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शिक्षा को पूरी तरह बर्बाद करने का मजमून है नई शिक्षा नीतिः शिक्षा का सर्वनाश-1

अगले 15 सालों में शिक्षा को पूरी तरह निजी कंपनियों के हाथों में देने की कवायद- नज़रिया

By एस. राज

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP) को 29 जुलाई 2020 को भाजपा सरकार की केंद्रीय कैबिनेट द्वारा मंजूरी दे दी गई।

इंदिरा गांधी सरकार द्वारा पारित पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 और राजिव गांधी सरकार की द्वितीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986, जिसने शिक्षा के क्षेत्र में निजी पूंजी के लिए दरवाजे खोले।

और जिसमें नवउदारवादी अजेंडा के तहत किए गए 1992 के सुधार के बाद शिक्षा का और अधिक बाजारीकरण हुआ, के बाद 2020 की यह नीति देश की तीसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति है जो 1986 की नीति की जगह लेगी।

जाहिर है,NEP को मेनस्ट्रीम मीडिया और भाजपा के आईटी सेल द्वारा खूब सराहा गया। यहां तक कि प्रधानमंत्री ने NEP को ‘नए भारत’ की नींव रखने वाली नीति कहा।


  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, जो केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है, को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

लेकिन NEP, उसके प्रभावों और इसे पारित करने के पीछे सरकार की मंशा का ठोस मूल्यांकन करने के लिए हमें उसके भव्य शब्दों और जटिल वाक्यांशों के पार जाकर बारीक निरक्षण के साथ गूढ़ार्थ को ढूंढना जरूरी है।

शिक्षा, जो कि संविधान के समवर्ती सूची का हिस्सा है यानी जो केंद्र और राज्य दोनों के अधिकार-क्षेत्र में आता है, पर एक राष्ट्रव्यापी नीति को जिस तरह से, देश के संघीय ढांचे पर चोट करते हुए, संसद से बचा कर कैबिनेट द्वारा पारित कराया गया, वह तो केवल इसे पारित करने के गैर-जनतांत्रिक तरीके को दर्शाता है।

NEP के जरिए इस फासीवादी सरकार का असली मकसद शिक्षा का निजीकरण-बाजारीकरण, अनौपचारिकरण, भगवाकरण और अति-केंद्रीकरण कर उसे पूरी तरह बर्बाद करना है।

https://www.youtube.com/watch?v=giegSHcfzko&t=9s

अति-केंद्रीकरण और शिक्षा पर कब्जा

NEP में सबसे बड़े बदलावों में से एक है हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (HECI) की स्थापना जो UGC/यूजीसी, AICTE/एआईसीटीई, NAAC/नैक व अन्य संबंधित संस्थानों की जगह लेगा, मेडिकल और लॉ की शिक्षा के क्षेत्र के अपवाद के साथ।

HECI का संचालन केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त 12 सदस्यीय समिति करेगी जिसमें से केवल 2 ही शिक्षाविद होंगे।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लगभग सारी भूमिका इस नई संस्था के ही भिन्न अंगों द्वारा निभाई जाएगी, जैसे ग्रांट/फंड देने के लिए हायर एजुकेशन ग्रांट्स काउंसिल, विनियम के लिए नेशनल हायर एजुकेशन रेगुलेटरी काउंसिल, अक्रेडिटेशन के लिए नेशनल अक्रेडिटेशन काउंसिल और परिणाम मापदंड तैयार करने के लिए जनरल एजुकेशन काउंसिल।

अतः केंद्र सरकार के सीधे नियंत्रण में रहने वाली HECI देश में उच्च शिक्षा को नियंत्रित करने वाली एकमात्र सर्वशक्तिशाली संस्था बन जाएगी। (अनुच्छेद 18,NEP 2020)

NEP के तहत सभी शिक्षण संस्थानों में बोर्ड ऑफ गवर्नर (गवर्नर मंडल) का गठन किया जाएगा।

यह सरकार की एक दीर्घकालिक योजना है जिसके तहत 2035 तक सभी शिक्षण संस्थानों में एक ‘स्वतंत्र’ गवर्नर मंडल की स्थापना होगी जिसके पास उस संस्थान को बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के चलाने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी।

https://www.youtube.com/watch?v=5dwFp4oyDMI&t=132s

गवर्नर मंडल

यह तो एक बात है कि अब तक मुख्यतः कॉर्पोरेट जगत में इस्तेमाल किए जाने वाले ‘बोर्ड ऑफ गवर्नर’, जो सर्वप्रथम मुनाफे को केंद्र में रख कर कंपनियों को चलाते हैं, को अब शिक्षा के क्षेत्र में उतारने के पीछे सरकार की क्या मंशा हो सकती है।

इसके अलावा इन गवर्नर मंडलों के पास इस हद तक ताहत रहेगी कि इनकी अथॉरिटी को लागू करने के लिए मौजूदा कानूनों के किसी भी उल्लंघनकारी प्रावधानों को पलटने की ताकत रखने वाले नए व्यापक कानून बनाए जाएंगे।

जिस तरह है मोदी सरकार सुनियोजित ढंग से जनतंत्र के सभी संस्थानों में अपने लोगों को बैठा कर भीतर से उनका टेकओवर करती जा रही है, इन शक्तिशाली गवर्नर मंडलों में भी किस तरह के लोग बैठाए जाएंगे यह हमारे सामने स्पष्ट है। (अनुच्छेद 19)

इसके साथ पूरे देश में रिसर्च (अनुसंधान) को फंडिंग और ‘बढ़ावा’ देने के लिए एक नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एनआरएफ) का गठन किया जाएगा। इसे भी केंद्र सरकार द्वारा चयनित अपने गवर्नर मंडल द्वारा संचालित किया जाएगा।

इसका गठन यही सुनिश्चित करेगा कि केवल उन्हीं ‘अनुसंधानों’ को फंडिंग और यहां तक कि अनुमति मिले जिसे केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित एनआरएफ ने हरी झंडी दी हो।

बौद्धिक विकास और क्रिटिकल थिंकिंग से घृणा और विकर्षण महसूस करने वाली फासीवादी ताकतों की कमान में पूरी देश में अनुसंधान को नियंत्रित करने की ताकत होने से शिक्षा और अनुसंधान का क्या हश्र होगा ये सोचा ही जा सकता है। (अनुच्छेद 17) (क्रमशः)

(पत्रिका यथार्थ से साभार)

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