नेचर का तिलिस्म, हर किस्म की वाइन, कुर्ग का मुर्ग और लज़्ज़तदार खाना : कुर्ग डायरी

नेचर का तिलिस्म, हर किस्म की वाइन, कुर्ग का मुर्ग और लज़्ज़तदार खाना : कुर्ग डायरी

By संजय श्रीवास्तव

ख़ूबसूरत घुमावदार रास्ते। धान के कालीन से बिछे हरे हुए खेत। बारिश शुरू हो चुकी थी। तेज और तेज। कार भागती जा रही थी। करीब 48 किलोमीटर का सफर पूरा हो चुका था। सामने चारों ओर ब्रह्मगिरी की पहाड़ियां भुजाएं फैलाए हुए थीं। चारों ओर हरितमा। सामने प्रवेश द्वार और पीछे से ऊपर जाती सीढ़ियां।  शांत बहुत मनोरम।

ऊपर जाती सीढ़ियां जहां खत्म हुईं। वहीं से फिर कुछ सीढ़ियां नीचे की ओर उतरती हैं। बहुत छोटा सा कुंड है। कुलबुलाता हुआ पानी। छोटे से कुंड जो बुलबुले लगातार क्रीड़ा कर रहे हैं, वही ये बता रहे हैं कि ये वो जगह है जहां से दक्षिण भारत की ताकतवर नदी कावेरी अपने सफर का आगाज कर रही है। यही छोटा सा कुंड कावेरी नदी का उद्गम स्थल है, ताला कावेरी।

ये नदी जैसे जैसे यहां से आगे बढ़ती है, संगम बनाती है, प्रपात बनाकर खिलखिलाती है, रास्ते भर खुशहाली का शंखनाद करती जाती है। कर्नाटक और तमिलनाडु में कावेरी उनकी आर्थिक संरचना में अहम भूमिका निभाती है।

इस चमत्कारिक कुंड से बमुश्किल 5 मीटर ही दूरी जब कावेरी कुंड से अपनी आंखें खोलते हुए दूसरे कुंड में गिरती है तब तक वह ताकत और प्रचुर जल को समेट चुकी होती है।

मैंने इससे पहले दो नदियों के उद्गम और देखें हैं, वो कमोवेश इसी तरह के थे। नर्मदा और सोन। मध्य प्रदेश के अमरकंटक में जैसे सुरम्य पहाड़ी स्थल में ये दोनों बड़ी नदियां भी इतने छोटे कुंड से निकलती हैं कि विश्वास नहीं होता कि आगे जाकर वो इतनी बड़ी हो जाएंगी और लंबी करेंगी।

हालांकि नर्मदा और सोन शुरुआती 02-03 किलोमीटर तक पानी की बहुत पतली धारा में बहती हैं। बात सही है कि हर बड़ी यात्रा की शुरुआत आमतौर पर साधारण और छोटे तरीके से ही होती है, अगर उसमें सततता बनी रहे।

नर्मदा और सोन के उद्गम स्थल भी पहाड़ों से घिरे हैं। कहा जाता है कि पहाड़ों से अंदर से कोई अदृश्य स्त्रोत इन नदियों को सिंचित करता है।

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कावेरी पर 2000 साल पुराना कलानी बांध

अब ताला कावेरी के बेहद शांत और मनोरम माहौल की बात। अगर यहां सुबह आएंगे तो ये जगह कुहासे और कोहरे से घिरी हुई पाएंगे। उनके बीच ये सीढ़ियां ऐसी लगेंगी मानो वो किसी रहस्यपूर्ण लोक की ओर जाने वाले रास्ते की ओर इशारा कर रही हैं। यहां कावेरी नदी के पास कई और मंदिर भी हैं, ऊपरी हिस्से में। वैसे यहां की खूबसूरती रूहानी अहसास कराती है। असीम शांति भरने वाली जगह। जीवन की धारा को ताजगी देने वाली जगह।

यहां बारिश तकरीबन रोज ही हो जाती है लेकिन मानसून में यहां आना ज्यादा सौंदर्यबोध देगा। उत्तर भारत में जिस तरह गंगोत्री, यमुनोत्री और अमरकंटक बहुत पवित्र जगहें मानी जाती हैं उसी तरह का रूतबा तालाकावेरी का है। समुद्रतट से 1276 मीटर ऊंचाई वाली ये जगह कर्नाटक के कोडेगू ज़िले में है, जो कुर्ग इलाक़े की खूबसूरती में कई और सितारे जोड़ती है।

कावेरी को यहां से 50 किलोमीटर दूर जब आप वृंदावन गार्डन के पास देखेंगे तो ये विपुल जलसंपदा के साथ गर्वीली हो चुकी होती है। वहीं बगल के कृष्णराज वाडियार बांध पर जब इसे बांधने की कोशिश होती है तो ये तूफानी मतवाला नृत्य करती लगती है। ये वही कावेरी है, जिसके पानी को लेकर कई दशकों तक तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच तीखा विवाद होता रहा। वैसे ये कहना सही होगा इस नदी ने यकीनन लोगों की क़िस्मत को बदला है।

आमतौर पर नदियों की हमारे देश में एक दैवीय छवि है, उसी के चलते कावेरी एक देवी है, जिन्हें ‘कावेरीम्मा’ कहा जाता है। जिनकी प्रतिमा कृष्णराज बांध और कावेरी के किनारे कई जगहों पर दिखेगी। कावेरी दो शब्दों से मिलकर बना है – का और वेरी, जिसका मतलब है जहां से बहे वहां खुशी लाने वाली।

कावेरी नदी तमिलनाडु में 40 फीसदी और कर्नाटक में 26 फीसदी लोगों को अन्न उपलब्ध कराती है। वर्ष 2016 और 2017 में जब कम बारिश के बाद कावेरी में पानी सूखने लगा तो कर्नाटक और तमिलनाडु में अकाल सी स्थिति पैदा हो गई।

हाल ही में चोला साम्राज्य पर मणिरत्नम की फिल्म ‘पीएस-1’ यानि ‘पोनयन सेल्वन’ जिस चोला साम्राज्य के प्रतापी राजा की बात करती है वो इसी नदी के किनारों पर फले फूले।

इसी पर चोला किंग कारीकलान ने 2000 साल पहले कलानी बांध बनवाया। इसी कावेरी के समुद्र से गिरने के मिलन स्थल पर वो कावेरीपूमपट्टियम नाम का बंदरगाह बना, जहां यूरोप से लेकर चीन और यूनान तक से व्यापारियों के जहाज चोला साम्राज्य के साथ व्यापार करने आया करते थे।

बात सही है कोई नदी अपने बहते हुए रास्तों के आसपास जहां संगम, प्रपात और मनोरम जगहों को रचती है वहीं सृष्टि, सभ्यता और संस्कृतियों का निर्माण भी करती जाती है।

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मिर्च से लेकर हर तरह की फ़्रूट वाइन वाला कुर्ग

कुर्ग में जब मुझको तीखी नुकीली हरी मिर्च की वाइन पीने को दी गई, तो मैं थोड़ा हैरान रह गया – तीखी मिर्च की वाइन कैसे बन सकती है। लेकिन वाइन के पैग वाली गिलास सामने आ चुकी थी। मैं पहले नंबर पर था, पीछे कुछ और लोग उत्सुक से खड़े थे।

वैसे ये बता दूं कि ये वाइन हमें मुफ्त में एक कॉफी प्लांटेशन एस्टेट में परोसी जा रही थी, जिसके तमाम चप्पों को घूमते हुए हम उस एस्टेट में बनी खूबसूरत मसालों और वाइन की दुकान में ले जाए गए थे।

कुर्ग को भगवान ने जितनी ख़ूबसूरती बख्शी है, उतनी ही नेचर की नेमत भी दी है और साथ ऐसी मिट्टी और मौसम दे दिया कि उसे कॉफी से लेकर तमाम मसालों को उगाने का खजाना मिल गया।

14 वीं सदी के बाद पूरी दुनिया में भारत की खोज इसलिए शुरू हई, क्योंकि यहां के मसाले बेमिसाल थे और दुर्लभ भी।

काफी हद इन मसालों ने अगर विदेशियों को इस देश को उपनिवेश बनाने में ललचाया तो कहना ग़लत नहीं होगा। पुर्तगाली आए, फ्रेंच आए, चाइनीज आए और उनके पीछे पीछे अंग्रेज।

इन सभी के लिए केरल और कुर्ग में पैदा होने वाली काली मिर्च सबसे बड़ा आकर्षण थी। इस पर एकाधिकार के लिए यूरोपीय ताकतों में जंग ही छिड़ गई। काली मिर्च तब ‘ब्लैक गोल्ड’ कही जाती थी और गोल्ड से ऊंचे भावों पर बिकती थी।

कुर्ग की धरती ख़ुशक़िस्मत है कि यहां केरल के बाद देश की सबसे ज़्यादा काली मिर्च और इलायची पैदा होती है। यहां बोरे के बोरे काली मिर्च, इलायची, दालचीनी और लौंग से भरी बड़ी बड़ी बोरियां लदी दिखती हैं।

खैर विषयांतर नहीं करूंगा। यहां के एस्टेट अगर मसालों और कॉफी से भरे हुए हैं तो हर फल यहां उगता है। आप जितने फलों को याद कर सकते हैं याद कर लीजिए। यहां उन पर सभी की वाइन बनाई जाती है। दुनिया में इतने तरह की और इतने स्वादों की वाइन कहीं नहीं बनती, जैसी यहां बनती है। वैसे वाइन हेल्थ के लिए पीनी भी चाहिए।

जब भगवान का नाम लेते हुए मिर्च की वाइन पी तो ये शर्तिया लगा था कि इसका स्वाद कुछ तीखा तो होगा लेकिन वाइन की कुछ लचक तो इसमें भरी ही होगी। जब पूरा पैग गटकते हुए उसे गले से नीचे पहुंचाया तो हैरानी का दूसरा दौर हैरान कर रहा था, ये कतई तीखी नहीं थी बल्कि बहुत प्यारे स्वाद वाली मीठी मीठी वाइन थी।

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‘हेल्थ के लिए फ़ायदेमंद है वाइन’

सेल्समैन ने बताया कि ये 22 तरह से हेल्थ के लिए फ़ायदेमंद है। वाइन की ख़ास आकार वाली लंबोदरी बोतलों में अगर तरह तरह की वाइन भरी थीं तो तरह तरह के रंगों की भी थीं-हरे, लाल, नीली, पीले,भूरी, बैंगनी, नारंगी, काली और रंगहीन वाइन। हर वाइन का स्वाद बेजोड़।

वैसे यहां की वाइन अल्कोहलिक नहीं होतीं, इसलिए एक्साइज महकमे और मोटे टैक्स के दायरे से अभी बाहर हैं लेकिन ये सच है कि ये वाइन जितनी पुरानी होती जाती हैं, वो खुद अपने अंदर कुछ मात्रा में अल्कोहल के गुण धारण करने लगती हैं।

हालांकि आबकारी विभाग आरोप लगाता रहा है कि यहां के कुछ वाइनमेकर इसमें लीकर भी मिक्स कर रहे हैं।

कुर्ग में मेरे रहने के दौरान ही एक सीनियर ने फ़ेसबुक पर मैसेज भेजा कि कुर्ग गए हैं तो वहां वाइन जरूर चखिएगा और खरीदिएगा भी। कुर्ग की यात्रा बगैर वाइन के अधूरी कही जाती है। बाद में मैने कहीं पढ़ा कि अगर आप कुर्ग गए और वाइन के बगैर लौटे तो समझिए अपराध किया है आपने। मैंने वाकई अपराध किया। अब जी पछता रहा है।

तब बस ये लग रहा था कि वापसी में लौटते समय प्लेन में इसको रखने की परमिशन होगी या नहीं। बाद में पता चला कि आप अपने चेकइन बैगेज में 5 लीटर अल्कोहल या उस तरह का द्रव ले जा सकते हैं लेकिन रसीद साथ में रखनी होगी।

अब मैं कुछ चीजें गिनाता हूं। इसके बाद आपको कुर्ग में वाइन बनाने के कुछ तरीकों को भी बताऊंगा। यहां जितनी भी वाइन बनती है, वो सभी होममेड है।

ये यहां का बड़ा कुटीर उद्योग है। चलिए अब गिनना शुरू करिए- धान की पैड़ी, संतरा, मिर्च, अंजीर, लीची, स्ट्राबेरी, केला, गुलाब, अंगूर, पान का पत्ता, अदरक, कॉफी बीज, ब्लूबैरी, काजू, चेरी, जामून, नारियल, काजू एपल, अन्ननास, तरबूज, चावल, पपीता, अमरूद, चीकू, मिंट, गन्ना, हरा सेब… शायद अभी बहुत कुछ बच ही गया होगा।

इन सबकी वाइन हाज़िर है पूरे कुर्ग में फैली दुकानों और कॉफी एस्टेट के अंदर बने शोरूम्स में। बड़े पैमाने पर ये वाइन यहां से बाहर भेजी जाती हैं और आनलाइन पर भी उपलब्ध हैं।

यहां एक अच्छी होममेड वाइन की एक 750 मिलीलीटर की बोतल 100 से 110 रुपए में सप्लाई के तौर पर दुकानों में आती है और 180 से लेकर 400 या ज़्यादा रुपयों में बेची जाती है। कुछ दाम पैकेजिंग और बोतलों के आकार-प्रकार पर भी निर्भर करता है।

पहले यहां वाइन की खपत केवल यहीं के घरों तक सीमित थी लेकिन धीरे धीरे अब विजिटर्स के बीच जबरदस्त तरीके से लोकप्रिय हो चुकी है। जाड़ों में इनकी बिक्री और बढ़ जाती है।  शनिवार और रविवार को यहां की दुकानों पर वाइन खरीदने वालों की भीड़ ही लगी रहती है। पहले तो केवल मीठी वाइन ही बनती थीं, अब यहां शुगर फ्री वाइन भी तैयार होने लगी हैं।

मेडीकेरी के 1000 से ज्यादा घर इसे बनाने में लगे हैं। हालांकि इसका बनाने का तरीका समय लेता है। ये दो चार दिनों में तैयार नहीं होती। हालांकि इसको जल्दी बनाने के चक्कर में इसमें तेज किण्वन के लिए रम, ब्रांडी या व्हिस्की मिला दी जाती है।

तरीका बहुत आसान होता है, जो खासकर यहां आजमाया जाता है। पानी को उबालें। इसमें इच्छित फल और चीनी को मिलाकर बंद करके रख दें। इसे 05 दिनों तक हिलाते रहें। इसके बाद इसे हिलाना बंद कर दें। चुपचाप 25-30 दिनों के लिए रख दें। जगह अगर अंधेरी और नार्मल टैंपरेचर वाली हो तो फिर बेहतर। इसके बाद इस द्रव को बोतलों में छानकर बंद कर देते हैं। ये वाइन तैयार है।

हालांकि वाइन को और बेहतर बनाने के लिए अक्सर इन बोतलों को फिर 03 महीने के लिए बंद करके रखा जाता है। फिर इसका बेहतरीन स्वाद चखिए। कुर्ग के कल्चर में बिना वाइन के खाना पूरा नहीं होता। इस वाइन को दो साल तक रखा जा सकता है। इसके बाद वाइन में अपने आप किण्वन होने लगता है और अल्कोहल की मात्रा में खुद ब खुद 05 से 10 फीसदी अल्कोहल आ जाता है।

अब तो वैसे शुगरलेस वाइन भी बनाई जाने लगी है। वैसे फर्मेंटेशन के लिए अगर इसमें शुरू में दो चम्मच गेहूं मिला दें तो भी इसका टेस्ट भी बेहतर होगा और फर्मेंटेशन भी अच्छा।

अंत में देखते हैं कि मिर्ची की वाइन भी क्या घर में बनाई जा सकती है। इसमें 10-15 मिर्चियां लें। उसमें 250 ग्राम चीनी और दो चम्मच गेहूं को करीब दो कप उबाल कर ठंडे पानी में मिलाकर एक टाइट जार में अंधेरे और सामान्य तापमान के कमरे में रख दें। करीब एक हफ्ते बाद इसको छानें और इसमें दो कप उबालकर नार्मल पानी में मिलाकर एक बोतल में बंद करके करीब एक महीने के लिए रख दें। बस इसके बाद ये वाइन तैयार है। ये करीब सालभर तक चलेगी।

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मेदीकेरी, भारत का स्कॉटलैंड

नेचर का तिलस्म, कुर्ग का मुर्ग और लज्जतदार खाना यात्राओं में आप हमेशा नई जगहों से रू-ब-रू होते हैं। नए स्वाद और व्यंजन जीभ को नया जिम्नास्ट कराते हैं। मैंने बेंगलुरु, मैसूर और कुर्ग की यात्रा में ऐसे खूब स्वाद लिये। कुछ जायके अब भी जीभ को अपनी याद दिला रहे हैं।

अंधेरी होती शाम के समय जब वोल्वो बस ने मेदीकेरी पहुंचाया तो गणेश चतुर्थी के ढोल नगाड़े बज रहे थे। केसरिया पगड़ी बांधे लोगों का झुंड गणेश जी को स्थापना के लिए ले जा रहा था।

कुर्ग का मतलब ये मत समझिए ये कोई एक ज़िला या कस्बा है बल्कि पुराना राज्य था। जिसमें कई ख़ूबसूरत तालुका आते हैं। ऐसा हरा – भरा इलाक़ा।

जहां की सुबह- शाम आमतौर पर कोहरे के साथ होती है। जब हम पहुंचे तो धुंध हल्की चादर फैलाने लगी थी। दुकानें जगमगाने लगीं थीं। अगर गोवा में हर चौथी दुकान मदिरा की होती है तो कुर्ग में हर चौथी दुकान स्पाइसेस और वाइन की मिलेगी। वैसे आपको बता दें कुर्ग को अब कोडागु जिले के तौर पर जानते हैं। इसका प्रशासनिक मुख्यालय मेडिकरी है।

कोडागु 05 तालुकों में बंटा है- मेडीकेरी, विराजपेट, सोमवारपेट, पोनामपेट और कुशालनगर। पर्यटक आमतौर पर सबसे हैपनिंग जगह मेडिकेरी में ही रुकना पसंद करते हैं, जहां कुर्ग के ज्यादातर जगहों को घूमने के लिए कवर किया जा सकता है। दक्षिण कर्नाटक का ये इलाका केरल को छूने वाला वेस्टर्न घाट एरिया है,

वैसे इसे भारत का स्कॉटलैंड भी कहा जाता है। खासियत है हरियाली, बेहतरीन मौसम, बारिश और मझोले पहाड़। पहली रात का डिनर मेडिकेरी के बेलीज रेस्टोरेंट में हुआ। पुराना,अनौपचारिक और परंपरागत लज़ीज़ स्वाद वाली जगह। ज़्यादा तड़क भड़क नहीं लेकिन एक फील जरूर। मिक्स वेज सब्जी मंगाई।

कहना चाहिए इसके स्पाइस और स्वाद का ज़ायका नायाब था। बहुत कम डिश ऐसी होती हैं जहां स्पाइस का कांबिनेशन इतना परफेक्ट हो कि खाने वाला स्वाद भूल नहीं पाए। साथ में पतली चपाती। फिर राइस बॉल।

चावल के आटे से बने हुए 05 छोटे गोले जब एक बाउल में पेश हुए तो लगा कि ये तो चावल को गोल बनाकर ही दिया जा रहा होगा। ये बॉल्स नफ़ासत भरी मुलायम और स्वाद में स्मूद थीं।

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अक्की रोटी

इसे खास तरीके से बनाया जाता है। वही तरीका इसे मुलायमियम भी बख्शता है। चावल के आटे को उबलते पानी में मिलाकर इसे हल्के हल्के मिलाते हैं और धीमी आंच में करीब 10 मिनट पकाते हैं। उतारकर हाथों में हल्का तेल डालकर गूंथते हैं।

फिर छोटे – छोटे गोले बनाकर भाप पर फिर 10 मिनट रखते हैं ताकि मुलायमियत और जीभ पर नफ़ासत मुकम्मल हो जाए। कुर्ग में राइस बॉल को पोर्क करी, मटन करी, चिकन करी के साथ खाते हैं। वेज करी भी चलेगी, इसके साथ भी ये लाजवाब लगेगी। वैसे मैं इसे जल्दी बनाना ट्राई करने वाला हूं। यहां की भाषा में इसे कदमकट्टू कहते हैं।

इसी तरह राइस फ्लोर से बनी रोटी पसंद की जाती है, जिसको अक्की रोटी कहते हैं। इसे गूंथने का तरीका आटा गूंथने से कुछ अलग है। किसी बर्तन में पानी गरम करिये। गरम पानी में राइस फ्लोर को हिलाते हुए मिलाएं।

पानी और चावल के आटे का अनुपात ज़रूर देखें, क्योंकि इसे आपस में मिलने के बाद बिल्कुल पतला नहीं होना चाहिए। अगर आपने हलवा बनाया हो तो आप ज़्यादा बेहतर समझ सकते हैं कि इसे कैसे करना है।

कुछ देर धीमी आंच पर रखने के बाद उतारिए। गूंथिए। कुछ इस तरह की लचक बनी रहे। अब चौकी पर चावल का हल्का सा आटा डालिए। गूंथे आटे से गोल लोई बनाकर बेलना शुरू करें। बाकि तरीका वही है जैसे तवे पर गेहूं की रोटी बनाते हैं।

चावल की रोटी भी ना केवल खूब फूलती है बल्कि खाने में खूब सॉफ्ट भी होती है। ग्रेवी और चटनी के साथ इसको खाना स्वाद का एक नया दरवाज़ा खोलेगी।

कुर्ग में आप जितने ऊंचे स्थान पर रह रहे होंगे। वहां से प्रकृति के तमाम बदलते रूप ज़्यादा बेहतर देख सकते हैं। यहां वाकई नेचर रोज रहस्य के दरवाजे खोलते हुए विस्मित करती है। हमारा होटल भी कुछ ऐसी ही जगह था।

दरअसल कर्नाटक स्टेट टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के ज़्यादातर होटल ऐसी जगह बने हैं, जिन्हें खुला, हराभरा और सर्वोत्कृष्ट कहना चाहिए। साफसुथरे। सुविधापूर्ण और खानपान में लाजवाब। मैं जब 03-04 साल पहले हम्पी गया, तब भी अनुभव यही था। अबकी बार मैसूर और कुर्ग में ये अनुभव और मजबूत हो गया।

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हरियाली ही हरियाली

ये ऐसे होटल हैं, जो आपके पैसे के बदले उतना नहीं बल्कि ज़्यादा देते हैं। कुर्ग में मेरे होटल की खिड़की जिस ओर खुलती थी, उधर चारों ओर से घिरी पहाड़ी श्रृंखलाओं के बीच विशाल वैली किसी कटोरे सी नजर आती थी जिसमें कुछ घर दिखते थे। धान के खेतों के बीच पेड़ों का झूमता-झामता समूह। हरियाली ही हरियाली।

सुबह खिड़की खोलते ही पहले कोहरे की घनी चादर गुड मार्निंग करती। धूप की किरणों की दस्तक के साथ जब धुंध का पर्दा उठने लगता तो बादलों का पूरा लोक खिड़की से नीचे वितान बना दिखता। सुबह के करीब 7:00 बजे हैं।

बादलों की घनी रुइयां खिड़की से नीचे की ओर वैली को ढंके हुए और ऊपर ऊपर नीला आसमान। बीच में बादलों के ऊपर सिर निकाले हुए पर्वत की चोटियां बताती कि हम भी यहां हैं। अगले एक घंटा बहुत जादुई और तिलिस्मी होता है।

रातभर बादलों ने नीचे आकर आराम कर लिया। अब तो उन्हें भी काम पर जाना है। अलसाए हुए वो उठने लगे और ओझल होने लगे। नीचे छिपी वैली सूरज की सुनहरी आभा के साथ हरित चमक बिखेरने लगी। पर्वत की शृंखलाएं साफ़ हो चुकी हैं। दूर से नमस्कार भेज रही हैं।

कुछ छोटे छोटे बादल ज़रूर आसमान में टंगे हुए नीचे फैलती धूप को रोकने की कोशिश करते दिखेंगे।

ये सब बमुश्किल एक घंटे में हो जाएगा। सुबह 06 बजे से सुबह 08 बजे तक नेचर जादुई बदलाव करती हुई व्यस्त रहती है। दिन में कभी भी बारिश हो सकती है।

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Photo: Sanjay Srivastava

शाम को बादल फिर वापस लौटना शुरू करेंगे तो आसमान एक – दो नहीं बल्कि कई रंगों से नहाने लगता है- लाल, नीला, पीला, भूरा, काला, सफेद। मानो कोई चित्रकार आसमान पर बादलों को अलग अलग रंगों में रंग रहा हो।

यहां एक राजाजी सीट है, ऐसा प्वाइंट है, जहां पूरे शहर में आए टूरिस्ट पहाड़ों की एक के पीछे बनी रेंज्स के आसपास प्रकृति के नृत्य की लीलाओं की आनंद लेते हैं।

कहना चाहिए हम ख़ुशकिस्मत थे कि हमारा होटल इसी प्वांइट से और आगे ऊपर था, मतलब जो राजाजी सीट का वो प्वाइंट नहीं दिखा पाता, वो होटल का ओपन रेस्टोरेंट दिखाता है।

कुहासा, पहाड़, बादल, हरियाली, धान के खेत और इन सबके बीच शहरों में अब नहीं सुनाई पड़ने वाली सुबह मुर्गे की बांग। मुझको बताया गया कि यहां तकरीबन साल भर ही ऐसा मौसम रहता है। रोज बारिश की रिम-झिम। कभी झमाझम। मिट्टी और मौसम कॉफ़ी और मसालों की पैदावार के लिए अनुकूल।

केरल के अलावा देश के सबसे ज़्यादा मसाले अगर यहीं पैदा होते हैं तो ये जगह कॉफ़ी हार्टलैंड कही जाती है। जिधर देखो उधर मसालों और कॉफी के पेड़-पौधे। अभी कॉफी की हरी हरी चेरियां निकल रही हैं।

सफेद फूल खिलने का मौसम निकल चुका है। आप क़िस्मत वाले होंगे जो कॉफ़ी सफेद गुच्छेदार फूल भी मुस्कुरा हुआ दीख जाए। हरी चेरियां फरवरी तक जाकर लाल होती हैं। तब उन्हें प्रोसेस करने का समय होता है। जो यहां घर – घर का उद्योग है। कुछ जगह कॉफ़ी के दानों को मशीनों में प्रोसेस करते हैं तो कुछ जगह घरों में भूनकर पिसा जाता है।

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गरम मशालों का जख़ीरा है कुर्ग

वैसे कॉफ़ी को यहां अंग्रेज हुक्मरान करीब 150 साल पहले लेकर यहां आए थे। जितने मसालों के नाम लीजिए, वो सब यहां उगते, फलते-फूलते नजर आएंगे- काली मिर्च, लौंग, इलायची, बड़ी इलायची, तेज पत्ता, दालचीनी।

केरल की तरह ये जगह भी फल-फूल, मसालों और कॉफ़ी पैदावार के लिए ज़न्नत है। जिस जगह इतने मसाले उगते हों वहां का खाना कैसे स्वाददार नहीं होगा।

वैसे कुर्ग का इलाक़ा परंपरागत तौर पर कोड़वा ट्राइब्स का इलाका है। जिनके बारे में अलग से लिखूंगा। यहां के कोड़वा समृद्ध, संपन्न और अब पढ़े लिखे हैं, मस्त अंदाज में खाते-पीते आनंद लेते जिंदगी जीते हैं। हथियारों की पूजा करते हैं। देश में ये अकेली ट्राइब्स है, जिसको हथियारों के लिए लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं पड़ती।

सरकार से अनुमति मिली हुई है। मशहूर खाद्य शास्त्री केटी अचाया ने अपनी किताब ‘ए हिस्टरिकल कांपेनियन इंडियन फूड’ में कोडवा यानि कुर्ग के खानपान पर पूरा चैप्टर ही लिखा है। मैने यहां कुर्ग की ख़ास डिश कुर्ग चिकन का लुत्फ तो उठाया लेकिन इतनी स्पाइसी, तीखी, तेज़ मसालेदार थी कि नाक, आंख और मुंह से पानी निकलने लगा।

कोड़वा के खानपान पर बढ़ने से पहले कुर्ग चिकन का जिक्र तो हो ही जाना चाहिए। चिकन यहां कई तरह से बनाया जाता है। सभी खड़े मसालों को भूनने के बाद पीसकर सब्जी बनाने का रिवाज़ है।

मसालों में धनिया, काली मिर्च, लौंग, जीरा, तेज पत्ता, लाल मिर्च सभी को साथ भूनने का रिवाज़ है। कोई सब्जी इनके बगैर नहीं बनेगी। फिर अदरक, प्याज, लहसून और हरी मिर्च का पेस्ट भी रहना ही है।

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होटल में जो कुर्ग चिकन मुझको परोसा गया वो हरियाली कुर्ग चिकन था। जिसमें चिकन के छोटे छोटे पीस को मेरिनेट करके डीप फ्राई किया जाता है।

इसके बाद इसे धरी धनिया, पुदीना, अदरक, हरी मिर्च, लहसून के पीसे हुए पेस्ट में भुने हुए मसालों के पाउडर को अच्छी तरह मिक्स कर दिया जाता है। इसे डीपफ्राई चिकन में लपेट कर सर्व किया जाता है। ये लज़्ज़तदार तो होता है साथ ही आंखों और नाक से पानी निकालने वाला भी।

कुर्ग में शाही मिक्स वेज का भी रिवाज़ मैंने होटल के मेनू में देखा, जिसमें सभी सब्जियों को तीखे मसालों के साथ काजू की ग्रेवी और कुछ मिठास के साथ परोसा जाता है।

ये आंखों, नाक और मुंह को थोड़ा राहत देती हैं। सी-सी करते नहीं खाना पड़ता। कुर्ग का इलाका आमतौर पर चिकन, मटन और पोर्क पसंद करने वालों का इलाका है। उनके कई परंपरागत व्यंजन इनसे बने हैं। कोडवा ट्राइब्स के व्यंजनों में चावल, नानवेज, फल और नारियल के साथ उनके खास सिरके का इस्तेमाल किया जाता है। इन दिनों वहां जगह-जगह धान की पैड़ी बोई जा चुकी है।

उपजाऊ खेत हरे कालीन की तरह बिछे दिखते हैं। चावल, घी और मीट के छोटे-छोटे टुकड़ों के साथ बना मसालेदार पुलाव यानि नाई कुलु ऐसा होता है मानो उसका दाना दाना खिला हुआ और मसाले की परत से लिपटा हो। यहां बांस खूब नजर आएंगे। बांस के अंदर के हिस्से के कोमल हिस्से की मसालेदार चटनी और अचार बनता है। नारियल के पानी को सब्जियों में करी के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।

पोर्क यहां लंबे समय से खाया जाता रहा है। इसकी करी के व्यंजन राइस बॉल के साथ ज्यादा पसंद किये जाते हैं। चावल के कई मीठे व्यंजन बनाए जाते हैं। नारियल, चावल, घी और शहद के साथ बना पापेट्टू सुबह के नाश्ते की मीठी पसंद होती है। कुछ केले और मछली की डिशेज हैं।

जब यहां कोई फल पकता है तो उसको भुने हुए चावल के आटे और थोड़ी सी मेथी के साथ खाने का प्रचलन है, जिसे थमबट्टू कहते हैं। जितने बड़े कटहल मैंने यहां देखे, वैसे शायद कहीं देखे हों। कुल मिलाकर कोडवा और कुर्ग का ये इलाका शानदार और खाने पीने के रिवाज़ों वाला है।

अगर कोई समारोह होता है तो उसमें इन व्यंजनों की बहार के साथ वाइन की मौजूदगी ज़रूर होती है, जो यहां खूब बनती है। हर नमकीन व्यंजन में कढ़ी पत्ते की मौजूदगी कमाल करती है। वैसे यहां राजमा और मशरूम की डिशेज़ भी डिफरेंट मिलती हैं, नाट इन पंजाबी स्टाइल बल्कि ठेठ कुर्गी स्टाइल।आपके दिमाग में जितने फल हों समझ लीजिए-उन सभी की वाइन यहां बनाकर चखी जा चुकी होगी। तीखे मिर्च की स्वादिष्ट वाइन कहीं और नहीं मिलने वाली।

अगर ये सोच रहे हों कि मिर्च की वाइन तो मुंह से लेकर आंत तक को आग से फूंक डालेगी तो ऐसा नहीं है, उसका स्वाद वाकई मीठा और लज़ीज़ होता है। वैसे वाइन के बारे में विस्तार से बताने के लिए अलग ही लिखना होगा।

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इन दिनों जब दिल्ली और देश के ज्यादा शहरों की हवा में विषैले तत्व घुलने लगे हैं, हवा सांस लेना बीमारियों को न्योता देने वाला हो गया है, ऐसे में देश का केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ये बता रहा है कि देश में इस समय सबसे अच्छी हवा की क्वालिटी कुर्ग इलाके के शहर मेदीकेरी की है। इसकी एयर क्वालिटी वैल्यू केवल 19 है। यानि की वो पैमाना जब हवा वाकई आपके लिए बहुत स्वास्थ्यप्रद और सुखद मानी जाती है।

कैसी है ये जगह। यहां हवा की क्वालिटी तब इतनी बेहतर क्यों है, जबकि देश के ज़्यादातर हिस्सों में हवा की क्वालिटी ख़राब या बहुत ख़राब हो चुकी है। इस जगह के बारे में बताने से पहले जरा एक बार देश के कुछ शहरों की हवा की क्वालिटी का जायजा ले लेते हैं। ये आंकड़ें 20 अक्टूबर को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दिए गए हैं।

इसके अनुसार, दिल्ली की एक्यूआई यानि एयर क्वालिटी इंडैक्स 222 है यानि ख़राब, जिसमें बाहर जाने पर आपको सांस लेने में असहजता महसूस हो सकती है और हवा की ये स्थिति कई और रोगों को न्योता भी दे सकते हैं। इसमें बाहर कम निकलने की हिदायत दी गई है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार अगर किसी शहर का एक्यूआई 0-50 है तो वहां की हवा को अच्छा मानिए यानि सांस लेने और स्वास्थ्य के लिए बेहतर। इसके बाद 50-100 एक्यूआई का मतलब संतोषजनक स्थिति।

100-200 में एक्यूआई को माडरेट मानते हैं मतलब कि थोड़ा सतर्क रहने की ज़रूरत है। इससे ऊपर जाते ही है हवा की क्वालिटी ख़राब, बहुत ख़राब और ख़तरनाक़ हो जाती है।

दिल्ली और आसपास के इलाके ही समूचा उत्तर भारत और देश के कई हिस्से दीवाली के आसपास बहुत ख़राब और ख़तरनाक़ वाली स्थिति में पहुंच जाते हैं।

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सुरम्य मेदीकेरी और कोड़वा जनजाति

अब आते हैं मेदीकेरी पर, जो कर्नाटक में बेंगलुरु से करीब 250 किलोमीटर दूर है। जहां रेलवे स्टेशन नहीं है, केवल सड़क मार्ग से ही जाया जा सकता है। आख़िरी रेलवे स्टेशन मैसूर है। कुर्ग का ये इलाका अपनी प्रकृति, हवा, जलवायु और पानी के लिहाज से स्वर्ग कहा जाता है।

इस इलाके को देश का कॉफ़ू हर्टलैंड भी कहते हैं यानि देश में कॉफ़ी उपज वाली सबसे बेहतरीन जगह। चूंकि ये इलाका केरल से सटा हुआ है लिहाजा प्रचुर मात्रा में यहां हर तरह के मसालों और फलों का भी उत्पादन होता है।

ये ब्रह्मागिरी हिल्स रेंज का ऐसा इलाका है, जिसे नेचर ने वाकई भरपूर हरियाली, पानी, उर्वरा, खुशहाली और हेल्दी हवा से नवाजा है। ये ऐसी जगह है, जहां औसतन रोज थोड़ी बहुत बारिश होती है।

मानसून के समय तो ये इलाका भरपूर हरे-भरे स्वर्ग की आभा से जगमगाता है। आमतौर पर साल के ज्यादातर महीनों में यहां की सुबह घने कोहरे की चादर फैलाए हुए होती है और शाम को आसमान कई रंगों की दर्शनीय छटा बिखेरता हुआ सूरज को अस्ताचल के लिए विदा देता है।

इस इलाक़े में रहने वाले लोगों को कोड़वा कहते हैं। कुछ की नजर में ये इलाका कोड़वा ट्राइब्स का शानदार इलाक़ा है। कुछ मानते हैं कि यहां के जो भी मूल निवासी हैं वो सभी कोड़वा कहलाते हैं। ये लोग बहुत अच्छा खाते-पीते हैं। तमाम तरह के फलों से वाइन बनाते हैं, उनका खाने के साथ सेवन करते हैं। मांसाहार खूब करते हैं।

जीवन का भरपूर मजा लेते हैं। शायद कोड़वा ऐसी ट्राइब्स भी है, जिसमें सभी खासे पढ़े लिखे, समृद्ध, बेहतर कद काठी वाले और बहादुर होते हैं।

सेना में हमेशा से कोड़वा लोगों का स्वागत होता रहता है बल्कि ये कह सकते हैं कि अंग्रेज जब भारत आए और उन्होंने भारतीयों को लेकर शुरुआती पलटन बनाई, उसमें कोड़वा लोग ही ज़्यादा थे।

अब भी यहां का हर चौथा शख्स सेना में नौकरी करता मिलेगा। समय के साथ उन्होंने साबित कर दिया कि हथियार चलाने और बहादुरी में उनका कोई सानी नहीं। ये लोग दीवाली के समय अपने हथियारों खासकर बंदूक की पूजा करते हैं।

कोड़वा वो लोग भी हैं, जो जात-पात में कतई विश्वास नहीं करते। उनकी बहादुरी और हथियार रखने की पुरानी परंपरा के कारण सरकार भी उन्हें बगैर लाइसेंस के बंदूक रखने की अनुमति देती है।

हैरान मत हों देश में ये अकेली प्रजाति है, जिसको ये खास अधिकार मिला हुआ है। आपको ये भी बता दें कि इस कुर्ग इलाके ने देश को अगर भरपूर फौजी दिए तो एक नहीं बल्कि सैन्य प्रमुख भी दिए।

एक अर्से तक हॉकी टीम में यहां के कई खिलाड़ी होते थे। कई टीम के कप्तान भी बने। कुल मिलाकर ये ख़ुशी फ़ील कराने वाली ऐसी जगह है जहां लोग प्रकृति के साथ रहना जानते हैं। प्रकृति की विपुल संपदा उन्हें धनवान बनाती है और खुशियां भी देती है।

मेदीकेरी पहाड़ पर बसा एक सुंदर शहर है। यहां की आबादी ज़्यादा नहीं है। यहां मकानों से ज़्यादा कॉफी और मसालों के एस्टेट हैं, जिनसे भरपूर कमाई होती है। चूंकि सालभर यहां पानी बरसता रहता है लेकिन इतना ज्यादा भी नहीं कि आप परेशान हो जाएं।

पानी का ये बरसना यहां के लिए इस लिए सौगात की तरह है क्योंकि वो यहां की हवा को बहुत साफ़ ही नहीं रखता है बल्कि हवा में एक ऐसी ताज़गी और खुशी घोलता है, जो आपके शरीर से लगते ही आपका तन मन दोनों प्रसन्नता से भर देती है।

ये संयोग है कि जिस समय देश की सबसे बेहतरीन हवा मेदिकेरी में बताई जा रही है उससे कुछ दिन पहले ही मैं इलाक़े में कुछ दिनों के लिए घूमने गया। विवेकानंद के बारे में कहा जाता है कि वो यहां आकर महीने भर से ज़्यादा रहे थे।

मुझे याद आ रहा है कि मैने अपने जीवन में ठंडी, गरम और बेहतर हवा की फीलिंग का स्वाद तो चखा है लेकिन इतनी हेल्दी और सुखद हवा को कहीं फील नहीं किया। ये हवा वाकई जब शरीर को छूती थी तो तन-मन बहारें लेते हुए खिल उठता था। तब महसूस होता था कि हवा की अनुभूति भी कितनी स्वर्गिक हो सकती है।

ऐसा आनंद ना तो एसी की ठंडी हवा में मिलता है और ना ही उत्तर भारत की किसी भी मौसम की ताजी हवा में। ऐसे में इस धरती का ख़ास होना लाजिमी है। सितंबर के पहले हफ्ते में यहां धान की पैड़ी खेतों में बिछाई जा चुकी होती है।

खेत हरी कालीन की तरह लहलहाने लगते हैं। नारियल के खूब पेड़ नजर आते हैं और जिधर नजर दौड़ा लो, उधर कॉफ़ी के पौधों की भरपूर तादाद लिए एस्टेट नजर आते हैं, जिसने सही मायनों में यहां की अर्थव्यवस्था का ख़ास नेमत दी है। हालांकि कॉफी के यहां आने की कहानी महज 100 के आसपास ही पुरानी है।

बाबा बूदान चोरी से यमन से कॉफी के 06 बीज लेकर आए और फिर ये इलाक़ा इसका सबसे उपजाऊ इलाक़ा बन गया। हालांकि ये एक अलग और दिलचस्प कहानी है।

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Photo: Sanjaya Srivastava

प्रकृति का ख़जाना

वैसे यहां के कॉफ़ी एस्टेट दुनियाभर के सभी बड़े कॉफी ब्रांड्स के लिए उच्च गुणवत्ता वाले कॉफी सीड्स की आपूर्ति करते हैं। हालांकि कई बड़े कारपोरेट भी यहां पहुंचकर बड़े बड़े कॉफी एस्टेट खरीदकर उसमें कॉफी पैदा कर रहे हैं।

कटहल यहां खूब होता है और इतना लंबा चौड़ा कि हैरान हो सकते हैं। इसके अलावा तकरीबन सभी फलों की यहां भरपूर पैदावार है। यहां काली मिर्च से लेकर इलायची, और दाल चीनी से लेकर तेजपत्ता, जायफल सबकुछ पैदा होता है।

चॉकलेट में इस्तेमाल होने वाला कोको और रक्तचंदन के पेड़ भी यहां खूब दिखेंगे। वैसे आपको बता दें कि चंदन तस्कर के तौर पर कुख्यात वीरप्पन के ये पसंदीदा इलाक़ों में था।

चूंकि ये इलाक़ै बॉयो डाइवर्सिटी वाला है लिहाजा जितने पक्षियों की प्रजातियां यहां मिलती हैं, उतनी देश में कहीं नहीं। यहां कई नदियां बहती हैं। प्रपात बनाती हैं। बादल, पहाड़ और हवा मिलकर दर्शनीय खेलों का नजारा पेश करते हैं।

सुबह मेदीकेरी के पर्वत रेंज के नीचे बादल आराम करते मिलते हैं। जैसे जैसे धूप 09-10 बजाती है, तब ये बादल धीरे धीरे विदा होने लगते हैं और पर्वत नजर आने लगते हैं। दिन भर मौसम साफ होता है या उमड़ते घुमड़ते बादल आते हैं और कुछ बारिश करके निकल जाते हैं।

मेदीकेरी में एक प्वाइंट है राजा सीट। यूं तो ये एक पार्क है लेकिन ऐसी जगह जहां से लोग उगते और डूबते सूरज के साथ बादलों के साथ आसमान में बनते बिगड़ते रंगों की छटा का आनंद लेते हैं।

दक्षिण भारत के सबसे बड़ी नदी मेदीकेरी से मुश्किल 40 किलोमीटर दूर तालाकावेरी नाम की जगह पर एक कंड से निकलती है, जो यहां की समृद्धि में भरपूर योगदान देती है।

आख़िर में ये कहूंगा कि अगर आप प्रकृति का महत्व समझेंगे तो प्रकृति भी आपको अपना ख़जाना लुटाएगी, जिसका एक ख़ुशगवार उदाहरण मेदीकेरी तो है ही।

(संजय श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। उन्होंने शोधपूर्ण किताब लिखी है- ‘सुभाष चंद्र बोस- एक अज्ञात यात्रा’ जो काफ़ी चर्चित रही है। वो शौकिया तौर पर कैरिकेचर भी बनाते रहे हैं और उनके फ़ेसबुक वॉल पर उनके अद्भुत कैरिचेर देखने को मिल जाएंगे। घूमने के शौकीन हैं और उनके यात्रा वृतांत बहुत रोचक और दिलचस्प होते हैं।) 

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WU Team

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