक पर क़रीब 60 रुपये खर्च किए जाते हैं और पिछले पांच महीने से बंद होने की वजह से इस मद में आए फंड का इस्तेमाल नहीं हो पाया है। इन बच्चों के खातों में ये पैसा जमा किए जाने की कवायद की जा रही है।

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