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1928 में ताबड़तोड़ हड़तालों से 35 लाख कार्य दिवसों का नुकसान हुआ : इतिहास के झरोखे से-12

कुल कार्य दिवस नुकसान का अकेले 60 प्रतिशत अकेले रेलवे की हड़तालों से हुआ

By सुकोमल सेन

सन् 1927 के प्रारंभ में शुरू हुआ मजदूर वर्ग का देशव्यापी संघर्ष, पूर्ण अवेग और प्रचंडता के साथ वर्ष 1928-29 में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा।

इससे पहले भारतीय मजदूर वर्ग के इतिहास में ऐसे अभूतपूर्व संघर्ष की कोई मिसाल नहीं मिलती।

सन् 1927 में होने वाली हड़तालों की संख्या और शामिल होने वाले मजदूरों की संख्या तो पहले की तुलना में कम थी लेकिन हड़तालों के दौरान नुकसान होने वाले कार्यदिवसों की संख्या दूनी थी।

इससे सन् 1929 में हुई हड़तालों का दीर्घकालीन चरित्र, मजदूर वर्ग की आपसी एकता और दृढ़ता को समझा जा सकता है।

सन् 1927 की हड़तालों का विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि मुंबई प्रांत में 54 हड़तालें हुई और बंगाल में कुल 34 हड़तालें हुईं। लेकिन इन दोनों प्रांतों के मजदूर विवादों में भिन्न विशेषताएं दिखती हैं।

मुंबई में कुल 1,28,078 मजदूरों ने इन हड़तालों में भागीदारी की लेकिन बंगाल में इसके आधे मजदूरों ने हड़तालों में भागीदारी की लेकिन मुंबई की तुलना में बंगाल में तीन गुना कार्यदिवसों की हानि हुई।

मुबंई में 1,65,061 कार्यदिवसों की हानि हुई जबकि बंगाल में इससे बहुत ज्यादा 4,64,889 कार्यदिवसों की हानि हुई।

1928 में 111 हड़तालें

मद्रास में भी 19 हड़तालों में 17,905 मजदूर शामिल हुए और 1,87,441 कार्यदिवसों की हानि हुई।

हड़तालों का उद्योग आधारित विश्लेशण बताता है कि सूती कपड़ा उद्योग में 46.51 प्रतिशत हड़तालों में सर्वाधिक मजदूर शामलि हुए।

हड़तालों के दौरान हानि हुए कार्यदिवसों में 61.9 प्रतिशत केवल रेल हड़तालों में थे। केवल खड़गपुर वर्कशाप (बंगाल) और नागपुर रेलवे वर्कशाप की दीर्घकालीन हड़तालों में 8,80,218  कार्यदिवसों की हानि हुई।

सन् 1928-29 के दौरान हड़तालों की संख्या इतनी अधिक थी कि वर्ष 1928 में ही 3.5 मिलियन (35 लाख) कार्यदिवसों की हानि हुई।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस वर्ष मुंबई में 111 हड़तालें हुईं, जो कुल हड़तालों की 60 प्रतिशत थीं।

बंगाल में 60, बिहार और उड़ीसा में 8, मद्रास में 7 और पंजाब में 2 हड़तालें हुईं। देश भर में हुई इन कुल हड़तालों में 110 सूती कपड़ा उद्योग में, जूट उद्योग में 19, इजीनियरिंग में 9 और रेलवे/रेलवे वर्कशाप और कोयला खदानों में एक-एक हड़ताल हुई।

हड़तालों की यह संख्या पिछले पांच वर्षों की कुल हड़तालों से भी अधिक थी।

(भारत का मज़दूर वर्ग, उद्भव और विकास (1830-2010) किताब का अंश। ग्रंथ शिल्पी से प्रकाशित)

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