नफरत की राजनीति के खिलाफ किसान आंदोलन से मिले सबक को याद रखना क्यों है जरूरी

नफरत की राजनीति के खिलाफ किसान आंदोलन से मिले सबक को याद रखना क्यों है जरूरी

पिछले 9 दिनों से हरियाणा के समाज में बंटवारा खड़ा करने की कोशिश ज़ोरों से चल रही है. बजरंग दल और आरएसएस के अन्य संगठन नुहं में हिंसा भड़काने के बाद गुड़गांव के विभिन्न क्षेत्रों व मानेसर में नफरत की भावना फैला रहे हैं.
लेकिन दूसरी ओर हरियाणा की जनता का एक बड़ा हिस्सा इस नफरत की राजनीति के ख़िलाफ़ खड़ा हो रहा है. जींद से ले कर हिसार तक हर जिले में छोटी-बड़ी पंचायतों के आयोजन हो रहे हैं. अलग- अलग गाँव-मोहल्ले के लोग खुल कर अपने बीच में बने सद्भाव और कुछ विशेष राजनीतिक ताकतों द्वारा इस भाईचारे को तोड़ने की कोशिशों की गवाही दे रहे हैं.

इस पूरी घटना क्रम का सबसे खतरनाक असर मज़दूर मेहनतकश तबके पर ही पड़ रहा है. चाहे वे रेड़ी पटरी और रिक्शा चालक हों जिनके सामान दंगाइयों ने तोड़ दिए, या वे प्रवासी मज़दूर हों जिन्हें तिगराना में बजरंग दल के द्वारा आयोजित पंचायत में नौकरियों और किराए के घरों से बाहर रखने का ऐलान हुआ है या फिर नुहं के वो बस्तीवासी हों जिनके घरों पर खट्टर सरकार ने योगी सरकार से प्रेरणा लेते हुए बुलडोज़र चलवा दिए.

निशाने पर 

वहीं इस पूरी घटना से फायदा पाने वाली केवल दो ताकतें हैं. पहले वो सत्ताधारी पार्टी जो धार्मिक नफरत के मुद्दे को उछाल कर बेरोज़गारी, महंगाई, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था की कमज़ोरी जैसे जनता के ज्वलंत मुद्दों को गायब करना चाहती है, ताकि आने वाले चुनाव में उन्हें उनके द्वारा पिछले 10 साल में जनता की हुई बर्बादी का हिसाब ना देना पड़े.
और दूसरा वे बड़े पूंजीपति जिन्होंने अपने स्वार्थ के लिए जीवन की हर ज़रुरत को एक व्यापार बना दिया है और जो किसी भी शर्त पर जनता के अन्दर भरे गुस्से के निशाने पर नहीं आना चाहते.

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ऐसे में बली चढ़ने के लिए आर्थिक और सामजिक तौर पर सबसे दबे अल्पसंख्यक समुदाय के मेहनतकश मज़दूरों से बेहतर इन ताकतों के पास क्या विकल्प है?
इस रणनीति के तहत ही हिटलर ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 6 लाख से अधिक यहूदियों को मार डाला था जिसका खामियाज़ा पूरे जर्मनी देश ने भरा, व जिसके शोक और शर्म से जर्मनी का समाज अब तक उबर नहीं पाया है.

किसान आन्दोलन ने हरियाणा की जनता को एक महत्वपूर्ण सबक दिया है, कि जनता की एकता किसी धर्म और जाति की पहचान से ज़्यादा शक्तिशाली है, व बड़े पूंजीपतियों और संघी सरकार की जनविरोधी, मज़दूर-किसान विरोधी नीतियों के सामने हमारी सबसे मज़बूत ढाल है.

यही सबक हमारे देश के इतिहास में हुए सभी महत्वपूर्ण और व्यापक आंदोलनों में भी गूंजता है. आइए साझे संघर्ष की इस साझी विरासत को जानें और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाएं. हर कदम पर बजरंग दल व संघ परिवार द्वारा हमारे देश व समाज में साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने की साज़िश को चुनौती दें.

(क्रांतिकारी नौजवान सभा, हरियाणा)

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Abhinav Kumar

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