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जब 12 घंटे काम के नियम के ख़िलाफ़ मज़दूरों ने 3 साल तक गोरों की नाक में दम कर दियाः इतिहास के झरोखे से-2

1905-08 के बीच पूरे देश में लगभग हर क्षेत्र में हड़तालों का तूफ़ान खड़ा हो गया था

 By सुकोमल सेन

सन् 1903 में मद्रास गवर्नमेंट प्रेस में मजदूरों को ओवर टाइम का भुगतान न करने पर प्रेस और मशीन विभाग के मजदूरों ने हड़ताल कर दी।

यह हड़ताल लगभग 6 महीने तक चली। इस बीच बंदी सुधार गृह से सजा पाए बंदियों को लाकर काम करवाया जाता रहा। काफी परेशानियों के बाद मजदूर काम पर लौट गए। लेकिन ये सिर्फ तूफ़ान के पहले का सन्नाटा था।

1905 के आस-पास डीजल के समवावेशन से बहुत से मिल मालिक काम के घंटों को और अधिक बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित हो उठे।

मजदूरों द्वार इसका जबरदस्त विरोध हुआ और जहां-तहां अनेक हड़तालें हुई। सन् 1905 में मुंबई के सूती मिल मालिकों ने जब बिजली का लाभ लेकर मजदूरों पर और अधिक घंटों तक काम का नियम थोपना चाहा तो विभन्न मिलों में काफी संख्या में हड़तालें हुईं।

इनमें से कुछ हड़तालों के साथ जुझारू प्रदर्शन हुए। इसी वर्ष अक्टूबर में बड़े पैमाने की हड़तालों से त्रिकुमदास मिल, फोइनिक्स मिल और दूसरी कई मिलें प्रभावित हुई।

हड़तालों की गंभीर प्रकृति के बारे में ‘अमृत बाज़ार’ पत्रिका ने रिपोर्ट छापी, ‘मुंबई मिल मजदूरों के आंदोलन ने कल शाम (8 अक्टूबर) एक गंभीर रूप धारण कर लिया।’

सुबह से लेकर शाम तक काम के ख़िलाफ़ हड़तालें

करीब तीन-चार हजार मिल मजदूरों ने डीलेसल रोड-परेल पर अनेक मिलों के सामने उग्र प्रदर्शन किया।

इस अशांति के लिए ज़िम्मेदार मजदूरों की भीड़ ने सूर्यास्त के बाद न सिर्फ बिजली की रोशनी में काम करने से इनकार किया बल्कि इन मजदूरों को भी काम करने से रोकने में सफल हो गए जो गोधूलि (शाम) के बाद काम करना चाहते थे।

मिल के बाहर संगठित रुप में मजदूरों के खड़े होने से ऐसा लगता कि कोई गंभीर दंगा होने जा रहा है…

पत्रिका ने बाद में अनेक प्रदर्शनकारियों को दंडित किए जाने का समाचार छापा। सन् 1907 में भी मुबंई मे वेतन बढ़ोत्तरी के लिए हड़तालें हुई थीं, जिनमें कुछ एक सप्ताह तक भी चलीं।

17 अगस्त 1906 को वतेन बढ़ोत्तरी की मांग को लेकर मुंबई के 500 डाकियों ने हड़ताल कर दी।

एक सप्ताह तक हड़ताल चलने से डाक सेवाएं पूर्णत: ठप पड़ गईं। सरकार ने हड़ताली कर्मचारियों के छह नेताओं के ख़िलाफ़ गिरफ्तारी वारंट जारी किया।

अहमदाबाद में उद्योगों की संख्या में काफी वृद्धि हुई लेकिन मांग अधिक होने से मजदूरों की कमी हो गई।

इसलिए मजदूरों को वेतन बढ़ोत्तरी की मांग करने का अनुकूल अवसर मिला और बड़ी संख्या में आंशिक हड़तालें हुई।

मज़दूरों से दहशत में था ब्रिटिश शासन

वास्ताव में इस दौर में मजदूरों की हड़तालों की संख्या और आवेग दोनों मे काफी वृद्धि हुई। सरकारी प्रवक्ताओं और बहुत से मिल मालिकों के वक्तव्य इसके साक्ष्य हैं।

मुंबई के एक मिल मालिक ने फ़ैक्ट्री लेबर कमीशन 1908 को बताया कि बाद के समय में हड़ातालें अधिक व्यवस्थित और सफल रहीं।

अहमदाबाद के ज़िला अधिकारी के अनुसार, अधिकतर हड़तालें वेतन बढ़ाने के लिए होती थीं और मालिकों को बढ़ा वेतन देना पड़ता अन्यथा दूसरे उद्योग मालिक मज़दूरों को काम दे देते।

मुंबई प्रांत के उद्योग निदेशक मि. बरुचा ने निरीक्षण किया कि मिल मालिकों के ख़िलाफ़ मज़दूर शक्तिशाली थे और वे संगठित हो जाते थे चाहे वहां ट्रेड यूनियन न भी हो।

वर्धा का डिप्टी कमिश्नर, एक ब्रिटिश नागरिक भारतीय मजदूरों की अति प्रारंभिक वर्ग चेतना से भी आतंकित था जब उसने कहा, ‘मजदूर परिस्थितियों के स्वामी थे जबकि मिल मालिकों को मजदूरों से कहीं अधिक सुरक्षा की ज़रूरत थी।’

जब पूंजीपतियों को मज़दूरों के बढ़ते प्रतिरोध का सामना करना पड़ता था तो सरकारी अधिकारियों और मिल मालिकों द्वार परिस्थिति का वर्णन बढ़ा चढ़ा कर करने की प्रवृति से इनकार नहीं किया जा सकता।

इस  बारे में फैक्टरी लेबर कमीशन द्वारा तत्कालीन मजदूरों की स्थितियों का अध्ययन, अधिक संतुलित प्रतीत होता है।

12 घंटे काम का प्रस्ताव

आयोग के अनुसार ‘मुंबई और ऐसे ही अन्य औद्योगिक केंद्रों में आंदोलन का इतिहास बताता है कि मजदूर स्थानीय हड़ताल के तंत्र को भली प्रकार समझते हैं और अलग-अलग मामलों में अपनी मांगें मनवाने के लिए बार-बार मालिक को बाध्य कर देते हैं।

वे अभी भी किसी एक समान हित के लिए संयुक्त रुप से केंद्रीभूत कर्रवाई करने में अयोग्य हैं।

मजदूरों के निरंतर बढ़ते संघर्षों ने औपनिवेशिक आधिकारियों को अत्याधिक व्यग्र कर दिया इसलिए वे भारतीय मजदूरों की समस्या पर ध्यान देने के लिए बाध्य हुए।

अपने व्यावसायिक स्वार्थ से प्रेरित लंकाशायर के ब्रिटिश पूंजीपति भई सस्त मजदूरों, नुचित रुपर काज्ञय़ के अधिक घंटे और भारतीय उद्योगों में होने वाली अन्य ज्यादतियों की शिकायतों पर ध्यान देने के लिए सरकार पर दबाव डाल रह थे।

इस कारण 17 दिसंबर 1906 को सरकार ने सूती मिलों में मज़दूरों की स्थतियों की जांच पड़ताल के लिए सूती उद्योग मजदूर कमेटी (टेक्सटाइल फैक्टरी लेबर कमेटी) फ्रीयर स्मिथ कमेटी का गठन किया। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 1 जून 1907 को पेश कर दी।

इस रिपोर्ट में भारतीय मजदूरों के निर्मम शोषण की पुष्टि की गई और उनके निवास की भयावह स्थिति का विशेष उल्लेख किया गया। इस रिपोर्ट में प्रतिदिन 12 घंटे और सप्ताह में 72 घंटे काम का प्रस्ताव रखा गया।

काम के घंटे निर्धारित करने का विरोध

लेकिन मुंबई और कानुपर में ब्रिटिश मालिकों ने 12 घंटे के कार्यदिवस की सीमा का विरोध किया।

मुंबई मिल मालिक एसोसिएशन द्वारा लिया गया 12 घंटे कार्यदिवस का फैसला भारतीय मिल मालिकों द्वारा भी दो बार नकार दिया गया।

यहां फिर एक बार भारतीय और ब्रिटिश पूंजीपति अपने वर्गीय स्वार्थ के लिए एक हो गए। और एक होकर काम के घंटों की किसी भी सीमा का विरोध किया।

सन् 1906-7 के दौरान मजदूर आंदोलन की विशालता और व्यापकता ने रुई और सूती मिलों के अतिरिक्त अन्य उद्योगों में भी मजदूरों की स्थितियों पर ध्यान देने के लिए सरकार को मज़बूर किया।

सन् 1907 के अंत में मि. मोरिस की अध्यक्षता में फ़ैक्ट्री लेबर कमीशन नियुक्त हुआ।

लेकिन बहुत बड़ी संख्या में भारतीय उद्योगपतियों का बहुमत किसी भी प्रकार के सरकारी हस्तक्षेप और काम के घंटे की सीमा निर्धारण के ख़िलाफ़ था।

उन्होंने दबाव डाला कि मजदूरों को सूर्योदय से सूर्यास्त तक काम करना चाहिए। उस समय के एक प्रसिद्ध व्यापारी बिट्ठल दास दामोदर ठाकर ने, जो आयोग के भी सदस्य थे, उन्होंने अपनी असहमति में भारतीय पूंजीपती वर्ग का विचार लिखा।

भारतीय पूंजीपतियों की निर्ममता

एक ऐसी व्यवस्था जो उद्योगपतियों और मजदूरों दोनों को स्वीकार्य है और भारतीय परिस्थितियों के लिए उचित है। विशेषकर भारत सरकार द्वारा 1891 में आश्वासन देने के बाद ऐसी व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का हम कड़ा विरोध करते हैं।

यह अभद्रता और अन्याय है। अपने विचार के पक्ष में उन्होंने फैक्टरी लेबर कमीशन 1809 की सिफारिशों का संदर्भ दिया जिसमें वयस्क पुरुष मजदूरों के काम के घंटों के निर्धारण का विरोध किया गया था।

डॉ.टी.एम. नायर द्वारा आयुक्त को लिखा गया विरोध पत्र, भारतीय मजदूरों वर्ग के प्रति भारतीय उद्योगपतियों के रुख को और नग्नतम रूप को दर्शाता है।

डॉ. नायर ने लिखा, “हमारे देश के लोग यूरोपीय उद्योगपतियों की अपेक्षा एक वर्ग के रुप में कठोर मालिक और मजदूरों के प्रति अधिक अनुदार थे… यहां तक कि कुछ अत्याधिक जागरूक और शिक्षित भारतीय भद्रजनों से जब मैंने उद्योग के प्रश्न पर विचार- विमर्श किया तो उन्होंने मजदूरों की हमदर्दी के लिए एक भी शब्द नहीं कहा।”

“वे सब बीत गए समय को पुन: प्राप्त करने और अपने उद्योग को आगे बढ़ाने और दौलत कमाने के लिए बेताब थे।”

“लेकिन उनके लिए मजदूर उत्पादन शामिल मशीन के एक पुर्जे से अधिक कुछ नहीं था। मेर लिए यह खोज एक हद्य विदारक और दुखदायी आश्चर्य है…..”

पूंजीपतियों की एकता

यहां एक बार फिर भरतीय पूंजीपतियों की सर्वहारा के ख़िलाफ़ वर्गीय एकता की गहराई दिखाई देती है।

यह बताना ज़रूरी नहीं है कि ब्रिटिश पूंजीपतियों ने भी मजदूरों के काम के घंटे निर्धारित करने का विरोध किया था।

इंडियन जूट मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष ने उनके पक्ष में आवाज उठाई थी।

आगरा के एक ब्रिटिश मिल मालिक ने तो अहंकार पूर्ण ढंग से कहा कि ब्रिटेन में ट्रेड यूनियनों को काम के घंटे तय करने का अधिकार होगा लेकिन वह भारत में ऐसे संगठन को देखना ही नहीं चाहता। इस प्रकार भारतीय और यूरोपीय दोनों मिल मालिकों का यह संयुक्त विरोध था। (क्रमशः)

(भारत का मज़दूर वर्ग, उद्भव और विकास (1830-2010) किताब का अंश। ग्रंथशिल्पी से प्रकाशित)

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