उत्तराखंडः 18,000 रुपये में जान हथेली पर लेकर सुरंग बनाने वाले मज़दूरों की हालत

उत्तराखंडः 18,000 रुपये में जान हथेली पर लेकर सुरंग बनाने वाले मज़दूरों की हालत

उत्तरकाशी सुरंग हादसे में बीते 17 दिन से फंसे 41 मज़दूरों को मंगलवार की रात सुरक्षित निकाल लिया गया है और इसके साथ ही मज़दूरों के साथियों और परिजनों ने राहत की सांस ली है।

इन 17 दिनों में मज़दूरों और उनके परिवार वालों ने रेस्क्यू अभियान की जटिलता, प्रशासन की अदूरदर्शिता, निर्माण कंपनी की लापरवाही और प्रशासन के चलताऊ रवैये के साथ वहां की कड़कड़ाती ठंड झेली।

सुरंग में फंसे अपने बेटे, पति, भाई की सकुशलता के लिए लोग झारखंड, सीतापुर, ओडिशा से चलकर आए। एक मज़दूर के पिता ने यहां तक पहुंचने के लिए अपनी पत्नी के गहने गिरवी रख दिए।

सुरंग के अंदर फंसे मज़दूरों में 15 झारखंड के हैं। इसके अलावा ये मज़दूर अधिकतर बिहार, ओडिशा और पश्चिमी बंगाल के रहने वाले हैं।

उत्तराखंड में चार धाम ऑल वेदर रोड के तहत उत्तरकाशी में जारी सिल्कायारा सुरंग परियोजना में लगभग 400 मज़दूर काम कर रहे हैं।

उत्तरकाशी सुरंग से निकाले गए सभी 41 मज़दूर, तस्वीरों में देखिए बाहर निकले मज़दूरों के चेहरे की खुशी

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किन हालात में रह रहे हैं ये मज़दूर?

बीबीसी हिंदी में इसके संवाददाता ज़ुबैर अहमद की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि यहां काम करने वाले मज़दूर किन हालात में रह रहे हैं।

यहाँ काम करने वाले सभी मज़दूर पुरुष हैं और अधिकतर युवा हैं जिनकी शादी भी नहीं हुई है। एक कमरे में आठ मज़दूर रहते हैं। परिवार वालों को यहाँ रखने की इजाज़त नहीं है।

सुरंग से कुछ आधा किलोमीटर की दूरी पर क़रीब चार सौ मजदूरों के रहने के लिए अस्थाई कमरे बने हुए हैं।

एक मज़दूर राजू कुमार ने बताया कि “जब हमारी शिफ़्ट ख़त्म होती है तो हम लोग अपने कमरे में आते हैं, हाथ मुंह धोते हैं, फ्रेश होते हैं, और फिर कपड़े धोते हैं। इसके बाद फ़ोन से घर पर बात करते हैं और फिर आराम करते हैं।”

यहाँ काम करने वाले सभी मज़दूर पुरुष हैं और अधिकतर युवा हैं जिनकी शादी भी नहीं हुई है। एक कमरे में आठ मज़दूर रहते हैं। परिवार वालों को यहाँ रखने की इजाज़त नहीं है।

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कमरों के सामने सामूहिक टॉयलेट्स हैं और उनसे सटी एक जगह पर नल लगा है जहाँ ये मजदूर दाढ़ी बनाते और नहाते हैं।

खाने के वक़्त इन मजदूरों को मेस में गर्म खाना मिलता है जिसमें रोटी, दाल, सब्ज़ी और चावल शामिल होता है।

22 साल के वर्षीय राजू कुमार कहते हैं, “सभी मज़दूर मिल जुल कर रहते हैं। घर से दूर यही हमारा घर है, यही हमारा परिवार है, यही हमारी दुनिया है।”

इस ने वो कमरा भी दिखाया जहां वे सभी रहते हैं  और यहां एक कमरे में आठ बिस्तर लगे हुए थे। कुछ कपड़े, जूते और सुरंग में काम करने वाले हेलमेट इधर-उधर रखे हुए थे।

कमरे का साइज़ बड़ा ज़रूर था लेकिन इतना बड़ा भी नहीं कि इसमें आठ बिस्तरों की जगह हो। राजू और उनके साथियों के लिए कुछ ख़रीदना काफ़ी मुश्किल रहता है।

मज़दूरों को कुछ भी खरीदारी के लिए यहां से 10 किलोमीटर बाज़ार जाना पड़ता है। वहां तक जाने के लिए कोई साधन नहीं है, इसलिए मज़दूरों को पैदल ही जाना होता है।

न्यूनतम सुविधा और मज़दूरी

सिल्क्यारा सुरंग परियोजना पर साल 2018 में काम शुरू हुआ था।

झारखण्ड के देवघर ज़िले से यहाँ काम करने आये राजेश कुमार यादव कहते हैं कि, “हमें हर महीने 17 हज़ार रुपए पगार मिलती है। इसमें से चार हज़ार रुपए मेस और प्रोविडेंट फंड का कट जाता है, कुछ पैसे हम जेब ख़र्च के लिए रख लेते हैं और 10 हज़ार रुपये अपने माता पिता को भेज देते हैं।”

एक अन्य मज़दूर ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्हें 18,000 रुपये मिलता है। ये 170ॉ-18 हज़ार रुपये सामान्य सैलरी है इन मज़दूरों की।

झारखंड की तुलना में उत्तरकाशी में ठंड बहुत ज़्यादा है, जिसके कारण मज़दूरों को दिक़्क़त होती है। गर्म पानी का इंतज़ाम न होने के कारण खुले में ठंडे पानी से नहाना पड़ता है।

मज़दूरों के मेस में टेबल और कुर्सियां नहीं हैं, लेकिन बैठने के लिए और खाने के लिए पक्के स्लैब्स लगे हुए थे। यहां एक नीम रोशनी का आलम है।

खाने में चावल, रोटी, दाल और सब्ज़ी, हाड़तोड़ मेहनत के बाद शरीर का ईंधन।

कई और मज़दूर कैमरे पर बात करने से डरते हैं। सुरंग में चट्टान काटने का काम करने वाली टीम के दो मज़दूरों ने बताया कि सुरंग में 200 से 270 मीटर तक हादसे से कुछ दिन पहले से ही कुछ समस्या थी। पत्थर गिर रहे थे, इसकी मरम्मत की जा रही थी और 12 नवंबर को अचानक वो हिस्सा नीच आ गिरा।

कई मज़दूरों के परिवार वालों को तो ये भी नहीं पता कि वे यहां सुरंग में काम करते हैं। एक मज़दूर का कहना था कि उन्होंने सबसे पहले जमशेदपुर में अपने परिवारवालों को फ़ोन करके बताया कि वो ठीक हैं।

लेकिन एक अन्य मज़दूर ने बताया कि  उन्होंने अपने परिवार को ये बताया ही नहीं था कि वो इस सुरंग में काम करते हैं।

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क्या है परियोजना

इस सुरंग को नवयुग इंजीनियरिंग नाम की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी बना रही है। ये मज़दूर इसी कंपनी के कर्मचारी हैं।

जब बीबीसी संवाददाता ने कंपनी के अधिकारियों से मज़दूरों की रिहाइश पर कुछ सवाल किए तो उन्होंने हमें कोई जवाब नहीं दिया।

लेकिन कंपनी में काम करने वाले दो सुपरवाइज़रों ने बताया कि बिहार, झारखंड और ओडिशा से आने वाले मज़दूर इतनी दूर इसलिए आते हैं क्योंकि उन राज्यों में नौकरियों की कमी है। उनको अपने परिवार को चलाना होता है। इसलिए मजबूरी में वो इतनी दूर आकर काम करते हैं।

निर्माणाधीन सुरंग महत्वाकांक्षी चारधाम परियोजना का हिस्सा है, जो बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री तक कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए एक राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा बनाने की पहल है।

ये एक विवादित परियोजना है। कई पर्यावरण विशेषज्ञ इस प्रोजेक्ट को लेकर आशंका जताते रहे हैं। उनके मुताबिक़ हाल के दिनों में इस इलाके में बाढ़ और भूस्खलन की आशंका बढ़ गई हैं।

हज़ारों करोड़ रुपये की लागत से इस प्रोजेक्ट को 2020 में अंजाम देना था लेकिन अब कहा जा रहा है कि इसे 2024 के अंत में पूरा कर लिया जाएगा।अब तक इस प्रोजेक्ट के 70 फीसदी हिस्से में काम मुकम्मल हो चुका है।

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Workers Unity Team

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