MCD Polls: मुंडका अग्निकांड में जान गंवाने वाले मजदूरों के परिवार के मन में क्या है?

By शशिकला सिंह

दिल्ली के मुंडका मेट्रो स्टेशन से लगभग 5 किलो मीटर अंदर दो  गांव हैं मदनपुर और रानी खेड़ा। जहां 27 ऐसे परिवार हैं, जो आज भी 7 महीने पहले हुए मुंडका अग्नि कांड को नहीं भूल सके हैं। आज भी उनका दिल अपनों के खोने की याद से धक से बैठ जाता है।

पीड़ित परिवारों में से किसी ने अपनी मां, किसी ने बहन, किसी ने बहु खो दी है। एक परिवार तो ऐसा भी है जिसने मुंडका फैक्ट्री फायर में घर की तीन जवान बेटियों को खो दिया।

रात के खाने की तैयारी करते हुए 45 वर्षीय उषा रानी ने बताया, “मेरी  बेटियों ने  2 साल पहले ही फैक्ट्री में काम करना शुरू किया था। जब फैक्ट्री में आग लगी, तो मेरी एक बेटी ने अपनी जान की परवाह किये बगैर फैक्ट्री में काम करने वाली बहुत-सी लड़कियों की जान बचाई। जिसका वीडिओ भी हम सबने देखा है। लेकिन वो खुद को नहीं बचा सकी। अब परिवार में बस 2 बेटे हैं। घर चलाने के लिए एक बेटा मुंडका की किसी फैक्ट्री में काम करता है, तो दूसरा पढ़ाई कर रहा है। पीड़ित मां ने कहा कि अब उनका यही दो बच्चे सहारा हैं।”

घर में तीनों बेटियों के बड़े-बड़े फोटो बनवा लिए हैं। रोजाना बच्चियों को देख कर दुखियारी मां का कलेजा मुंह को आ जाता है। ये दर्द आजीवन सताएगा। पीड़ित परिवार की मांग है कि सरकार आगजनी की घटना की सीबीआई जांच करवाए।

MCD चुनाव से फिर जगी उम्मीद

पीड़ित मां ने कहा कि “मेरी बेटियों की मौत के बाद दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया था। वो हमको मिला भी है”।

अपने हाथों से आंसुओं को पोछते हुए उषा रानी कहती हैं कि “हमारे क्षेत्र में आम आदमी पार्टी के विधायक और पार्षद प्रत्याशी प्रचार करने भी नहीं आ रहे। वरना उनसे मांग करते कि आगजनी की घटना में इंसाफ कब दिलाएंगे? सीबीआई जांच करवाएं। जिन मृतकों के परिवार को सहायता राशि नहीं मिली है, उसे तत्काल मुहैया करवाएं। इलेक्शन है, तो क्या पता नेता जन कुछ आश्वासन दे दें?”

उषा ने बताया कि उनकी एक बेटी की मौत के केस में दिल्ली सरकार द्वारा मुआवजा की निर्धारित राशि दे दी गयी है। लेकिन  अब वो चाहती है कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

कब हुआ था हादसा

बीते 13 मई को दिल्ली का बाहरी इलाका मुंडका में सीसीटीवी बनाने वाली एक कंपनी में भयंकर आग लगी  थी।  उस वक्त  कंपनी में 200 से अधिक मजदूर काम कर रहे थे। जिसमें 27 मजदूरों की जान चली गई। मरने वालों में महिला मजदूरों की संख्या ज्यादा थी।

अब आगामी 4 दिसंबर को दिल्ली  में नगर निगम के चुनाव होने वाले हैं। इस दौरान पीड़ित परिवारों में फिर से उम्मीद जगी है कि कोई उनके जख्मों पर मरहम लगाएगा। परिवार को इंसाफ मिलेगा। दोषियों को सजा मिलेगी।

मुंडका के जिस गांव के एक घर में परिवार रहता है, वहां बगल में एक प्लॉट है। इसमें बारिश और गटर का पानी से भर जाता है। पानी के ऊपर असंख्य मच्छर  दिखाई पड़ते हैं। चारों ओर कूड़ा और गंदगी है।

गांव में रहने वाले एक युवक ने बताया कि प्लॉट मालिक के कई बार बोलने पर MCD की कूड़ा गाड़ी 6 महीने से आ रही हैं। अब सभी उसमें कूड़ा फेंकते हैं। अब यहां जो भी कूड़ा पड़ा हैं, वो सालों साल पुराना हैं। सफाई के नाम पर यहां कुछ भी नहीं होता।

चुनावी वादों से उठा भरोसा

उनका कहना हैं कि अब चुनाव होने वाले हैं इसलिए राजनीतिक दल बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं। अब तो किसी पर भरोसा भी नहीं रहा है।

एक  दुखियारी मां ने कहा कि अभी तक इस वॉर्ड से बीजेपी के पार्षद थे। हम बस कहने को दिल्ली में रहते हैं, लेकिन यहां कोई सुख सुविधा नहीं मिलती हैं। घर के आसपास इतनी गंदगी है कि अब इन दो बच्चों के बीमार पड़ने का खतरा लगा रहता है। शाम होते ही घर मच्छरों से भर जाता है। सफाई के नाम पर कुछ भी नहीं है। यहां तक कि गली भी ठीक से नहीं बनी है। गांव में हर रोज कोई न कोई पार्टी के नेता आते हैं और वोट की डालने को कहते हैं।

वो कहती हैं कि हम तो उम्मीद छोड़ चुके हैं। अब MCD के चुनाव करीब हैं। 4 दिसंबर को वोटिंग होनी है। जिस भी पार्टी का उम्मीदवार जीत हासिल करता है, वो बाद में क्षेत्र को भूल जाता है। जनता को उसके पीछे दौड़ना पड़ता है। तब कहीं जाकर थोड़ा बहुत काम हो जाता है। साल भर बाद हालात जस के तस हो जाते हैं।

यहां पास में एक बहुत छोटी-सी झुग्गी में रहने वाले एक और परिवार ने अपनी 19 साल की बेटी निशा को मुंडका अग्नि कांड में खोया था। अब उसके परिवार में पांच छोटी बहनें  और एक छोटा भाई है।

निशा के पिता  दिहाड़ी मज़दूरी पर प्लम्बर का काम करते हैं। हादसे वाले दिन वो फैक्ट्री से लगभग 600 मीटर दूर एक पानी की टंकी पर काम कर रहे थे।

45 साल के गुड्डू प्रसाद ने अपने बगल में बैठी सबसे छोटी बेटी के सिर पर हाथ सहलाते हुए बताया कि “उस दिन में वो पानी की टंकी पर काम कर रहे थे। अचानक से सामने आसमान में काले रंग के धुएं का गुबार दिखाई दिया। जब में उतरकर वहां पहुंचा तो कुछ भी समझ पाना मुश्किल था।”

बीमारियों से घिरे बच्चे

गुड्डू ने बताया कि हर तरफ आग थी, लोग इधर-उधर भाग रहे थे। कोई खुद को बचा रहा, तो कोई अपनों को ढूंढ रहा था। मैंने अपनी बेटी को बहुत ढूंढा, लेकिन वो नहीं मिली। डेढ़ महीने बाद उसकी झुलसी हुई बॉडी मिली, जिसे पहचान पाना मुमकिन नहीं था। DNA रिपोर्ट के आधार पर मानना पड़ा कि मेरी बेटी का ही शव था। ये कहते ही गुड्डू प्रसाद फफक पड़े।

वहीं  दिल्ली मुंडका कांड मामले में फॉरेंसिक साइंस प्रयोगशाला (FSL) को मई में लगी भीषण आग में मारे गए 27 मज़दूरों के अलावा कुछ अन्य के डीएनए नमूने मिले हैं, जिनका कोई भी दावेदार नहीं है ऐसे अभी नमूनों को भविष्य के लिए संरक्षित कर लिया गया है।

रोहिणी में स्थित एफएसएल के विशेषज्ञ जब दो महीने लंबी जांच के दौरान डीएनए प्रोफाइल की मदद से झुलसे हुए शवों की पहचान में जुटे थे, तब उन्हें ये अतिरिक्त नमूने मिले।

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गुड्डू के बगल में बैठी करीब 70 साल की एक दादी बताती हैं कि बाप शराब ज्यादा पीता था। घर में कोई बड़ा बेटा भी नहीं है, इसलिए बेचारी बेटी ने परिवार का सहारा बनने का फैसला लिया। लेकिन फैक्ट्री मालिक की लापरवाही ने परिवार के सहारे को ही निगल लिया।

वो आगे कहती हैं कि अब यह छोटे-छोटे बच्चे हैं, जो रोज किसी न किसी बीमारी से घिरे रहते हैं। इनका इलाज करवाने का भी पैसा नहीं हैं, परिवार के पास।

अपने छोटे बच्चों के स्वस्थ के प्रति चिंता जताते हुए गुड्डू ने कहा -” हम दिल्ली में नहीं कूड़े के ढेर पर रहते हैं। जहां न सड़क है, न पीने के लिए साफ पानी।”

अपने पुराने दिनों को याद करते हुए गुड्डू बताते हैं कि 35 साल पहले बिहार के नालंदा जिले से अपना घर परिवार छोड़ कर दिल्ली आया था। तब यह सोचा था कि दिल्ली देश की राजधानी है, वहां नौकरी भी मिलेगी और अन्य सुविधाएं भी। लेकिन अब पछतावा होता है।

मोदी का स्वच्छ भारत अभियान

बातों-बातों में जब उनसे पूछ कि क्या MCD वाले सफाई करने आते हैं? तो उनका कहना है कि यहां साफ-सफाई नहीं होती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्टूबर 2014 को राष्ट्रव्यापी स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की। उन्होंने खुद सड़क पर झाड़ू लगाई। इसके बावजूद धरातल पर कैंपेन का खास असर नहीं दिखा। एमसीडी के दावे और करनी में अंतर दिखता है।

गुड्डू ने का आरोप है कि, हर पांच साल में अलग-अलग पार्टियों के लोग आते हैं। प्रचार करते हैं, वोट मांगते हैं और फिर हमको बीमारियों को बीच मरने के लिए छोड़ जाते हैं।

गुड्डू जब इस बात को बता रहे थे, तब उनकी गली में लाउड स्पीकर की आवाज गूंजने लगी। जोकि ई-रिक्शे से आ रही थी। ई-रिक्शा पूरी तरह से एक पार्टी के झंडों के पटा हुआ था।

पास के एक घर में 12वीं क्लास में पढ़ने वाली लड़की बाहर आई और ई रिक्शे को देखने लगी। जब वर्कर्स यूनिटी की टीम उसके पास गई तो उसने बताया कि ये रोज शोर करते है, जिससे पढ़ाई में मुश्किल दिक्कत होती है।

वो आगे कहती  है कि घर का पूरा काम करने के बाद पढ़ाई के लिए टाइम कम मिल पाता है। ऊपर से इलेक्शन कैंपेन के शोर-शराबे ने परेशान कर दिया है।

देखते ही देखते वो अपने घर के बाहर बनी सीढ़ियों पर ही बैठ जाती है।

‘मां घर की रौनक थी’

इस लड़की का नाम दिव्या है, जो अभी 17 साल की है। उसका छोटा भाई 15 साल का है। दिव्या ने बताया कि उसकी मां भी मुंडका की उसी फैक्ट्री में काम करते थी, जहां आग लगी थी। 14 मई की सुबह दिव्या की मां यशोदा देवी अपने दोनों बच्चों को स्कूल भेज कर काम के निकली थी, जो फिर कभी वापस नहीं आयीं।

दिव्या ने बताया कि मेरी मां ने आसपास की बहुत-सी लड़कियों को फैक्ट्री में काम के लिए लगवाया था। उनके जाने के बाद सब खत्म हो गया है। मेरे पिता बीते 7 महीनों से कुछ काम नहीं करते हैं। घर का खर्च और हमारी पढ़ाई उन रुपयों से चल रही है, जो मम्मी के जाने के बाद मुआवजे के तौर पर मिले थे।

वो कहती हैं कि घर में मम्मी थी, तो रौनक थी। पापा पूरे दिन बाहर रहते हैं। सब मुझे ही करना पड़ता है। आंखों में टीचर बनने का ख्वाब है। दिव्या ने कहा कि मैं पढ़ लिखकर टीचर बनाना चाहती हूं। जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाऊंगी, ताकि वो भी समाज में सम्मानजनक जीवन जी सकें।

दिव्या ने कहा कि गरीब मज़दूरों को केवल वोट बैंक के तौर में देखा जाता है। उनके विकास और उत्थान पर काम नहीं किया जाता।

विधायक का पक्ष

वर्कर्स यूनिटी की टीम ने मुंडका से आम आदमी पार्टी के विधायक धर्मवीर लाकड़ा से भी बात की। उनसे पीड़ित परिवारों की मदद को लेकर सवाल किए। विधायक ने बताया कि अभी मुंडका के केस में बहुत अधिक कहने की स्थिति में नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि वो 4 दिसंबर को एमसीडी के इलेक्शन के बाद खुलकर बात कर सकेंगे। फिर भी दिल्ली की केजरीवाल सरकार की परिवार वालों के साथ पूरी हमदर्दी है। जिन मजदूरों की जान गई है, उनके परिवार की आर्थिक मदद भी की है। सीबीआई जांच के सवाल पर धर्मवीर लाकड़ा ने फिर वही जवाब दिया कि निगम चुनाव के बाद इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

गौरतलब है कि दिल्ली के बाहरी इलाके में मुंडका इंडस्ट्रियल एरिया में बहुत सी फैक्ट्रियां है। कुछ फैक्ट्रयों में केवल महिलाएं ही काम करती हैं। जिनको दिल्ली सरकार द्वारा तय  न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता है। मुंडका फैक्ट्री में आग लगने के बाद वहां काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं आज भी काम की तलाश में भटक रही हैं और बहुत ससी ऐसी महिलाएं भी हैं जिन्होंने घर में ही छोटा-मोटा  काम  शुरू कर दिया है।

इस महिलाओं का कहना है जितना वेतन हमको फैक्ट्री में जाने से मिलता था, उतना हम घर में ही माला बनाकर, कपड़े के फूल बना कर कमा लेते हैं।

मुंडका अग्निकांड के बाद बहुत से संगठनों ने फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट जारी की थी। जिसमें से एक वर्किंग पीपल्स कोएलिशन WPC ने बीते जुलाई में जारी रिपोर्ट में इस बात का दावा किया था कि दिल्ली की फैक्ट्रियों में काम करने वाली लगभग सभी महिला मज़दूरों को दिल्ली सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जा रहा है।

न्यूनतम मजदूरी तक पहुंच पर यह रिपोर्ट दिल्ली में चार समूहों में 1076 श्रमिकों के सर्वेक्षण पर आधारित थी। यह सर्वे जनवरी और फरवरी 2022 में घरेलू, निर्माण, औद्योगिक और सुरक्षा गार्ड पर किया गया था।

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One Comment on “MCD Polls: मुंडका अग्निकांड में जान गंवाने वाले मजदूरों के परिवार के मन में क्या है?”

  1. गरीब मजदूरों का कोई नहीं होता.

    सरकार भी खाना पूर्ति कर अकेला छोड़ देती है.

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