नोएडा प्रोटेस्टः आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत रद्द, योगी सरकार को लताड़ा, लगाया 5 लाख रु का ज़ुर्माना

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुधवार को आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए) के तहत हिरासत रद्द कर दी है।
लाइव लॉ के मुताबिक़, दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में ग्रेजुएट स्टूडेंट 25 साल की आकृति चौधरी अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में क़रीब 5 महीने से हिरासत में थीं।
यूपी की योगी सरकार ने उन पर 13 मई को एनएसए लगाया था।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने उनकी हिरासत को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका मंज़ूर करते हुए कहा कि उनकी हिरासत राज्य सरकार की ओर से ‘मनगढ़ंत कहानी’ पर आधारित थी।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर किसी दूसरे मामले में उनकी गिरफ़्तारी ज़रूरी नहीं है, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, आकृति चौधरी की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस ने कहा कि हाई कोर्ट ने गैर-कानूनी हिरासत के लिए 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।
चौधरी की ओर से पेश एक और वकील मानिक गुप्ता ने कहा कि हाई कोर्ट ने संकेत दिया है कि यह ज़ुर्माना हिरासत को मंज़ूरी देने में शामिल अधिकारियों—ज़िला मजिस्ट्रेट से लेकर एसएचओ तक—से वसूला जाएगा।
गौरतलब है कि इसी साल 13 अप्रैल को नोएडा में मज़दूरों का प्रदर्शन हुआ था जो हिंसक हो उठा। इसी सिलसिले में पुलिस ने कुछ मज़दूर अधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया था, जिनमें आकृति चौधरी भी शामिल थीं।
बाद में दो लोगों पर यूपी पुलिस ने एनएसए लगाया था जिनमें एक आकृति हैं और दूसरे हैं अनुवादक-लेखक सत्यम वर्मा।
बुधवार की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि चौधरी को 12 अप्रैल 2026 को सुबह 10।56 बजे गिरफ्तार किया गया था और उन्हें बीएनएसएस की धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया गया था। सरकार का आरोप था कि उन्होंने भीड़ को आगजनी और पथराव के लिए उकसाया था।
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योगी सरकार को कोर्ट ने लताड़ा
जस्टिस श्रीधरन ने सवाल किया कि चेतावनी देने से पहले उन्हें कारण बताओ नोटिस क्यों नहीं जारी किया गया।
कोर्ट ने मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा में आकृति चौधरी की कथित भूमिका को लेकर किए गए दावे पर सरकार को लताड़ा।
पुलिस ने स्वीकार किया कि धारा 126 के तहत कोई नोटिस नहीं दिया गया था। इसके बाद अदालत ने पुलिस की जनरल डायरी तलब की, जिसमें सामने आया कि नोटिस तैयार किए जाने से पहले ही चौधरी को गिरफ़्तार कर लिया गया था।
अदालत ने पूछा कि क्या गिरफ़्तारी से पहले उन्हें मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था और प्रदर्शनकारियों को उकसाने के आरोप के सबूत भी मांगे।
असल में सरकार की ओर से कहा गया कि 11 अप्रैल को लोग विरोध प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हुए थे।
इस पर कोर्ट ने कहा, “यानी 11 को कोई हिंसा नहीं हुई थी। जो भी हिंसा हुई, वह उनकी गिरफ़्तारी के बाद हुई।”
अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू से बातचीत में आकृति चौधरी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्वेस के साथ पैरवी करने वाले अधिवक्ता चार्ली प्रकाश ने पुष्टि की कि अदालत ने हिरासत का आदेश रद्द कर दिया है।
उन्होंने कहा, “अदालत ने उनकी गिरफ़्तारी और हिरासत को लेकर स्टेट के दावे में बड़ी विसंगतियां पाईं। अदालत ने नोएडा के ज़िलाधिकारी को उन्हें पाँच लाख रुपये का मुआवजा देने को भी कहा है।”
इस मामले में अदालत का विस्तृत आदेश अभी आना बाकी है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फ़ैसले का सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील प्रशांत भूषण ने स्वागत किया है। प्रशांत भूषण ने एक्स पर लिखा है, ”इलाहाबाद हाई कोर्ट का आकृति चौधरी की हिरासत रद्द करने का फ़ैसला सराहनीय है। नोएडा के श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में यूपी पुलिस ने आकृति चौधरी को पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण तरीक़े से हिरासत में लिया था।”
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जेल से आकृति चौधरी ने क्या कहा
आकृति चौधरी ने ग्रेटर नोएडा की जेल में द हिंदू से कहा, “एनएसए का आरोप रद्द होना बड़ी राहत है, लेकिन सभी श्रमिकों और एक्टिविस्ट की रिहाई तक लड़ाई ख़त्म नहीं होगी।”
द हिन्दू ने आकृति से बातचीत दौरान की स्थिति पर लिखा है, ”लोहे की जाली के पीछे खड़ी आकृति के चेहरे पर आंसू साफ़ दिखाई दे रहे थे। वह अन्य कार्यकर्ताओं के साथ अपने दोस्तों और परिवार से मिलने के इंतज़ार में खड़ी थीं।”
आकृति के पिता अरुण चौधरी ने द हिन्दू से कहा, “मेरी बेटी आज की भगत सिंह है। हमें हमेशा उसका पूरा समर्थन मिला। हमें कभी नहीं लगा कि उसने कुछ ग़लत किया है। मुझे न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है।”
आकृति चौधरी पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की रहने वाली हैं और दिल्ली यूनिवर्सिटी की लॉ फैकल्टी में एलएलबी फर्स्ट इयर में पढ़ रही हैं।
जेल में अपने अनुभव के बारे में आकृति चौधरी ने द हिन्दू से बताया कि उन्होंने खाना बनाने और सफ़ाई की ज़िम्मेदारी खुद उठाई और महिला क़ैदियों के बच्चों को पढ़ाया। उन्होंने कहा कि मनीषा चौहान और सृष्टि के साथ मिलकर, जिन्हें भी विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में उत्तर प्रदेश पुलिस ने हिरासत में लिया था, उन्होंने बंद पड़ी लाइब्रेरी को फिर से शुरू किया और दूसरों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
आकृति ने कहा, “हम काम करते रहे क्योंकि जिस जगह हम रहते हैं, उसे व्यवस्थित रखना और उसकी देखभाल करना कोई ग़लत बात नहीं है।”
उन्होंने बताया कि जेल में तीनों ने सिलाई और कॉस्मेटिक्स सहित कई व्यावसायिक ट्रेनिंग क्लास में भी हिस्सा लिया।
उन्होंने कहा, “हमारी दिनचर्या में नियमित काम शामिल है। इसके अलावा हम बच्चों को पढ़ाते हैं। हमने पोस्टर बनाए, कविताएं लिखीं, अपनी लाइब्रेरी और कॉमन रूम को सजाया और पढ़ने के साथ चर्चा की संस्कृति शुरू की। इससे विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के कारण गिरफ़्तार की गई महिलाओं का ध्यान बँटा और उनके परिवारों से अलग होने के बाद पैदा हुई उदासी को कम करने में मदद मिली।”
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