या तो बंदूक या बेड़ी, सबकुछ या कुछ भी नहीं, हम सब या कोई नहीं! -बर्तोल्त ब्रेख्त की कविता

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गुलाम, कौन आजाद करेगा तुम्हें?
वे जो गहरे अँधेरे में पड़े हैं
कॉमरेड, केवल ये ही आपको देख सकते हैं
केवल वे ही आपको रोते हुए सुन सकते हैं
कॉमरेड, केवल गुलाम ही आपको आजाद कर सकते हैं
सबकुछ या कुछ भी नहीं। हम सब या कोई नहीं
एक अकेले की किस्मत बेहतर नहीं हो सकती
या तो बंदूक या बेड़ी
सबकुछ या कुछ भी नहीं। हम सब या कोई नहीं

तुम जो भूखे हो, तुम्हें कौन खिलाएगा?
अगर यह रोटी है तो उसे तुम तराश रहे होगे,
हमारे पास आओ, हम भी भूखे मर रहे हैं
हमारे पास आओ और हमें अगुआई करने दो
केवल भूखे आदमी ही तुम्हें खिला सकते हैं
सबकुछ या कुछ भी नहीं। हम सब या कोई नहीं
एक अकेले की किस्मत बेहतर नहीं हो सकती
या तो बंदूक या बेड़ी
सबकुछ या कुछ भी नहीं। हम सब या कोई नहीं

मार खाए आदमी, तुम्हारा बदला कौन लेगा?
तुम, जिस पर हमले हो रहे हैं लगातार,
अपने घायल भाइयों की पुकार सुनो
कमजोरी हमें तुम्हारी मदद की ताकत देती है
हमारे पास आओ, हम तुम्हारा बदला लेंगे
सबकुछ या कुछ भी नहीं। हम सब या कोई नहीं
एक अकेले की किस्मत बेहतर नहीं हो सकती
या तो बंदूक या बेड़ी
सबकुछ या कुछ भी नहीं। हम सब या कोई नहीं

कौन, अरे अभागे, इसकी हिम्मत करेगा?
वह जो अब इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता
उन हमलों का हिसाब लगता है
ताकि हथियारबंद हो उसकी रूह
वक्त ने जरूरत और गम के जरिये सिखाया,
हमला कल नहीं आज
सबकुछ या कुछ भी नहीं, हम सब या कोई नहीं
एक अकेले की किस्मत बेहतर नहीं हो सकती
या तो बंदूक या बेड़ी
सबकुछ या कुछ भी नहीं, हम सब या कोई नहीं

(बर्तोल्त ब्रेख्त की इस बेहतरीन कविता का दिग्म्बर ने अनुवाद किया है। उनके फेसबुक से साभार।)

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