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आठ साल बाद पहली बार एक साथ बाहर आए 13 मारुति वर्कर, यूनियन ने दी 65 लाख की आर्थिक मदद

मारुति आंदोलन की अगुवा पूरी यूनियन बॉडी है आठ साल से जेल में बंद, आजीवन कारावास के ख़िलाफ़ अपील पर अभी तक सुनवाई नहीं

पहली बार किसी त्यौहार को अपने घर मना रहे इन मज़दूरों को मारुति उद्योग कामगार यूनियन गुरुग्राम और मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन मानेसर ने 5 लाख रुपये प्रति परिवार आर्थिक मदद कर एकजुटता प्रदर्शित की।

जबसे ये मज़दूर जेल में हैं ये यूनियनें वर्करों की से चंदा इकट्ठा कर इनके परिजनों की समय समय पर मदद करती हैं। इसके अलावा मुकदमे और किसी आपातकाल में भी आर्थिक मदद जारी है।

मारुति आंदोलन के नेता रामनिवास ने अपने फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा है, “बेशक आज भी हमारे अग्रणी 13 साथी जेल की सजा काट रहे हैं लेकिन उनकी रिहाई के लिए अभी भी हर तरीके से संघर्ष जारी है । वर्तमान में जो मजदूर साथी कारखाने के अंदर काम कर रहे हैं व अन्य इकाइयों के मजदूर भी इन जेल में बंद मजदूरों के साथ अपने वर्गीय भाईचारे की मिसाल देते हुए इनके साथ खड़े हैं।

“18 मार्च 2017 को सैशन कोर्ट गुरुग्राम ने 31 मजदूरों को दोषी ठहराया और 13 यूनियन प्रतिनिधियों को उम्र कैद की सजा सुनाई । इसके बाद मारुति के मजदूरों ने इनके परिवारों की आर्थिक सहायता के लिए चंदा इकठा किया जिसमें सनबीम, बेलसोनिका, पावरट्रेन, मारुति गुडगांव प्लांट ने भी मानेसर प्लांट का साथ दिया और लगभग 2.5 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता की। इस साल भी हरियाणा में मारुति सुज़ुकी प्लांटों की ट्रेड यूनियनों ने जेल की सज़ा भुगत रहे 13 मारुति वर्करों की संयुक्त रूप से आर्थिक मदद की।”

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मारुति वर्करों को न्याय देने में देरी क्यों?

मारुति के 13 वर्कर, जो कि तत्कालीन यूनियन बॉडी के सदस्य थे, पिछले आठ सालों से गुड़गांव के सेंट्रल जेल में बंद हैं। सेशन कोर्ट ने उन्हें उम्र कैद की सज़ा सुनाई है।

आठ साल पहले यूनियन बनाने की मांग को लेकर उग्र आंदोलन हुआ था जिसमें मैनेजमेंट एक व्यक्ति की जल कर मौत हो गई। इसके बाद 2500 वर्करों को निकाल दिया गया और सैकड़ों वर्करों पर हत्या का मुकदमा चला।

147 वर्करों को साढ़े तीन से छह साल तक जेल के अंदर रखा गया और अंत में इन 13 वर्करों को दोषी क़रार देकर आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई।

एक तरफ़ संगठित रूप से नफ़रत फ़ैलाने वाले रिपब्लिक चैनल के कुख्यात एंकर अर्णव गोस्वामी को आत्महत्या के लिए उकसाने का केस होने के बावजूद हफ़्ते भर के अंदर सुप्रीम कोर्ट ने आनन फानन में ज़मानत दे दी, वर्करों को सालों साल जेल में रखकर सड़ाया गया।

हर बार इनकी ज़मानत रद्द की गई और ये फ़ैसला देते हुए अदालत ने कहा, “बढ़ते श्रमिक असंतोष की वजह से विदेशी निवेश कम हो सकता है।”

ताज्जुब की बात है कि सेशन कोर्ट के इस बेतुके फ़ैसले के ख़िलाफ़ की गई अपील पर सुनवाई के लिए अभी तक हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को समय नहीं मिला है।

दो वर्करों को ट्यूमर और कैंसर

न्याय व्यवस्था की ओर से जानबूझकर की जा रही इस लापरवाही के कारण मज़दूर किसान परिवार से आने वाले इन वर्करों ने अपना पूरा नौजवानी का समय जेल में काट दिया।

असल में पूंजी और सरकार हाल के समय में हुए सबसे प्रेरणादायी संघर्ष को पूरी तरह दबा देना चाहती है।

अभी हाल ही में इन 13 वर्करों में से एक अजमेर को ब्रेन ट्यूमर हो गया है। 18 जुलाई 2012 को पूरे आंदोलन में चर्चित चेहरा रहे जियालाल, जोकि दलित समुदाय से आते हैं, उन्हें कैंसर हो गया है, जोकि चौथे स्टेज में है।

लेकिन इन कठिनाइयों में भी वर्करों और यूनियन ने एकता का दामन नहीं छोड़ा है। उन्होंने ठेका व्यवस्था को हटाने, श्रमिकों के मेहनत की चोरी रोकने, यूनियन बनाने के अधिकार पाने और सम्मानजनक जीवन के लिए एकजुट होकर जुझारू लड़ाई लड़ी।

यही एकमात्र कारण है कि 13 वर्कर आज भी जेल में हैं। हालांकि इस आंदोलन ने मज़दूर आंदोलन की आने वाली उस पीढ़ी को प्रेरित किया, जिनके सामने आज पहले से कहीं अधिक चुनौती है।

आज मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से लेकर छात्र, अल्पसंख्यक और देश में हाशिए पर रखी गई राष्ट्रियताओं से आने वाले बहुत से लोगों को मनमाना क़ानून बना कर जेल में डाला जा रहा है।

इनमें से कुछ मामले चर्चित होते हैं और फिर भुला दिए जाते हैं लेकिन अधिकांश मामलों की भनक तक नहीं लगती।

श्रमिक वर्ग की एकजुटता

जिस परिवार, समुदाय और समूह का ये लोग हिस्सा हैं, वो अकेले लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्हें मानसिक रूप से तोड़ने की कोशिश हो रही है।

ऐसे अंधेरे समय में आठ सालों से जो 13 मारुति वर्कर जेल में बंद हैं, वो व्यापक श्रमिक एकजुटता से ही अपनी लड़ाई लड़ पा रहे हैं।

जेल में रहते हुए उन्हें इसबात का पछतावा नहीं है कि उन्होंने एक शानदार संघर्ष की अगुवाई की, बल्कि वो अपने अनुभव लिख रहे हैं, गीत बना रहे हैं, भाषाएं सीख रहे हैं, परीक्षाएं दे रहे हैं। हालांकि उनके परिवार तमाम मुश्किलें झेलने को अभिशप्त हैं।

कुछ मारुति वर्करों ने अपनी नौकरी छोड़ दी और अपना अधिकांश समय मज़दूरों को गोलबंद करने में लगा रहे हैं। वे अभी भी आंदोलनात्मक एकजुटता को बढ़ाने में लगे हुए हैं। जो अभी भी फ़ैक्ट्रियों में हैं, वो अपनी एकजुटता में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं।

मज़दूरों किसानों और आम जनता के हालात दिनों दिन ख़राब हो रहे हैं, बावजूद ये एकजुटता उन्हें नए संघर्षों और लामबंदी के लिए बल देती है।

इसीलिए इतनी मुश्किलों के बाद भी जेल में बंद राम मेहर, सरबजीत, संदीप ढिल्लन, रामबिलास, अमरजीत, अजमेर, सोहन, सुरेश, प्रदीप, पवन, योगेश, धनराज और जियालाल को रिहा करने की मांग हो रही है। मारुति के संघर्ष की गर्माहट पूरे औद्योगिक बेल्ट में अभी भी महसूस की जा सकती है।

(नयन ज्योति के फ़ेसबुक पोस्ट का संपादित हिस्सा।)

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