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रेल बिकने की कतार में है, लेकिन यूनियन नेता शायद पहले ही बिक चुके हैं- नज़रिया

नेताओं के मिजाज से लगता है कि रेल के ख़रीदारों को गिफ्ट में सजावटी ट्रेड यूनियनें भी मिलेंगी

By आशीष आनंद

भारतीय रेल नीलामी की कतार में खड़ी हो गई है और इस उपक्रम की कथित सबसे बड़ी यूनियनों के नेताओं को अभी भी सरकार पर इस कदर भरोसा है कि वे गलतबयानी से बाज नहीं आ रहे।

जिंदगी भर रेल के सहारे ऐश का सामान जुटाते रहे नेता अभी भी जब तब रेलवे बोर्ड, रेलमंत्री या सरकार के कोरे आश्वासनों के आधार पर दिलासा दे रहे हैं।

यूनियन नेताओं की ‘सरकार से नजदीकियों’ ने ये नौबत ला दी है कि आज किसी भी रेल यूनियन में निजीकरण के ख़िलाफ़ एक जगह पांच-दस हजार लोगों को जमा करने का बूता नहीं बचा है, जबकि आज भी इस उपक्रम में करीब 13 लाख कर्मचारी कार्यरत हैं।

यूनियन के नाम पर सरकार का सजावटी सामान बन चुके इन रेल कर्मचारी संगठनों पर श्रमिकों का भी भरोसा नहीं बचा। नेताओं का नज़रिया देख वे खुद ही खोल में सिमट गए हैं और दबी ज़बान में उनका कहना है, ‘जो होगा, वह होकर रहेगा, हम कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि नेता बिक चुके हैं, रेल बिक रही है।’

हद तो ये है कि इस नाजुक वक्त में भी यूनियन नेता मान्यता का जायका चखने या बरकरार रखने को लालायित दिख रहे हैं। जबकि वे रेलकर्मियों के दशकों पुराने संघर्षों से हासिल अधिकारों को बचाने में पूरी तरह नाकाम हैं।

कभी रेलकर्मियों ने रखी श्रमिक संघर्ष की बुनियाद

भारत में रेलकर्मियों ने आधुनिक श्रमिक संघर्ष की न सिर्फ बुनियाद रखी, बल्कि अपनी सूझबूझ से पूरे मज़दूर वर्ग को कायल भी किया।

पूरी दुनिया मई दिवस आठ घंटे काम की मांग के लिए 1886 में शिकागो में हुए मजदूर आंदोलन के रूप में याद करती है।

इस तथ्य से बहुत कम लोग वाकिफ हैं कि शिकागो के आंदोलन के काफी पहले भारतीय रेलवे के कर्मचारियों ने अप्रैल और मई 1862 में इसी मुद्दे पर पहली बार हड़ताल की थी।

इसी प्रभाव में उसी साल बैलगाड़ी चालक ऐतिहासिक हड़ताल पर चले गए, जिसके बाद कई मज़दूर आंदोलनों ने ताकत दिखाई।

साल 1906 में ईस्ट इंडिया रेलवे की मालगाड़ियों के गार्ड्स ने जीत हासिल की।

18 नवंबर 1907 को भारतीय मजदूर आंदोलन के उद्घोष में एक ऐतिहासिक दिन था, जब बंगाल के आसनसोल में रेलकर्मियों ने अपने 43 प्वाइंट चार्टर के समर्थन में संघर्ष छेड़ दिया।

यह हड़ताल पूरे देश में तेजी से फैल गई थी और कोई भी ट्रेन कई दिन तक कलकत्ता नहीं पहुंच सकी।

कलकत्ता बंदरगाह पर सन्नाटा पसर गया क्योंकि पोर्ट के कर्मचारियों ने भी हड़ताली रेलकर्मियों के समर्थन में एकजुटता दिखाकर काम रोक दिया।

11 फरवरी 1927 को बंगाल में खडग़पुर डिवीजन में रेलकर्मियों ने बड़े पैमाने पर हड़ताल की। इसी असर में हावड़ा ज़िले के लिलुआ के रेलकर्मियों ने 28 मार्च 1928 से काम बंद कर दिया जिसके बाद उनकी मांगों को पूरा किया गया।

पहली बार संभवत: 1927 से भारत में मजदूरों के संघर्ष के उद्घोष के रूप में मई दिवस समारोह मजदूरों के अधिकारों का दावा करने का हिस्सा बना। संघर्षों का ये क्रम जारी रहा।

सरकार ने बनाई अपनी यूनियन

ऑल इंडिया रेलमेंस फ़ेडरेशन (एआईआरएफ) 1925 में भारतीय रेलवे में स्थापित पहला संघ बना, जो सोशलिस्ट ट्रेड यूनियन सेंटर हिंद मज़दूर सभा से संबद्ध है।

1940 के उत्तरार्द्ध तक, एआईआरएफ़ में समाजवादी और कम्युनिस्टों का प्रभाव था। 1947 और 1953 के बीच संघ के अध्यक्ष समाजवादी विचारक जयप्रकाश नारायण थे, जबकि पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ज्योति बसु उपाध्यक्ष थे, जो बाद में मुख्यमंत्री भी बने।

इस बात से चिंतित होकर सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी ने 1948 में अपनी विंग इंडियन नेशनल रेलवे वर्कर्स फ़ेडरेशन (आईएनआरडब्ल्यूएफ़) बनाई।

मार्च 1949 में एआईआरएफ़ ने हड़ताल की तैयारी की, लेकिन सरकार से समझौते के बाद नोटिस वापस लेने वाली थी कि एआईआरएफ़ में मौजूद कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े नेताओं ने आंदोलन का बिगुल फूंक दिया।

नेहरू ने आंदोलन तोड़ने के लिए उतार दी सेना

आंदोलन तोड़ने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सैन्य बलों को उतार दिया, 7,000 श्रमिकों को गिरफ्तार करने के साथ ही 2,000 श्रमिकों को बर्खास्त कर दिया गया।

इस घटना के बाद एआईआरएफ़ से कम्युनिस्ट यूनियनों और कम्युनिस्ट विचार रखने वालों को निकाल दिया गया।

1953 में एआईआरएफ़ ने राष्ट्रीय संघ बनाने के लिए आईएनआरडब्ल्यूएफ़ के साथ एकता करके नेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन रेलवेमेन (एनएफ़आईआर) बनाया, लेकिन यह एकता कुछ ही समय तक टिकी और दो साल बाद 1955 में एआईआरएफ़ फिर ‘स्वतंत्र’ होकर काम करने लगी।

74 की हड़ताल के बाद बदल गया रुख़

मई 1974 में एआईआरएफ़ के अध्यक्ष जॉर्ज फर्नांडीज ने देशभर में रेलवे हड़ताल का नेतृत्व किया, जिसका भारत सरकार ने दमन करने में कोई कसर नहीं रखी।

इस हड़ताल ने देश के पूरे राजनीतिक ताने-बाने को हिलाकर रख दिया और पूरे देश में आंदोलनों के एक नए ज्वार शुरु हो गए।

इसके बावजूद एआईआरएफ़ और एनएफ़आईआर को, बिना चुनाव लगातार मान्य होने का ‘लाभ’ मिलता रहा।

आंदोलन के नाम पर खानापूरी होने लगी और श्रमिक अधिकारों में कटौती चालू हो गई। धीरे-धीरे करके ठेकाकरण की प्रक्रिया भी चलने लगी।

यूनियनों में मजदूरों को लाभ के नाम पर हिकारत से कुछ टुकड़े मिलने को कीर्तिमान बताया जाने लगा।

भाजपा की ढाल बना ट्रेड यूनियन

आज सरकार के पास मान्यताप्राप्त फ़ेडरेशनों का सहयोग ही नहीं, केंद्र की मोदी सरकार के लिए ढाल की तरह काम करने वाला भारतीय रेल मजदूर संघ भी है।

बीआरएमएस भारतीय मजदूर संघ का घटक है और बीएमएस को आरएसएस संचालित करता है।

असल में झंडों का फर्क है, बाकी कोई खास फर्क नहीं बचा है। एआईआरएफ़ का तो दशकों से हड़ताल का नोटिस चला आ रहा है, ये इस फ़ेडरेशन के नेता ही कहते हैं।

इस हालत से तो यही लगता है कि रेल के खरीदारों को अगर संपत्ति के साथ ये यूनियनें भी मिलेंगी तो उनको डबल फायदा ही होगा, नुकसान तो शायद बिल्कुल भी न हो।

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