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संगीत के साजो-समान बेच घर की गृहस्थी चला रहे ‘ बैंड मास्टर ‘

 लाॅकडाउन में बैंड मास्टर का दर्द, बिक गये ताशे -ढोलक और महंगा यूफोनियम

By सोमनाथ आर्य

भागलपुर। संगीत के जिस साजो- सामान से पिछले तीन पीढ़ियों से उनका भावनात्मक लगाव रहा। वह इसी संगीत का असर था ही उन्हें घर में चढ़ने वाली रसोई की हाड़ी और बच्चों की स्कूल फीस तक के लिए कभी किसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत नहीं आयी। संगीत के इसी साजो सामान ने उन्हें शहर में एक मुकम्मल पहचान दी और एक नायाब चीज दी- वह था एक नाम – ‘ बशीर बैंड मास्टर ‘। लेकिन अब पिछले चार महीने में हालत पूरी तरह से बदल चूका है।

न जाने कितनी बारातें, कितने उत्सव और कितनी यादों का हमराही था वह पीतल का यूफोनियम। काफी महंगा था। उनके अब्बा ने लखनऊ के अमीनाबाद बाजार से 1978 में खरीद कर लाया था । लेकिन अब्बा की वह यादगार निशानी अब उनके बैंड का हिस्सा नहीं रही। लाॅकडाउन के दौरान घर में खाने – पीने की इतनी किल्लत हो गयी की अब्बा का वह पीतल वाला यूफोनियम बिक गया । पहले बिका ताशा , फिर बिका भांगड़ा वाला ढ़ोलक … यह कहते कहते बैंड माॅस्टर बशीर फफक-फफक कर रो पड़ता है।

बशीर की पत्नी अमीना पास ही बैठी होती है वह उसे दिलासा देती है बशीर तुरंत संभल जाते हैं बोलते हैं – क्या करें ? बच्चों को भूखे तो नहीं मरने देंगे न हम। बैंड मास्टर हैं हम पुराने कलाकार हैं, पिछले 4 महीने से कोई काम नहीं। लाॅकडाउन ने हम गरीब कलाकारों को कहीं का नहीं छोड़ा। बशीर कहते हैं कि इस साल शादी-ब्याह का मुहूर्त भी था और लग्न भी। लेकिन, हम बैंड मास्टर को कोई काम नहीं मिला। वे कहते हैं कि हमारी चौथी पीढ़ी इस पेशे से जुड़ी है।

शहर के कोतवाली चैक के काजवली मुहल्ले में रहने वाले बशीर कहते हैं कि हमलोगों ने भागलपुर का दंगा देखा उसकी विभीषिका देखी उसका दर्द करीब से देखा लेकिन दंगा इतना बेरहम नही था। लाॅकडाउन ने सीधे हमारे पेट पर लात मारा है। हमारा दर्द देखने वाला कोई नहीं। कई दिन हमारे बच्चे एक दिन का खाना खाकर रहे। मैंने मजबूरी में अपने अपने साजो-सामान बेचा।

खुद की बेटी की शादी मेें शहनाई न बजा सका बैंड मास्टर

बशीर की पत्नी अमीना हमें बताती है कि उनके पास चांदी के कुछ जेवर थे और सोने की दो कनबालियां। एक हार मेरी सास ने मुझे दिया था- सब बिक गये। अमीना शिकायत करती हैं कि हमें अपने जेवर का भी सही मूल्य नहीं मिला, जो भी बिका, आधी कीमत पर। लेकिन बच्चों को पालना है। हम भूखे रह लेंगे लेकिन बच्चे ?

बशीर कहते है की पिछले ही साल नवंबर में बेटी का निकाह पूर्णिया में तय हो गयी थी। सोचा था इस साल अप्रैल के महीने में निकाह करा दूंगा । लेकिन लॉक डाउन और पैसे की किल्लत की वजह से निकाह न करा सका। अब तो अगले साल भी बेटी के निकाह करने की स्थिति में नहीं हूं।

सिर पर लाखों का कर्ज अब वापस मांगता है महाजन

महाराजा बैंड के मास्टर आजाद का कहना है कि उनके सिर पर 3 लाख का कर्ज है। जनवरी महीने में वे कोलकाता से बैंड के लिए दर्जनों परी लाईट महाजन से कर्ज लेकर खरीद कर आये थे। सोचा था लग्न में महाजन का कूछ कर्ज चुका देंगे। लेकिन लाॅकडाउन के दौरान कोई काम नहीं मिला, सोचा था हालात जल्द कुछ महीने में ठीक हो जायेंगें लेकिन अनलाॅक होने के बाद शादी -ब्याह में केवल 50 लोगों के रहने का सरकारी आदेश मिला और एक बैंड में ही 50 से अधिक लोग होते हैं।

हमारा तो काम ही खत्म हो गया। लाॅकडाउन में बहुत बुरा हाल है। हमारा अंदर 50 से 60 कारीगर और कलाकार काम करते हैं, लाईट वाला, भांगड़ा वाला सबके लिए कोलकाता से ड्रेस मंगवाये थे। इस साल सब बेकार हो गया। मास्टर आजाद कहते हैं सरकार हम कलाकारों पर ध्यान दें, हमारे परिवार में कुल 12 सदस्य है। हम बैंड वाले हर खुशी में लोगों के घर शरीक होते हैं लेकिन आज हमारे सामने रोजी-रोटी का संकट है। लेकिन दुख की इस घड़ी में हमारे आंसू पोछने वाला भी कोई नहीं है।

शोभा यात्रा में निःशुल्क सेवा देता आया हूं अब शहर की बारी

कोतवाली चैक स्थित नाजीर बैंड और भांगड़ा के मोहम्मद नाजीर ने लाॅकडाउन के दौरान काम छीन जाने के उपरांत अपने परिवार और टीम का दुखःदुर्द साझा किया। नाजीर ने बताया कि हमारी टीम में कुल 16 लोग हैं। सबका अपना परिवार है। हमारा बैंड ही हम सब कलाकारों की आजीविका का यही एकमात्र जरिया था। पिछले 4 महीने से हमारा पुश्तैनी रोजगार छीन गया।

सालों से हमारे पूर्वजों और खुद मैंनें इस शहर के लोगों की सेवा की है। नाजीर ने बताया कि मैं मुसलमान हूं लेकिन हिन्दू भाईंयों के हर धार्मिक उत्सवों में मोल मोलायी नहीं करते। जो खुशी से दिया अल्लाह ताला की रहमत मानकर रख लेते हैं, मारवाड़ी समाज द्वारा निकाली गयी शोभा यात्रा में आज तक निःशुल्क सेवा किया हूं।

हमलोग अपनी कला को ही अपना ईमान मानकर रोटी खाते हैं। इस शहर को अपना घर समझे हैं । नाजीर ने शहर के लोगों से अपील कर कहा कि अब हमारे बच्चे भूखे सो रहे हैं। कर्ज कोई कितना देगा, हमारे बच्चों पर रहम करके हमारी कुछ मदद कीजये कि कम से कम हम जिंदा रह सकें और लाॅकडाउन के खत्म होने के बाद फिर से शहर की सेवा कर सकें।

 जंग खाने लगे बैंड बाजे

आजाद बैंड के मोहम्मद निजाम का कहना है कि हम कमाते हैं तो मेरे साथ दस लोगों का पेट भरता है। पिछले छह महीने से सारा काम धंधा चैपट हो गया। सरकार की हम जैसे कलाकारों को लेकर कोई आर्थिक नीति अब तक सामने नहीं आयी है। बस पांच किलो चावल और एक किलो दाल। लाॅकडाउन में एक बार मिला फिर बंद। पांच किलो चावल कितना दिन चल सकता है।

स्थानीय जिला प्रशासन के अधिकारियों को भी हम जैसे कलाकारों की फिक्र होनी चाहिये। इसी बैंड के कलाकार मोहम्मद इबरार कहते हैं कि इस साल का सारा लग्न चौपट हो गया। बैंड -बाजे के सारे सामान में जंग लगने लगा हैं।

चांद की ढ़ोलक पर अब नहीं होता भांगड़ा

काजवली चैक पर 26 साल के मोहम्मद चांद का भांगड़ा बैंड है। पिछले 5 महीने से चांद की ढ़ोलक पर कोरोना महामारी के दौरान कोई भांगडा नहीं हुआ है। चांद का कहना है उसकी भांगड़ा टीम में कुल 40 कलाकार हैं, सब का काम छीन गया। गरीब आदमी को भले ही कोरोना का संक्रमण नहीं हो, लोग गरीबों की शक्ल देखकर कुछ लोग यह मान लेते हैं कि इसको तो जरूर कोरोना होगा।

हम कलाकार अपने ड्रेस में ही अपने बैंड के साथ समाज में इज्जत पाते हैं, ड्रेस को उतार कर कोई दूसरा काम करें तो भी कोई काम नहीं मिलता। चांद ने इस बात का जिक्र जरूर किया कि डिप्टी मेयर राजेश वर्मा ने बैंड वाले सभी 40 घरों के लोगों को 2 बार खाने-पीने का राशन दिया था।

राशन तो खत्म हो गया लेकिन जीवन भर उनके प्रति हमलोगों की इज्जत कभी खत्म नहीं होगी। कोरोना ने काम छीना बस लोगों के दिल से इंसानियत नहीं खत्म होनी चाहिये। अपनी बात समाप्त कर चांद तेजी से ड्रम स्टीक से अपनी भांगड़ा वाली ढोलक बजाना शुरू कर कर देते हैं। काश कि हुक्मरानों तक उनकी यह दर्द भरी आवाज पहुँच जाएँ।

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