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निस्सिन में एक महीने बाद भी नहीं निकला हल, कंपनी पर हठधर्मिता का आरोप

निकाले गए मजदूरों ने एसडीएम से पूछा- 'क्या प्राशासन भी विदेशी कंपनियों की गोद में बैठ गया है?'

By आशीष सक्सेना

राजस्थान के अलवर जिले में नीमराना स्थित निस्सिन ब्रेक कंपनी के मजदूरों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। नौकरी से निकाले जाने के बाद हुई वार्ता तक प्रशासन नहीं करा पा रहा है, जिससे कोई रास्ता निकले। जबकि निकाले गए मजदूरों के सामने फांके करने की नौबत आ चुकी है।

तीन जून को निस्सिन कंपनी से निकाले गए लगभग दो दर्जन मजदूरों ने एसडीएम अलवर को ज्ञापन दिया, जिसमें स्थानीय प्रशासन पर कई गंभीर आरोप लगाए गए।

मजदूरों ने कहा कि कंपनी प्रबंधन ने एक बार वार्ता रखी, जो प्रबंधन की हठधर्मिता और दबंगई भरे रवैये के चलते बेनतीजा रही।

नौकरी से निकले एक महीना हो चुका है और तमाम गुहार के बावजूद स्थानीय प्रशासन ने चुप्पी साध रखी है, ऐसा लगता है जैसे प्रशासन विदेशी कंपनियों की गोद में जा बैठा है।

कोरोना के बाद भारतः सुनिए प्रो. अरुण कुमार, जस्टिस कोलसे पाटील और प्रफ़ुल्ल सामंत्रा को

तीन से छह जुलाई तक हर दिन 11 से 12.30 बजे तक वर्कर्स यूनिटी एक सेमिनार आयोजित कर रहा है। आज के वक्ता थे प्रो. अरुण कुमार, जस्टिस कोलसे पाटील और प्रफुल्ल सामंत्रा।क्या वाक़ई भारत सरकार का घाटा, आमदनी का एक तिहाई हो चुका है? प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का कहना है कि देश में हालात विश्वयुद्ध से भी ज़्यादा भयानक हो चुके हैं। जस्टिस कोलसे पाटिल का कहना है कि मोदी सरकार के लिए कोरोना एक बहाना बन चुका है और इससे लड़ने के लिए एकजुट प्रयास की ज़रूरत है। तीसरी वक्ता ग्रीन नोबल विजेता प्रफुल्ल सामंत्रा पर्यावरण और जनआंदोलनों का एक नया भविष्य बनाने पर जोर दे रहे हैं। तीनों वक्ताओं का पूरा वक्तव्य सुनिए। Workers Unity, PAIGAM, Samajwadi Samagam, Janata Weekly and Junputh invite you for a webinar with Prof. Arun Kumar, Justice Kolse Patil and Green Nobel Winner Prafull SamantraTo Discuss: Prof. Arun Kumar, Justice Kolse Patil and Green Nobel Winner Prafull SamantraTo Discuss:1) The current economic conditions and challenges,2) Bahujan politics and the question of social justice and3) Environmental justice and the future of Mass movements.

Posted by Workers Unity on Thursday, July 2, 2020

यहां तक कि कोई अधिकारी भुखमरी की कगार पर पहुंचे मजदूरों का हाल तक लेने नहीं आया। उल्टा मजदूरों और उनके परिवार पर दबाव बनाया जा रहा है।

मजदूरों ने ज्ञापन के माध्यम से चेतावनी दी है कि अगर हालात के चलते भुखमरी या अन्य मजबूरी के चलते कोई अनहोनी होती है तो स्थानीय प्रशासन जिम्मेदार होगा।

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