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बिहार में बहार वाली नीतीश सरकार प्रवासी मज़दूरों को क्या मुंह दिखाएगी?

अपने राज्य के मज़दूरों को वापस बुलाने से अनाकानी करने पर क्या है नीतीश कुमार के पास जवाब?

By प्रो. सुधा सिंह

काम के अभाव में फिर से पंजाब, हैदराबाद और अन्य जगहों पर वापस लौटने को मज़बूर हैं बिहारी मज़दूर। बिहार सरकार की यह बड़ी शर्मनाक नाकामी है।

एक राज्य की राजनीतिक अकुशलता ग़रीब श्रमिकों को ज़लालत की स्थिति में धकेल रही है।

कहीं भूमिपुत्र का, मूल निवासी का नारा बुलंद होता है, होगा और फिर कहीं से भी बिहारी श्रमिकों को निकालने, गाली देने, संसाधनों की लूट करने वाला कह, बोझ मानकर धकियाने की प्रक्रिया आरंभ हो जाएगी।

बिहार सरकार की उपेक्षा के कारण वे बार-बार इस स्थिति को झेलने के लिए मज़बूर होंगे। यही बिहारी मज़दूरों की नियति है।

बिहार को स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में अपने संसाधनों को विकसित करना होगा। बिहार के मानवीय संसाधनों को सम्मानजनक स्थिति प्रदान करने को प्राथमिकता देनी ही होगी।

जो मज़दूर लौट आए हैं उन्हें रोजगार देने की प्रक्रिया को आरंभ करना चाहिए। उन्हें उनके कड़वे अनुभवों के साथ फिर से बाहर धकिया देने की स्थिति को पैदा होने से अतिशीघ्र रोकना होगा।

याद रखिए अभी तो दिल्ली ने अस्पतालों के दरवाजे आप जैसे पिछड़े राज्यों के लिए बंद किया है।

दरअसल बंद तो कहने के लिए दिल्ली के बाहर से आने वाले सभी मरीजों के लिए किया है, पर ये आप ही हैं और उत्त्प्रदेश के मरीज ही हैं जो बात बात पर दिल्ली आकर इलाज करवाते रहे हैं।

कुछ संसाधन संपन्न पैसे वाले मरीज हरियाणा-पंजाब के भी हैं जो दिल्ली के निजी आस्पतालों में इलाज के लिए नियमित आते हैं, वे तो आते रहेंगे।

उन्हें दिल्ली सरकार के अस्पतालों में जाना नहीं है, वे उसके भरोसे नहीं पर ग़रीब मरीज जोकि बिहार से हैं, उनके लिए ‘अच्छे’ इलाज का बाहरी जरिया कभी भी बंद किया जा सकता है, यह अभी देख सकते हैं।

तो ‘बिहार में बहार’ वाली सरकार!!!

इस पतझड़ के मौसम में बिहार के लिए ठोस कुछ कर लो, नहीं तो इस तरह की ख़बरों से इलाज की आशा में जी रहे न जाने कितने ग़रीब बिहारियों का कलेजा धक् से रह जाएगा।

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में प्रोफ़ेसर हैं। उनके फ़ेसबुक पोस्ट से साभार।)

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