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डिलीवरी के 14 दिन बाद ही नवजात के साथ ऑफ़िस पहुंची महिला अधिकारी, मैटर्निटी लीव पर छिड़ी बहस?

मैटर्निटी लीव महिलाओं के बहुत संघर्षों के बाद हासिल हुआ है, ये महिलाओं का हक़ है, इसका छिनना मिसाल नहीं- नज़रिया

By नाज़िया ख़ान

कोरोना के समय प्रशासनिक कार्यभार निभाने के लिए मैटर्निटी लीव यानी मातृत्व अवकाश को छोड़ने पर उत्तर प्रदेश की एक महिला एसडीएम की इन दिनों सोशल मीडिया पर काफ़ी तारीफ़ हो रही है और साथ ही मैटर्निटी लीव पर बहस छिड़ गई है।

गाज़ियाबाद की एसडीएम सौम्या पांडे ने डिलीवरी के 14 दिन बाद ही ड्यूटी ज्वाइन कर ली क्योंकि कोविड की वजह से वर्कलोड बहुत अधिक था। कहा जा रहा है कि वे स्वस्थ हैं और काम करने की स्थिति में हैं तो मातृत्व अवकाश पूरा नहीं लिया।

कार्यालय में अपना काम निपटाते हुए अपने दुधमुहें बच्चे को गोद में लिए उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर काफ़ी वायरल हुई है।

स्थानीय मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार, महिला अधिकारी का कहना है कि ‘ग्रामीण भारत की महिलाएं भी तो पूरी गर्भावस्था काम करती हैं और प्रसव के तुरन्त बाद से ही बच्चे की देखभाल के साथ ही घर के काम भी शुरू कर देती हैं। वही इन्होंने भी किया है।’

हालांकि सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इसे महिला अधिकारों को ग़लत संदर्भ में पेश किया जाना कहा और लिखा है कि कुछ अधिकार संपन्न तबके को छोड़, ये सुविधा आम महिलाओं को नसीब नहीं होती, ख़ासकर मज़दूर वर्ग से आने वाली महिलाएं को।

मैटर्निटी लीव पर बहस


काश, इसके बजाय यह कहतीं कि मैं उस प्रिविलेज्ड वर्ग से हूँ, जहाँ गर्भावस्था की शुरुआत से लेकर बच्चे के जन्म के बाद तक सारी उच्च कोटि की सुविधाएं मुहैया हैं, उत्तम स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर नौकर-चाकरों, मातहतों की मुस्तैद फौज है, तो मेरे लिये यह आसान था।

मैडम यह तो जानती ही होंगी कि मातृत्व अवकाश के लिये महिलाओं ने कितना संघर्ष किया है। कई दशकों के संघर्ष के बाद 1970 में कई देशों में क़ानून बनने के बावजूद कहीं 25 कहीं 30 साल में इम्प्लीमेंट हो पाया। कई देशों में अब भी पेड लीव नहीं मिलती।

वर्क-प्लेस पर महिलाओं के साथ डिस्क्रिमिनेशन कोई छिपी बात नहीं। कोरोना-काल में विश्व-भर में 56% महिलाएं बेरोज़गार हुई हैं।

अगर समान क्वालिफिकेशन है तो छंटनी के समय पुरुष को महिला पर तरजीह दी जाएगी, नौकरी जाने की दशा में भी अगर समान वेतन की बात हो तो पुरुष एम्प्लॉयी प्रेफ़र किये जाएंगे, ‘महिलाओं वाले फील्ड्स के अलावा’, नहीं तो आपको वर्किंग ऑवर्स और सैलरी में कम्प्रोमाइज़ करना ही होगा।

ख़ैर, वक़्ती वाह-वाही के लिये यह विमर्श गरिष्ठ है, लेकिन कम से कम इतना ही सोच लेतीं कि जिस महामारी की दुहाई देकर काम पर लौटी हैं, उसी के प्रति जागरूकता का उदाहरण सेट करतीं, अपनी नवजात बच्ची को वर्कप्लेस का एक्सपोज़र न देकर।

यह भी तो उन्हीं की ज़िम्मेदारी है न कि अगर वे सब सुविधाओं से लैस हैं, तो जो नहीं हैं, उनके लिये ऐसी मिसाल न क़ायम करें जिससे सब कामकाजी महिलाओं पर दबाव बने।

इतने छोटे बच्चे को कार्यस्थल पर लेकर आने के सम्बंध में महामारी एक्ट में कुछ प्रावधान होना चाहिये।

यह भी सच है कि प्रिविलेज वह भी है, जिन अधिकारों के लिये हमें लड़ना नहीं पड़ा, औरों से बेहतर जीवन जी रहे हैं। शायद इसीलिये क्लास, मास के बारे में चिंतित नहीं होता।

जज़्बे को सलाम लिखना बहुत आसान है, मज़दूर पैदल जा रहे, जज़्बे को सलाम है, अस्पताल तक नहीं पहुँच पाए, रास्ते में प्रसव हो गया, ख़ुद चलकर गई जच्चा, बच्चे को लेकर अस्पताल, हिम्मत को सलाम है।

मज़दूरी करके, आधे पेट रहकर बच्चों को पढ़ाया, रिक्शा चलाकर आईएएस बनाया, त्याग और जज़्बे को सलाम है, सिस्टम का फेलियर जहाँ भी हो, जज़्बे को सलाम ठोंक दो।

अभी जज़्बा भी बढ़िया है, नीयत नेक है, जब आप सम्पन्न हों, सुविधाभोगी वर्ग से हों तो ईमानदारी से इस बात को हाइलाइट करें, ऐसा इंटरप्रिटेशन न निकले कि ग्रामीण महिलाएं तो कर्मठ हैं, नख़रे शहरी कामकाजी महिलाओं के ही हैं जी।

कोई ज़रूरत नहीं मेटरनिटी लीव की, सब कामचोरी है, मैडम ने प्रूव जो किया है सोशल-मीडिया पर वायरल होने वाले इस युग में।

(फ़ेसबुक पोस्ट से साभार, आंशिक संपादन के साथ)

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